‘Not a very happy Diwali’, जानी मानी columnist-author Tavleen Singh ने ऐसा क्यों लिखा?

अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप की हार के बाद दुनिया में ट्रंपवाद के कमजोर पड़ने की उम्मीद जताई जा रही है. वहीं भारत में राहुल गांधी की रामलीला मैदान रैली, बीजेपी की प्रतिक्रिया और विदेशी एजेंटों के आरोपों पर तीखी टिप्पणी सामने आई है. लेख में सरकार से इन आरोपों के सबूत सार्वजनिक करने की मांग की गई है.

रामलीला मैदान की रैली से बीजेपी की बेचैनी तक, लेख में क्या सवाल उठे?
रामलीला मैदान की रैली से बीजेपी की बेचैनी तक, लेख में क्या सवाल उठे?
Donald Trump Defeat: त्योहारों और मौज-मस्ती के इस मौसम में यकीन मानिए, मेरी इच्छा थी कि मैं कोई खुशगवार लेख लिखूं. लेकिन अफसोस, पिछले सप्ताह जो एकमात्र अच्छी खबर आई, वह अमेरिका से थी. वहां डोनाल्ड ट्रंप को मिडटर्म चुनावों में वैसी ही करारी शिकस्त मिली, जिसके वे हकदार थे. यह संभावना कि अब हम ट्रंपवाद के अंत की शुरुआत देख रहे हैं, उम्मीद और खुशी पैदा करती है. यह खुशी दुनिया भर में तेजी से फैली है, क्योंकि ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ के नाम पर ट्रंप ने जो मुसीबतें खड़ी कीं, उनका असर सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं रहा.

देश के भीतर की बात करें तो इस मौज-मस्ती और दावतों के मौसम में लिखने के लिए मैंने कई खुशगवार विषय तलाशे, लेकिन नाकाम रही. दिल्ली की हवा इतनी जहरीली है कि घर से बाहर निकलते ही आंखों से पानी आने लगता है और गले में जलन होने लगती है. इससे भी बुरा यह हुआ कि मुझे दिल्ली के पुराने हिस्से में कुछ काम से जाना पड़ा और वहां अनियोजित शहरीकरण की भयावह तस्वीर देखने को मिली.

बचपन में चांदनी चौक मेरे लिए किसी जादुई दुनिया से कम नहीं था. वहां इत्र और शादी-ब्याह के कपड़ों की पुरानी, खूबसूरत दुकानें हुआ करती थीं. सड़क किनारे बने छोटे-छोटे रेस्तरां में, जब हमारी मां खरीदारी करती थीं, तब मैं और मेरी बहन स्वादिष्ट समोसों और जलेबियों का जमकर आनंद लेते थे.

लेकिन आज पुरानी दिल्ली में जाने की हिम्मत सिर्फ कुछ निडर विदेशी पर्यटक ही जुटा पाते हैं. वहां बदबू है, सीलन है और गंदगी का अंबार है. आसमान पर बिजली के तारों के विशाल गुच्छे इस तरह लटके हुए हैं कि आसमान तक दिखाई नहीं देता.

प्रदूषित हवा और पुरानी दिल्ली की इस यात्रा से भी ज्यादा निराशाजनक राजनीतिक खबरें रहीं.

रामलीला मैदान में राहुल गांधी की रैली ने भारतीय जनता पार्टी को जैसे डरा दिया है. इसके बाद बीजेपी ने अपने प्रवक्ताओं को हर उस न्यूज चैनल पर भेज दिया, जहां उन्हें बोलने का मौका मिल सकता था. वहां वे आक्रामक अंदाज में चिल्लाते रहे कि यह रैली पूरी तरह ‘फ्लॉप’ थी. उनका यह आक्रामक अंदाज सामान्य से भी ज्यादा तीखा था, जबकि वे आमतौर पर भी कम आक्रामक नहीं होते.

कांग्रेस पार्टी का कोई संदेश आम मतदाताओं तक पहुंचने से पहले ही खत्म हो जाए, यह सुनिश्चित करने के लिए वरिष्ठ मंत्रियों को हैदराबाद जैसे दूर-दराज के शहरों की सड़कों पर उतार दिया गया. उनका मकसद था – ‘लोकतंत्र बचाना और अराजकता रोकना’.

जब इसका भी खास असर होता नहीं दिखा तो वही पुराना और घिसा-पिटा आरोप फिर सामने आ गया – ‘विदेशी हाथ’.

जब राहुल गांधी पर आरोप लगाया गया कि उन्हें दुष्ट विदेशी ताकतों का समर्थन हासिल है, तो उन्होंने यह आरोप प्रधानमंत्री पर ही पलट दिया. उन्होंने प्रधानमंत्री को चुनौती दी कि वे अपनी पसंद की किसी जगह पर, अपने चुने हुए जज की मौजूदगी में इस मुद्दे पर उनसे बहस कर लें.

इसके बाद मंत्री सक्रिय हो गए. उन्होंने राहुल गांधी को याद दिलाया कि ऐसी जगह पहले से मौजूद है और उसे संसद कहा जाता है.

