यह फैसला ऐसे समय आया है, जब चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी पिछले 10 महीनों में 14 अलग-अलग नोट्स के जरिए आयोग के कई फैसलों पर आपत्ति जता चुके हैं. द इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल के मुताबिक, आयोग ने अब तक उन दोनों चुनाव आयुक्तों की ओर से उठाई गई लगभग सभी प्रमुख आपत्तियों पर अपना रुख बदल लिया है.
Form 6 वह वैधानिक फॉर्म है, जिसका इस्तेमाल नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए किया जाता है. चुनाव आयोग ने अपने ECINet पोर्टल पर उपलब्ध इसके ऑनलाइन संस्करण से SIR से जुड़ी घोषणा को अलग कर दिया है. अब यह घोषणा Form 6 का हिस्सा नहीं, बल्कि एक अलग फॉर्म के रूप में उपलब्ध है.
इसका सीधा मतलब है कि नए मतदाता के ऑनलाइन आवेदन में पहले Form 6 के सेक्शन J और K के बीच जो घोषणा अनिवार्य रूप से भरवाई जा रही थी, वह अब वहां नहीं दिखाई देगी.
इस घोषणा में आवेदकों को तीन विकल्पों में से एक चुनना होता था:
- क्या उनका नाम 2000 के दशक की शुरुआत में हुए पिछले SIR के दौरान मतदाता सूची में था?
- क्या उनके माता-पिता या दादा-दादी में से किसी का नाम उस मतदाता सूची में था?
- या फिर न तो उनका और न ही उनके माता-पिता का नाम उस सूची में था?
आवेदक इस सवाल का जवाब दिए बिना आगे आवेदन नहीं बढ़ा सकते थे.
चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने 16 मई को लिखे अपने नोट में कहा था कि फॉर्म में ऐसा कोई बदलाव कानूनी संशोधन के बिना नहीं किया जा सकता. वहीं, सुखबीर सिंह संधू ने 13 अगस्त को इस बदलाव को ‘अनधिकृत और अवैध’ करार दिया था.
अब आयोग ने SIR से जुड़ी घोषणा को Form 6 से अलग कर दिया है.
सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल करने के बाद बदला फैसला
यह बदलाव उस समय हुआ है, जब चुनाव आयोग ने 26 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने जवाबी हलफनामे में बताया था कि उसकी इलेक्टोरल रोल (ER) डिवीजन ने 21 अक्टूबर को दोनों दस्तावेजों को अलग करने का फैसला किया था.
हलफनामे के मुताबिक, SIR से जुड़ी घोषणा को Form 6 के भीतर इसलिए रखा गया था, ताकि आवेदक को एक ही OTP और एक ही ई-सिग्नेचर के जरिए आवेदन पूरा करने की सुविधा मिल सके. आयोग का कहना था कि अलग-अलग फॉर्म होने पर आवेदक को दो OTP और दो ई-सिग्नेचर की जरूरत पड़ती.
हलफनामे में कहा गया है कि इस व्यवस्था का उद्देश्य आवेदकों की सुविधा था, लेकिन बाद में इस पर चर्चा और सुझाव सामने आए.
आयोग ने अपने हलफनामे में लिखा, “21 अक्टूबर 2026 को इलेक्टोरल रोल डिवीजन ने यह फैसला किया कि जिस तरह Form 6 को कागजी रूप में जमा करते समय अलग-अलग दस्तावेजों का इस्तेमाल होता है, उसी तरह ऑनलाइन आवेदन भी दो हिस्सों में होगा. एक Form 6, जैसा कि नियमों में निर्धारित है, और दूसरा SIR Declaration.”
छह सप्ताह के भीतर Form 6 को लेकर आयोग का यह तीसरा रुख है. इस फैसले के साथ आयोग ने पहले किए गए बदलाव को पूरी तरह पलट दिया है.
Form 6 में बदलाव को लेकर दोनों चुनाव आयुक्तों ने क्या आपत्ति जताई थी?
