– हैदर अब्बास नक़वी
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ यानी DUSU चुनाव 2026 के नतीजे सिर्फ चार पदों के चुनाव का परिणाम नहीं हैं. ये परिणाम कांग्रेस के छात्र संगठन NSUI के लिए संगठन, टिकट वितरण और जमीनी कार्यकर्ताओं की आवाज को लेकर कई गंभीर सवाल भी खड़े करते हैं.
सबसे बड़ा सवाल है- जब संगठन का अपना सक्रिय छात्र कार्यकर्ता मैदान में था, तो उसे टिकट क्यों नहीं मिला?
दीपांशु शौकीन ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में डूसू के उपाध्यक्ष पद पर 30,615 वोट हासिल किए. उन्होंने ABVP के ईशू मौर्य को 13,705 वोटों से पीछे छोड़ा. NSUI के आधिकारिक उम्मीदवार वीर चतरथ को 4,313 वोट मिले.
यह आंकड़ा अपने आप में NSUI के लिए आत्ममंथन का विषय है.
टिकट नहीं मिला, तो कार्यकर्ता ने स्वतंत्र रास्ता चुना
दीपांशु शौकीन 2023 से छात्र राजनीति में सक्रिय रहे हैं. रिपोर्टों के अनुसार, वे पहले NSUI से जुड़े रहे और संगठन के लिए चुनाव अभियानों में भी काम करते रहे. इस बार टिकट वितरण को लेकर विवाद के बाद उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया.
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह कोई मामूली हार-जीत नहीं रही.
जिस उम्मीदवार को संगठन ने अपना आधिकारिक प्रत्याशी नहीं बनाया, उसी ने 30,615 वोट लेकर उपाध्यक्ष पद जीत लिया.
इसके उलट, NSUI के आधिकारिक उम्मीदवार वीर चतरथ 4,313 वोट पर रह गए.
यानी सवाल केवल यह नहीं है कि दीपांशु जीते क्यों?
सवाल यह भी है कि NSUI दीपांशु को पहचान क्यों नहीं पाई?
वीर चतरथ को टिकट क्यों?
वीर चतरथ कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मनीष चतरथ के बेटे हैं और NSUI के आधिकारिक उपाध्यक्ष उम्मीदवार थे. चुनाव में उन्हें 4,313 वोट मिले और वे तीसरे स्थान पर रहे.
पारिवारिक संबंध के कारण उन्हें टिकट दिया गया. टिकट देने की वास्तविक आंतरिक प्रक्रिया और अंतिम निर्णय के सभी दस्तावेज सार्वजनिक नहीं हैं.
लेकिन लोकतांत्रिक संगठन के लिए सवाल उठना स्वाभाविक है-
क्या टिकट का आधार जमीनी छात्र राजनीति, संगठन में सक्रियता और छात्रों के बीच स्वीकार्यता थी?
अगर ऐसा था, तो 30 हजार से ज्यादा वोट हासिल करने वाले दीपांशु शौकीन को टिकट क्यों नहीं मिला?
और अगर संगठन के पास उन्हें टिकट न देने का कोई दूसरा राजनीतिक या रणनीतिक कारण था, तो क्या उस निर्णय की समीक्षा चुनाव से पहले की गई थी?
Kanhaiya Kumar की भूमिका पर सवाल
कन्हैया कुमार NSUI के प्रभारी हैं और DUSU चुनाव की तैयारियों को लेकर कांग्रेस और NSUI की बैठकों में उनकी मौजूदगी दर्ज हुई थी. अगस्त में हुई एक बैठक में दीपांशु शौकीन और वीर चतरथ दोनों सहित कई छात्र नेताओं के मौजूद रहने की रिपोर्ट भी सामने आई थी.
लेकिन चुनाव के बाद सवाल अब और बड़ा हो गया है-
क्या टिकट देने का फैसला वास्तव में कैंपस की जमीनी स्थिति को समझकर लिया गया था?
क्या छात्र नेताओं की राय ली गई?
क्या कॉलेज स्तर के NSUI कार्यकर्ताओं से पूछा गया कि छात्रों के बीच कौन स्वीकार्य है?
क्या संगठन ने यह समझने की कोशिश की कि छात्र किस तरह के उम्मीदवार को अपना प्रतिनिधि देखना चाहते हैं?
इन सवालों के जवाब कांग्रेस और NSUI के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं.
नंगे पैर प्रचार करने वाला उम्मीदवार
दीपांशु शौकीन का प्रचार भी पारंपरिक चुनावी प्रचार से अलग था.
सत्य निकेतन में निजी छात्र आवास की इमारत गिरने की घटना में पांच DU छात्रों सहित सात लोगों की मौत हुई थी. इसके बाद शौकीन ने छात्र आवास और सुरक्षा के मुद्दे को अपने अभियान के केंद्र में रखा और छात्रों के आवास की समस्या को उजागर करने के लिए नंगे पैर प्रचार किया.
यह संदेश सीधे छात्रों की रोजमर्रा की समस्याओं से जुड़ा था.