फिर कहानी और अंधेरी हो गई. बहुत ज्यादा अंधेरी.

‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के नेताओं पर अराजकतावादी होने और पाकिस्तान तथा अमेरिका में बैठे रहस्यमयी ‘हैंडलर्स’ से संबंध रखने के आरोप लगाए गए.

ये आरोप तब से लगाए जा रहे हैं, जब से इन ‘कॉकरोचों’ ने राष्ट्रीय राजनीति में अपनी मौजूदगी दर्ज करानी शुरू की है. लेकिन अब ये आरोप ज्यादा गंभीर हो गए हैं, क्योंकि इन्हें एक वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री ने लगाया है.

ये वही जितेंद्र सिंह हैं, जिन्होंने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद इन्हीं नेताओं को चाय पर बातचीत के लिए आमंत्रित किया था.

अगर उन्हें मालूम था कि ये विदेशी एजेंट हैं, तो फिर वे इनके इतने करीब क्यों गए? इससे भी बड़ा सवाल यह है कि विदेशी एजेंटों को राष्ट्रीय सुरक्षा की इतनी ऊंची दीवारों में इतनी आसानी से सेंध लगाने का मौका कैसे मिल गया?

जब यह सब हो रहा था, तब हमारे सख्त तेवरों वाले गृहमंत्री क्या कर रहे थे? और आज वे इन बेहद गंभीर मुद्दों से निपटने के बजाय हैदराबाद की सड़कों पर ‘लोकतंत्र बचाने और अराजकता की निंदा करने’ के लिए क्यों घूम रहे हैं?

आखिर बीजेपी जैसी विशाल पार्टी में यह छोटा-मोटा काम करने के लिए भी कई दूसरे लोग मौजूद हैं.

अगर वाकई विदेशी एजेंट भारत में अराजकता और अव्यवस्था फैला रहे हैं, तो अब समय आ गया है कि सरकार इसके सबूत सार्वजनिक करे. किसानों के आंदोलन के बाद विदेशी फंडिंग और ‘टूलकिट’ को लेकर पहली बार आरोप लगाए जाने के बाद से सरकार के पास ऐसा करने के लिए पर्याप्त समय रहा है.

हमारे प्रधानमंत्री लगभग हर दिन हमें याद दिलाते हैं कि उन्होंने अपने से पहले आए सभी प्रधानमंत्रियों के मुकाबले राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने के लिए ज्यादा काम किया है. फिर ये विदेशी एजेंट सुरक्षा की इतनी मजबूत व्यवस्था को भेदने में कामयाब कैसे हो गए?

जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं, तभी से मैं राजनीति पर लिखती रही हूं. मुझे अच्छी तरह याद है कि उन्होंने कितनी बार हमारे बिस्तरों के नीचे विदेशी एजेंट खोज निकाले थे.

वह ‘विदेशी हाथ’ का जिक्र इतनी बार करती थीं कि यह विदेशी संवाददाताओं के बीच मजाक का विषय बन गया था. विदेशी पत्रकारों ने तो इस ‘विदेशी हाथ’ पर कुछ मजेदार कविताएं तक लिख डाली थीं.

इसका निशाना मुख्य रूप से अमेरिकी पत्रकार होते थे, क्योंकि श्रीमती गांधी को लगता था कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA उन्हें अपना दुश्मन मानती है.

फिर, जैसा कि मैंने इस कॉलम में पहले भी लिखा है, नब्बे के दशक में KGB के एक जासूसी अधिकारी वासिली मित्रोखिन (Vasili Mitrokhin) ने अपने संस्मरण प्रकाशित किए. उनमें उन्होंने साफ तौर पर दावा किया था कि इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल के आधे मंत्रियों को सोवियत संघ से पैसा मिलता था.

आज रूस हमारे पक्ष में है और डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पुराने दोस्त नरेंद्र मोदी को छोड़कर पड़ोस में मौजूद इस्लामिक गणराज्य के अपने ‘पसंदीदा फील्ड मार्शल’ के साथ नजदीकियां बढ़ा ली हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि अब आखिर वह ‘विदेशी हाथ’ है किसका?

अगर सरकार के पास ऐसे विदेशी लोगों की जानकारी है, जो ‘कॉकरोचों’ को आर्थिक मदद दे रहे हैं, तो उसे जल्द से जल्द यह जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए. इसकी वजह यह है कि CJP को जेन-जी श्रेणी के युवा भारतीयों के बीच काफी समर्थन हासिल है.

ये वे युवा हैं जो भ्रष्ट परीक्षाओं और आत्मा को कुचल देने वाली बेरोजगारी से जूझ रहे हैं.

ये भी पढ़ें- US Elections: अमेरिकी संसद से विधानसभा तक भारतीयों की जीत, भारत में घुसपैठ पर बहस क्यों?

सरकार के लिए शायद यह ज्यादा समझदारी भरा कदम होगा कि वह इन वास्तविक समस्याओं का समाधान करे, बजाय इसके कि वह बिना ठोस सबूतों के लापरवाही भरे आरोप लगाती रहे.

Last Updated on November 8, 2026 7:39 am

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *