बागेश्वर बाबा के बयान से BJP को चुनावी नुकसान हो सकता है?

बागेश्वर धाम के धीरेंद्र शास्त्री की भगवान राम और कृष्ण को लेकर की गई टिप्पणियों पर उत्तर प्रदेश की राजनीति गरमा गई है. अखिलेश यादव ने उनके कार्यक्रम रद्द करने की मांग की, जबकि तेजस्वी यादव और कांग्रेस ने भी निशाना साधा. आखिर यादव वोट बैंक और हिंदुत्व की राजनीति के बीच यह विवाद बीजेपी के लिए कितनी बड़ी चुनौती है?

राम-कृष्ण विवाद में अखिलेश की एंट्री, BJP के लिए नई चुनौती?
राम-कृष्ण विवाद में अखिलेश की एंट्री, BJP के लिए नई चुनौती?

बागेश्वर धाम (Bageshwar Dham) के प्रमुख धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री (Dhirendra Shastri) की श्री राम और श्री कृष्ण को लेकर की गई टिप्पणियों पर मंगलवार को राजनीतिक विवाद और गहरा गया. समाजवादी पार्टी (SP) के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने शास्त्री के देशभर में होने वाले कार्यक्रमों को रद्द करने की मांग की है. उन्होंने आरोप लगाया कि ‘सनातन विरोधी तत्व’ अपने राजनीतिक आकाओं के इशारे पर काम कर रहे हैं.

उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले इस विवाद ने राजनीति का नया मोर्चा खोल दिया है. समाजवादी पार्टी ने शास्त्री की टिप्पणियों को लेकर बीजेपी को निशाने पर लिया है. उनके भक्त उन्हें ‘बागेश्वर बाबा’ के नाम से भी संबोधित करते हैं.

विवाद की शुरुआत मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के करेरा में आयोजित रामकथा के दौरान धीरेंद्र शास्त्री के एक बयान से हुई. इस कार्यक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया. वीडियो में शास्त्री भगवान राम और भगवान कृष्ण के स्वरूप और उनकी मुद्राओं की तुलना करते दिखाई दिए.

उन्होंने कहा कि श्री राम सीधे खड़े होते थे, जबकि श्री कृष्ण तीन जगह से टेढ़े थे और गर्दन झुकाकर बांसुरी बजाते थे.

मंगलवार को अखिलेश यादव ने शास्त्री का एक और वीडियो X पर साझा किया, जिसमें वह श्री राम के बारे में बात करते नजर आ रहे हैं. अखिलेश ने कहा कि इस तरह की टिप्पणियां सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने की कोशिश हैं और उनकी पार्टी इसे बर्दाश्त नहीं करेगी.

अखिलेश यादव ने कहा, “ये सनातन विरोधी तत्व आखिर किसके इशारे पर काम कर रहे हैं? पहले श्री कृष्ण को लेकर विवादित वीडियो सामने आया और अब श्री राम के पिता के बारे में अपमानजनक टिप्पणियां फैलाई जा रही हैं. उनके राजनीतिक आका भले ही यह सब बर्दाश्त कर लें, लेकिन हम इसका एक अंश भी स्वीकार नहीं करेंगे.”

इससे एक दिन पहले भी अखिलेश यादव ने बिना नाम लिए धीरेंद्र शास्त्री की आलोचना की थी और ईशनिंदा करने वाले लोगों पर प्रतिबंध लगाने की मांग की थी.

उन्होंने कहा था, “इंसानी गलतियों को माफ किया जा सकता है, लेकिन ईशनिंदा को कभी माफ नहीं किया जा सकता. ऐसे दुर्भावनापूर्ण लोगों पर आजीवन प्रतिबंध लगाना समाज के हित में सबसे बेहतर होगा. देशभर में उनके सभी कार्यक्रम रद्द किए जाने चाहिए, उन्हें कोई नई अनुमति नहीं मिलनी चाहिए और सार्वजनिक जीवन में मौजूद हर सच्चे सनातनी को उनका पूरी तरह बहिष्कार करना चाहिए. उनके अक्षम्य पाप की यही सजा होनी चाहिए. ऐसा नहीं हुआ तो वे भी ईशनिंदा के पाप में भागीदार होंगे और अपना यह लोक-परलोक दोनों खराब करेंगे.”

माफी के बाद भी नहीं थमा विवाद, सपा ने बीजेपी को घेरा

विवाद बढ़ने के बाद धीरेंद्र शास्त्री ने सफाई जारी की और माफी मांगी. उन्होंने कहा कि उनकी टिप्पणी एक भक्तिपूर्ण पद की व्याख्या का हिस्सा थी और उसे संदर्भ से हटाकर पेश किया गया.

हालांकि, तब तक समाजवादी पार्टी इस विवाद में खुलकर उतर चुकी थी. पार्टी ने एक बयान जारी कर बीजेपी पर निशाना साधा.

सपा ने आरोप लगाया कि बीजेपी के संरक्षण में काम कर रहा एक व्यक्ति देश की पौराणिक, आध्यात्मिक सभ्यता, इतिहास और वेद-पुराणों में लिखी बातों को धीरे-धीरे खारिज कर रहा है. पार्टी के मुताबिक, बीजेपी एक ऐसी नई कहानी गढ़ रही है जो न केवल शर्मनाक, बल्कि निंदनीय भी है.

सपा ने अपने बयान में कहा, “बीजेपी के लोगों ने राम मंदिर को लूटा है. अब इसी बीजेपी सत्ता के सहयोगी धीरेंद्र शास्त्री ने हाल ही में हमारे भगवान कृष्ण जी के बारे में बेतुकी बातें कही हैं.”

बिहार के नेता प्रतिपक्ष और राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेता तेजस्वी यादव ने भी धीरेंद्र शास्त्री पर निशाना साधा. उन्होंने आरोप लगाया कि सत्ता में बैठे लोग शास्त्री को संरक्षण दे रहे हैं.

तेजस्वी यादव ने कहा, “भगवान राम और भगवान कृष्ण एक-दूसरे के पूरक हैं. ये नफरत फैलाने वाले लोग पहले इंसानों को बांटते थे और अब भगवानों को भी बांटने लगे हैं. राजनीतिक फायदे के लिए ये कितना नीचे गिरेंगे? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के उन सभी नेताओं को, जो सामाजिक सौहार्द और सनातनी एकता को कमजोर करने वाले इस व्यक्ति को संरक्षण दे रहे हैं, देश, समाज और सनातनियों से माफी मांगनी चाहिए.”

मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने भी धीरेंद्र शास्त्री पर टिप्पणी की. वह उत्तर प्रदेश के अयोध्या तक अपनी ‘सत्य सनातन स्वाभिमान यात्रा’ निकाल रहे हैं. इसी दौरान उन्होंने शास्त्री को ‘मूर्ख’ कहा.

बीजेपी के लिए क्यों बढ़ सकती है मुश्किल?

अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव के आरोपों पर बीजेपी ने पलटवार किया है. पार्टी के प्रवक्ता नवीन श्रीवास्तव ने कहा कि चुनाव नजदीक आते ही अखिलेश और तेजस्वी यादव को अचानक भगवान कृष्ण की याद आने लगी है.

उन्होंने अखिलेश यादव से सवाल किया कि जो व्यक्ति राम मंदिर नहीं गया और भगवान राम के अस्तित्व पर सवाल उठा चुका है, वह मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि कब जाएगा?

बीजेपी प्रवक्ता ने पूछा कि क्या अखिलेश यादव कृष्ण जन्मभूमि मंदिर आंदोलन का समर्थन करते हैं या नहीं?

बीजेपी की यह प्रतिक्रिया उत्तर प्रदेश की राजनीति में श्री कृष्ण से जुड़े मुद्दे के चुनावी महत्व को दिखाती है. यहां धार्मिक पहचान और जातिगत समीकरण एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं.