23 सितंबर को द इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने Form 6 में SIR से जुड़ी घोषणा जोड़ने पर आपत्ति जताई थी.
उनका तर्क था कि Form 6 का प्रावधान ‘Registration of Electors Rules, 1960’ के तहत किया गया है. इसलिए इसमें संशोधन करने का अधिकार केवल केंद्र सरकार को है, चुनाव आयोग को नहीं.
विवेक जोशी ने 16 मई को इस संबंध में अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी. 19 मई को संधू ने भी उनके रुख का समर्थन किया.
इसके बावजूद जुलाई में ऑनलाइन फॉर्म में यह सवाल जोड़ दिया गया. द इंडियन एक्सप्रेस ने सबसे पहले 12 जुलाई को इस बदलाव की खबर प्रकाशित की थी.
13 अगस्त को संधू ने इसे ‘अनधिकृत और अवैध’ बताते हुए तत्काल हटाने की मांग की. लेकिन अखबार की पड़ताल प्रकाशित होने के समय तक यह सवाल ऑनलाइन फॉर्म में मौजूद था.
23 सितंबर को आयोग ने अपनी पहली प्रतिक्रिया में Form 6 का जिक्र तक नहीं किया. प्रेस नोट में कहा गया कि आयोग की सभी कार्रवाइयां कानून और उसके निर्देशों के अनुरूप हैं.
आयोग ने दोनों चुनाव आयुक्तों के नोट्स को ‘ऑपरेशनल सवाल या सुझाव’ बताया और कहा कि पिछले एक साल में लिए गए सभी महत्वपूर्ण फैसले पूर्ण आयोग की सर्वसम्मति से लिए गए हैं.
इसके तीन दिन बाद, 26 सितंबर को पूर्ण आयोग की बैठक हुई और दूसरा स्पष्टीकरण जारी किया गया.
इसमें कहा गया कि SIR के लिए Form 6 के साथ लगाई गई घोषणा को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा है, जबकि जिन राज्यों में SIR नहीं चल रहा है, वहां 1960 के नियमों के मुताबिक निर्धारित फॉर्म इस्तेमाल किए जाएंगे.
इसका मतलब यह था कि SIR की घोषणा केवल उन राज्यों में Form 6 के साथ रहेगी, जहां विशेष गहन पुनरीक्षण जारी है. दिल्ली और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में यह घोषणा बनी रही, जबकि SIR पूरा कर चुके राज्यों में इसे ऑनलाइन Form 6 से हटा दिया गया.
12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने संशोधित Form 6 को न तो मंजूरी दी है और न ही उसे खारिज किया है.
इसके बाद 21 अक्टूबर को चुनाव आयोग के ER डिवीजन ने घोषणा को हर जगह Form 6 से अलग करने का फैसला किया. अब ECINet पोर्टल पर यही व्यवस्था दिखाई दे रही है.
आयोग का दावा: Form 6 में कभी संशोधन नहीं किया गया
अपने हलफनामे में चुनाव आयोग ने अब भी यह दावा किया है कि उसने Form 6 में कोई संशोधन नहीं किया था.
आयोग ने कहा, “इस दावे में कोई सच्चाई नहीं है कि आयोग ने SIR के आदेशों के जरिए Form 6 में संशोधन किया था.”
हालांकि, हलफनामे में यह भी स्वीकार किया गया कि Form 6 और SIR घोषणा को ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर जिस तरीके से दिखाया गया, उससे यह समझा जा सकता था कि Form 6 में संशोधन कर दिया गया है.
आयोग ने कहा कि समीक्षा के दौरान इस प्रस्तुति को लेकर चिंताएं सामने आईं. उसने दोहराया कि Form 6 में संशोधन करने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है.
आयोग का तर्क है कि घोषणा को Form 6 के भीतर रखने का मकसद आवेदक को एक ही OTP और एक ही ई-सिग्नेचर की सुविधा देना था. अलग-अलग दस्तावेज होने पर दो OTP और दो ई-सिग्नेचर की जरूरत पड़ती.
जांच में क्या सामने आया: 10 महीने में 14 बार उठीं आपत्तियां
23 सितंबर को द इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी पड़ताल में खुलासा किया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों के दौरान कम से कम 14 बार आयोग के नाम पर लिए गए फैसलों पर आपत्ति दर्ज कराई थी.
इन फैसलों की जानकारी कथित तौर पर दोनों आयुक्तों को पहले से नहीं थी.
दोनों के नोट्स चुनाव आयोग के सबसे महत्वपूर्ण कामकाज से जुड़े थे. इनमें यह तय करना शामिल था कि किसका नाम मतदाता सूची में जोड़ा जाएगा, किसका नाम हटाया जाएगा, हटाए गए नामों की बहाली के खिलाफ अपील कौन करेगा और मतदाता सूची के डिजिटल डेटाबेस को नियंत्रित करने का अधिकार किसके पास होगा.
दोनों आयुक्तों ने आयोग के आंतरिक कामकाज पर भी सवाल उठाए थे.
28 जुलाई को जारी एक प्रशासनिक आदेश के जरिए वरिष्ठ अधिकारियों के बीच काम का बंटवारा बदल दिया गया था. इसमें IT से जुड़ी फाइलें भी शामिल थीं. आरोप है कि यह बदलाव दोनों चुनाव आयुक्तों से परामर्श किए बिना किया गया.
इसके बाद दोनों आयुक्तों ने अलग-अलग कैबिनेट सचिव को पत्र लिखा. अगले ही दिन दोनों ने संयुक्त रूप से उस आदेश को रद्द कर दिया.
14 में से पांच नोट्स की कॉपी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को भी भेजी गई थी. लेकिन रिकॉर्ड में उनकी ओर से कोई जवाब दर्ज नहीं है.
मई से अगस्त के बीच पूर्ण चुनाव आयोग की एक भी बैठक नहीं हुई थी.
23 सितंबर को आयोग ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा था कि ये नोट्स सामान्य विचार-विमर्श का हिस्सा थे और महत्वपूर्ण फैसले पूर्ण आयोग की सर्वसम्मति से लिए गए थे.
लेकिन इसके बाद पांच सप्ताह के भीतर आयोग ने उन लगभग सभी मुद्दों पर बदलाव किए, जिन पर दोनों चुनाव आयुक्तों ने सवाल उठाए थे.
बैठकें: अब पहले जारी होगा एजेंडा, बाद में तैयार होंगे मिनट्स
दोनों चुनाव आयुक्तों ने शिकायत की थी कि आयोग की बैठकों का एजेंडा पहले से साझा नहीं किया जा रहा और बैठकों के बाद कार्यवाही का रिकॉर्ड यानी मिनट्स भी जारी नहीं किए जा रहे.
अब आयोग ने फैसला किया है कि हर बैठक से पहले एजेंडा प्रसारित किया जाएगा और बैठक के बाद उसका रिकॉर्ड जारी किया जाएगा.
अधिकारियों के विदेश दौरे के लिए आयोग की मंजूरी जरूरी
दोनों आयुक्तों ने अधिकारियों के विदेश दौरे को लेकर भी आपत्ति जताई थी.
उनका कहना था कि कुछ अधिकारी आयोग की मंजूरी के बिना विदेश यात्राएं कर रहे थे.
अब आयोग ने व्यवस्था की है कि अधिकारियों के विदेश दौरे के लिए चुनाव आयोग की अनुमति जरूरी होगी.
नए IT सिस्टम और पोर्टल पर भी लगेगी निगरानी
चुनाव आयोग के DG IT सीमा खन्ना के नेतृत्व में विकसित किए जा रहे नए IT मॉड्यूल और पोर्टल को लेकर भी दोनों आयुक्तों ने सवाल उठाए थे.
उनकी आपत्ति थी कि आयोग की जानकारी और मंजूरी के बिना नए डिजिटल मॉड्यूल तैयार किए जा रहे हैं.
अब फैसला किया गया है कि नए IT मॉड्यूल और पोर्टल पहले अधिकारियों की एक समिति के पास जाएंगे. इसके बाद उन्हें मंजूरी के लिए चुनाव आयोग के सामने रखा जाएगा.
ECINet पोर्टल का होगा ऑडिट
विवेक जोशी ने 29 मई को ECINet पोर्टल का ऑडिट कराने की मांग की थी. उन्होंने इसे मतदाता सूची के डेटाबेस के धीरे-धीरे केंद्रीकरण की प्रक्रिया बताया था.
13 जुलाई को संधू ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया. 14 अगस्त को उन्होंने अपने नोट में दर्ज किया कि प्रस्ताव पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है.
अब आयोग ने 14 अक्टूबर को एक सर्कुलर जारी कर ECINet की जांच के लिए समिति गठित की है.
इस समिति की अध्यक्षता एक वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त करेंगे. इसमें एक अन्य वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त, एक उप चुनाव आयुक्त, एक निदेशक, चार मुख्य निर्वाचन अधिकारी और दो स्वतंत्र विशेषज्ञ शामिल हैं.
इन स्वतंत्र विशेषज्ञों में IIT बॉम्बे और IISc बेंगलुरु के विशेषज्ञ शामिल हैं.
समिति यह जांच करेगी कि ECINet पोर्टल संबंधित कानूनों और नियमों का पालन कर रहा है या नहीं.
ECINet सॉफ्टवेयर में बदलाव, अब जमीनी अधिकारियों को मिलेगी ज्यादा छूट
दोनों चुनाव आयुक्तों की एक बड़ी आपत्ति यह थी कि ECINet सॉफ्टवेयर के जरिए जमीनी स्तर पर काम करने वाले अधिकारियों की शक्तियां सीमित की जा रही थीं.
संधू ने 14 अगस्त को लिखा था कि मतदाता सूची से जुड़ी सभी जिम्मेदारियां निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों (EROs), जिला निर्वाचन अधिकारियों (DEOs) और मुख्य निर्वाचन अधिकारियों (CEOs) की हैं.
लेकिन उनके मुताबिक, सॉफ्टवेयर का एक्सेस कंट्रोल DG IT के पास केंद्रीकृत कर दिया गया था. उन्होंने सवाल उठाया था कि DG IT को कानून के तहत वैधानिक अधिकारियों की स्वतंत्रता और अधिकार सीमित करने का अधिकार नहीं है.
अब आयोग ने सॉफ्टवेयर में बदलाव कर जमीनी अधिकारियों को पहले की तुलना में अधिक अधिकार दिए हैं.
महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी एस चोकलिंगम ने 24 सितंबर को ECINet में चार बदलावों का सुझाव दिया था. आयोग ने ये चारों बदलाव लागू कर दिए हैं.
इनमें प्रमुख बदलाव इस प्रकार हैं:
- जिन मतदाताओं को मैपिंग में गड़बड़ी या तार्किक विसंगतियों के कारण नोटिस दिया गया है, उनकी व्यक्तिगत सुनवाई अब अपवाद के तौर पर होगी. इसके बजाय बूथ लेवल अधिकारी (BLO) उनके घर जाकर दस्तावेज जुटाएंगे.
- मतदाता अब पहले से सूचीबद्ध 13 श्रेणियों के अलावा अन्य दस्तावेज भी जमा कर सकेंगे.
- तार्किक विसंगति वाले मामलों को जिला निर्वाचन अधिकारी के पास भेजने के बजाय ERO खुद फैसला कर सकेंगे.
- पिछले SIR की मतदाता सूची का अंश अपलोड करना अब अनिवार्य नहीं होगा.
गोवा के 97 मतदाताओं का मामला: सॉफ्टवेयर के कारण नहीं जुड़ पाए नाम
द इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल में गोवा के 97 मतदाताओं का मामला भी सामने आया था.
रिपोर्ट के मुताबिक, इन मतदाताओं के नाम मसौदा मतदाता सूची से हटा दिए गए थे. इसके बाद उन्होंने जरूरी दस्तावेज जमा किए और गोवा के EROs ने उनकी पात्रता को मंजूरी भी दे दी.
लेकिन ECINet सॉफ्टवेयर में ऐसा कोई विकल्प नहीं था, जिसके जरिए हटाए गए नामों को दोबारा जोड़ा जा सके.
गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने सात दिनों के भीतर आठ बार दिल्ली स्थित आयोग को पत्र लिखा. इन सभी पत्रों की कॉपी DG IT सीमा खन्ना को भी भेजी गई थी.
इसके बावजूद अंतिम मतदाता सूची इन 97 लोगों के नाम के बिना प्रकाशित हो गई.
अब मुख्य निर्वाचन अधिकारी को इन मतदाताओं के नाम शामिल कराने की प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया गया है.
चुनाव आयोग के हलफनामे के मुताबिक, इन 97 में से 88 लोगों ने Form 6 भर दिया है और उनके आवेदन स्वीकार कर लिए गए हैं. छह लोग देश से बाहर हैं, जबकि तीन के पास पुर्तगाल के पासपोर्ट हैं.
मतदाता सूची में छूटे लोगों के लिए दोबारा नाम जुड़वाने की प्रक्रिया
चुनाव आयोग ने इसके साथ ही मतदाता सूची में छूट गए लोगों को शामिल करने के लिए दो नई प्रक्रियाएं भी शुरू की हैं.
29 सितंबर को आयोग ने उन राज्यों को विशेष अभियान चलाने का निर्देश दिया था, जहां SIR पूरा हो चुका है. इस अभियान का उद्देश्य उन मतदाताओं को सूची में शामिल करना है, जिनके नाम छूट गए थे.
इसके अलावा इसी महीने आयोग ने 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में स्पेशल समरी रिवीजन (SSR) का आदेश दिया. इसका मुख्य उद्देश्य उन लोगों को मतदाता सूची में शामिल करना है, जो 2027 में 18 साल की उम्र पूरी करेंगे.
इस प्रक्रिया के दौरान Form 6 भरने वाले लोगों को SIR से जुड़ी घोषणा भरने की जरूरत नहीं होगी.
पश्चिम बंगाल में मतदाताओं के नाम बहाल करने के खिलाफ अपीलों पर सवाल
पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची को लेकर दाखिल अपीलों का मामला भी दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों में शामिल था.
12 अगस्त को संधू ने अपने अधिकारियों से पांच सवाल पूछे थे. ये सवाल उन लाखों अपीलों से जुड़े थे, जो न्यायिक अधिकारियों के आदेश पर मतदाता सूची में शामिल किए गए लोगों के नामों के खिलाफ दाखिल की गई थीं.
संधू ने पूछा था:
- ऐसी कुल कितनी अपीलें दाखिल की गई हैं?
- अपीलों की श्रेणीवार संख्या क्या है?
- क्या चुनाव आयोग ने ये अपीलें दाखिल की हैं?
- इन्हें दाखिल करने का अधिकार किसे दिया गया था और किसने दिया?
- वास्तव में ये अपीलें किस अधिकारी ने दाखिल कीं?
संधू ने अपने नोट में दर्ज किया था कि जब उन्होंने पश्चिम बंगाल की मुख्य निर्वाचन अधिकारी से इस मामले की जानकारी मांगी, तो उन्होंने कहा कि उनके पास इसका पूरा ब्योरा उपलब्ध नहीं है.
आयोग ने अपीलों के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला दिया
इस मामले में चुनाव आयोग ने अपने हलफनामे में कहा कि न्यायाधिकरणों के सामने अपील दाखिल करने के लिए आयोग के भीतर किसी अलग अनुमति की जरूरत नहीं थी, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका था कि चुनाव आयोग के अधिकारी अपील कर सकते हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने अपने दो आदेशों में बताया था कि SIR के दौरान न्यायिक अधिकारी के फैसले के खिलाफ कौन अपील कर सकता है.