श्री कृष्ण यादव समुदाय के लिए विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखते हैं. यादव समुदाय अपनी वंश परंपरा को यदुवंश से जोड़ता है और श्री कृष्ण को अपनी सांस्कृतिक-धार्मिक पहचान का अहम हिस्सा मानता है.

उत्तर प्रदेश में यादव समुदाय एक बड़ा चुनावी वर्ग है. दशकों से राज्य के विधानसभा चुनावों में इस समुदाय का राजनीतिक प्रभाव महत्वपूर्ण रहा है.

यूपी की राजनीति में यादव वोट बैंक इतना अहम क्यों?

उत्तर प्रदेश सामाजिक न्याय समिति के एक अनुमान के मुताबिक, अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की आबादी में यादव समुदाय की हिस्सेदारी करीब 19.4 प्रतिशत है.

मुलायम सिंह यादव के राजनीतिक उभार के बाद से समाजवादी पार्टी की पहचान यादव समुदाय के साथ गहराई से जुड़ी रही है. पार्टी का पारंपरिक मुस्लिम-यादव गठजोड़ उसे उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक मजबूत ताकत बनाता रहा है.

हालांकि, राज्य में पूर्ण बहुमत हासिल करने के लिए सपा को अपने पारंपरिक वोट बैंक से आगे बढ़कर दूसरे समुदायों तक भी पहुंच बनानी पड़ी है.

बीजेपी लंबे समय से यादव मतदाताओं को अपने पक्ष में लाने की कोशिश करती रही है. इसके लिए पार्टी ने यादव समुदाय के नेताओं को आगे बढ़ाने के साथ-साथ भगवान कृष्ण के वंश से जुड़े धार्मिक और सांस्कृतिक संदर्भों का भी इस्तेमाल किया है.

बीजेपी की व्यापक रणनीति गैर-यादव OBC समुदायों को अपने साथ जोड़ने के साथ यादव वोट बैंक में भी सेंध लगाने की रही है. इसके लिए पार्टी कल्याणकारी योजनाओं, समुदाय के नेताओं को बढ़ावा देने और हिंदू धार्मिक पहचान के मुद्दे पर जोर देती रही है.

इस रणनीति के तहत बीजेपी ने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव को भी एक प्रमुख यादव नेता के रूप में पेश किया है.

मार्च 2024 में लखनऊ में आयोजित यादव महाकुंभ में मोहन यादव ने समुदाय से अपनी वंश परंपरा पर गर्व करने की अपील की थी. उन्होंने समाजवादी पार्टी के इस दावे को चुनौती देने की कोशिश की थी कि वही यादव समुदाय के हितों का प्रतिनिधित्व करती है.

बीजेपी ने मथुरा के कृष्ण जन्मभूमि आंदोलन के जरिए भी व्यापक हिंदू मतदाताओं तक पहुंच बनाने की कोशिश की है. इसके साथ ही भगवान कृष्ण और यादव समुदाय के ऐतिहासिक-सांस्कृतिक संबंधों को भी राजनीतिक विमर्श में जगह दी है.

2017 और 2022 के चुनावों में क्या रहा यादव वोट का असर?

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2017 और 2022 के नतीजों में इस राजनीतिक समीकरण की अहमियत साफ दिखाई देती है.

2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 312 सीटें जीती थीं, जबकि समाजवादी पार्टी सिर्फ 47 सीटों पर सिमट गई थी.

2022 के चुनाव में सपा ने वापसी की और 111 सीटें हासिल कीं. इस दौरान पार्टी का वोट शेयर भी 21.82 प्रतिशत से बढ़कर 32.76 प्रतिशत हो गया.

इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में से 43 पर सपा के नेतृत्व वाले INDIA गठबंधन की जीत ने दिखाया कि यादव और दूसरे पिछड़े समुदायों में बीजेपी की पकड़ बढ़ाने की कोशिशों की भी सीमाएं हैं.

बागेश्वर धाम का बढ़ता राजनीतिक प्रभाव

धीरेंद्र शास्त्री की टिप्पणियां ऐसे समय सामने आई हैं, जब बीजेपी के लिए राजनीतिक और चुनावी समीकरण बेहद महत्वपूर्ण हैं. इस विवाद का एक दूसरा पहलू बागेश्वर धाम के बढ़ते राजनीतिक प्रभाव से भी जुड़ा है.

मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के छतरपुर में स्थित बागेश्वर धाम अब एक बड़े धार्मिक परिसर के रूप में विकसित हो चुका है. यहां लाखों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं.

2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बागेश्वर धाम का दौरा किया था. इस दौरान उन्होंने धीरेंद्र शास्त्री की पहल पर बनने वाले बागेश्वर धाम मेडिकल एंड साइंस रिसर्च इंस्टीट्यूट की आधारशिला रखी थी.

इस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी ने धीरेंद्र शास्त्री को अपना ‘छोटा भाई’ कहा था. इसे शास्त्री के बढ़ते राजनीतिक प्रभाव के संकेत के रूप में भी देखा गया.

भक्ति से हिंदुत्व की राजनीति तक कैसे बदला धीरेंद्र शास्त्री का रुख?

धीरेंद्र शास्त्री के राजनीतिक रुख में भी पिछले कुछ वर्षों में बदलाव देखने को मिला है.

शुरुआत में उनके प्रवचन मुख्य रूप से हनुमान भक्ति और लोगों की व्यक्तिगत समस्याओं के समाधान पर केंद्रित रहते थे. उस समय उनके प्रवचनों में खुला राजनीतिक संदेश अपेक्षाकृत कम दिखाई देता था.

लेकिन पिछले दो वर्षों में उन्होंने अधिक मुखर हिंदुत्ववादी रुख अपनाया है. उन्होंने खुद को ‘हिंदू राष्ट्र योद्धा’ के रूप में पेश किया है.

वह भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करने की मांग कर चुके हैं. उन्होंने धर्मांतरण के खिलाफ हिंदुओं से एकजुट होने की अपील भी की है.

इसके अलावा महिलाओं को लेकर उनकी कुछ टिप्पणियां भी विवादों में रही हैं. उन्होंने बिना घूंघट वाली महिलाओं की तुलना ‘खाली प्लॉट’ से की थी.

इस साल पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा से पहले भी उन्होंने विवादित बयान दिया था. उन्होंने त्योहार के दौरान मांस खाने वालों को ‘पाखंडी’ कहा था.

कांग्रेस और बीजेपी दोनों क्यों साधना चाहते हैं धीरेंद्र शास्त्री को?

धीरेंद्र शास्त्री का प्रभाव केवल मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड तक सीमित नहीं है. उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के कई इलाकों में भी उनके बड़ी संख्या में अनुयायी हैं.

इसी वजह से कांग्रेस और बीजेपी दोनों के नेता उन्हें अपने राजनीतिक प्रभाव क्षेत्र में लाने की कोशिश करते रहे हैं.

हालांकि, मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में धीरेंद्र शास्त्री के साथ नजदीकी बढ़ाने का फायदा बीजेपी को कांग्रेस की तुलना में अधिक मिलता दिखाई देता है.

ये भी पढ़ें- धीरेंद्र शास्त्री के खिलाफ FIR कराने पहुंचे पप्पू यादव , कृष्ण पर टिप्पणी से बवाल….

ऐसे में भगवान राम और कृष्ण को लेकर शुरू हुआ विवाद केवल धार्मिक टिप्पणी तक सीमित नहीं रह गया है. उत्तर प्रदेश में यादव वोट बैंक, हिंदुत्व की राजनीति और आगामी विधानसभा चुनावों के समीकरणों ने इसे एक बड़े राजनीतिक मुद्दे में बदल दिया है.

Last Updated on November 4, 2026 8:45 am

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