इसके तहत जिन मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए गए थे, वे अपील कर सकते हैं. इसके अलावा चुनाव आयोग के वे अधिकारी भी अपील कर सकते हैं, जिन्हें किसी नाम को दोबारा मतदाता सूची में शामिल किए जाने पर आपत्ति हो.
इस तरह आयोग ने अपने फैसले की जिम्मेदारी लेने के बजाय सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला दिया.
हलफनामे में आगे कहा गया कि 22 अक्टूबर को पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय से मिली जानकारी के मुताबिक, ये अपीलें जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (RP Act) के तहत अधिकार प्राप्त अधिकारियों ने दाखिल की थीं.
हलफनामे में कहा गया, “ये मामले आयोग के सामने नहीं लाए गए थे.”
हालांकि, आयोग ने यह नहीं बताया कि कुल कितनी अपीलें दाखिल की गई थीं.
यह जवाब संधू के सवाल पूछने के करीब 10 सप्ताह बाद और सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल किए जाने से सिर्फ चार दिन पहले आया. जवाब उसी कार्यालय से आया, जिसकी प्रमुख ने पहले संधू को बताया था कि उनके पास इस मामले का पूरा ब्योरा नहीं है.
इन अपीलों को अब तक वापस नहीं लिया गया है.
आयोग के हलफनामे में यह भी कहा गया कि जिन मतदाताओं के नाम शामिल किए जाने के खिलाफ अपील की गई थी, उनके नाम मतदाता सूची में मौजूद हैं और उन्होंने हालिया विधानसभा चुनाव में मतदान भी किया है.
चुनाव आयोग का सुप्रीम कोर्ट में क्या कहना है?
इन तमाम बदलावों के बावजूद सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग का आधिकारिक रुख यही है कि आयोग ने कोई गलत फैसला नहीं लिया था.
हलफनामे में कहा गया है कि इसे तीनों सदस्यों के सर्वसम्मत फैसले से दाखिल करने की मंजूरी मिली थी.
आयोग ने यह भी कहा कि किसी चुनाव आयुक्त की ओर से लिखा गया नोट अपने आप में चुनाव आयोग का आधिकारिक फैसला नहीं माना जा सकता. इसके लिए जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 18 का हवाला दिया गया है.
आयोग के मुताबिक, जिन मामलों में सुधार की जरूरत थी, वे उन अधिकारियों की ओर से उठाए गए कुछ कदम थे, जिन्हें अलग-अलग जिम्मेदारियां सौंपी गई थीं.
यानी आयोग का कहना है कि समस्या उसके फैसलों में नहीं, बल्कि जिम्मेदारी निभाने वाले अधिकारियों की कुछ कार्रवाइयों में थी.
लेकिन पिछले कुछ सप्ताह में Form 6 से SIR घोषणा हटाने, ECINet का ऑडिट कराने, अधिकारियों की शक्तियां बढ़ाने और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में बदलाव जैसे फैसले एक बड़ा सवाल खड़ा करते हैं.
जब दो चुनाव आयुक्त लगातार 10 महीने तक 14 नोट्स के जरिए आपत्तियां दर्ज करा रहे थे, तो उन पर समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और क्या चुनाव आयोग के भीतर लिए जा रहे फैसलों की प्रक्रिया वास्तव में उतनी पारदर्शी थी, जितनी एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था से अपेक्षा की जाती है?
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रिपोर्ट का केंद्रीय सवाल: चुनाव आयोग के भीतर दो चुनाव आयुक्तों की लगातार आपत्तियों के बाद इतने बड़े बदलाव क्यों हुए, और क्या इन फैसलों की जवाबदेही तय होगी?
Last Updated on November 4, 2026 8:57 am