यही शायद इस चुनाव का एक बड़ा सबक है-
छात्र राजनीति केवल संगठन के झंडे और पोस्टर से नहीं चलती.
कैंपस में छात्र किससे जुड़ाव महसूस करता है, कौन उसकी समस्या पर उसके साथ खड़ा दिखाई देता है और कौन उसके बीच लगातार मौजूद रहता है- ये बातें भी चुनाव में असर डालती हैं.
NSUI का पूरा पैनल हार गया
DUSU 2026 में ABVP ने चार केंद्रीय पदों में से तीन पर जीत हासिल की. अध्यक्ष पद पर यश डबास, सचिव पद पर रिया छावड़ी और संयुक्त सचिव पद पर लक्ष्म्य राज सिंह विजयी हुए.
उपाध्यक्ष पद निर्दलीय दीपांशु शौकीन ने जीता.
इसका अर्थ यह है कि NSUI चारों केंद्रीय पदों में से एक भी पद नहीं जीत सकी.
Indian Express के अनुसार, 2015 के बाद यह पहली बार है जब NSUI DUSU के केंद्रीय पैनल में कोई सीट नहीं जीत सकी.
यानी मामला केवल दीपांशु शौकीन बनाम वीर चतरथ नहीं रह जाता.
यह अब संगठनात्मक रणनीति का सवाल है.
क्या जमीनी कार्यकर्ता और नेतृत्व के बीच दूरी बढ़ रही है?
राजनीतिक संगठनों की ताकत उनके जमीनी कार्यकर्ताओं से बनती है.
अगर कोई कार्यकर्ता वर्षों तक संगठन के साथ काम करता है, चुनाव लड़ने की तैयारी करता है और अंत में टिकट नहीं मिलने पर निर्दलीय उतरकर संगठन के आधिकारिक उम्मीदवार से कई गुना ज्यादा वोट हासिल कर लेता है, तो संगठन को यह पूछना चाहिए-
गलती उम्मीदवार में थी या उम्मीदवार चुनने की प्रक्रिया में?
दीपांशु शौकीन के 30,615 वोट और वीर चतरथ के 4,313 वोट के बीच का अंतर 26,302 वोट है.
यह अंतर केवल चुनावी गणित नहीं है. यह संगठन के सामने खड़ा हुआ एक राजनीतिक प्रश्न है.
Left से संवाद का सवाल भी महत्वपूर्ण
DUSU में AISA और SFI का Left alliance भी मैदान में था. इस गठबंधन के उम्मीदवारों को विभिन्न पदों पर उल्लेखनीय वोट मिले, लेकिन कोई केंद्रीय पद नहीं जीत सका.
ऐसे में एक और सवाल उठता है-
क्या कांग्रेस और उसके छात्र संगठन को विश्वविद्यालयों में व्यापक लोकतांत्रिक छात्र राजनीति के साथ संवाद बढ़ाना चाहिए?
Left student organisations के साथ वैचारिक मतभेद अपनी जगह हैं. लेकिन छात्र आंदोलनों, फीस, हॉस्टल, परीक्षा, सुरक्षा और विश्वविद्यालय प्रशासन जैसे मुद्दों पर अलग-अलग छात्र संगठनों की आवाज सुनना किसी भी लोकतांत्रिक छात्र राजनीति के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है.
इस चुनाव में छात्र आवास और सुरक्षा प्रमुख मुद्दे रहे.
राहुल गांधी के सामने भी एक संगठनात्मक सवाल
अगर कांग्रेस विश्वविद्यालयों और युवाओं के बीच अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करना चाहती है, तो केवल चुनाव के समय उम्मीदवार तय करना पर्याप्त नहीं होगा.
राहुल गांधी और कांग्रेस नेतृत्व के लिए बड़ा सवाल यह हो सकता है कि-
क्या पार्टी अपने छात्र संगठनों के भीतर से आने वाली आवाज को पर्याप्त महत्व दे रही है?
क्योंकि दिल्ली विश्वविद्यालय का छात्र चुनाव केवल दिल्ली विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं रहता.
यह देश के दूसरे विश्वविद्यालयों और युवा राजनीति के लिए भी संकेत देता है.
अगर जमीनी छात्र कार्यकर्ता यह महसूस करे कि उसकी मेहनत से ज्यादा महत्व संगठन के भीतर के समीकरणों को मिल रहा है, तो वह संगठन से बाहर रास्ता चुन सकता है.
और दीपांशु शौकीन का चुनाव परिणाम इसी बहस को बहुत मजबूती से सामने रखता है.
क्या कांग्रेस के भीतर RSS की विचारधारा से जुड़े लोग हैं?
यह सवाल भी राजनीतिक बहस में उठ सकता है-
क्या कांग्रेस अपने संगठनात्मक फैसलों में अपनी घोषित राजनीतिक और वैचारिक दिशा के अनुरूप पारदर्शिता रख रही है?
और उससे भी बड़ा सवाल-
क्या कांग्रेस के छात्र संगठन अपने जमीनी कार्यकर्ताओं और छात्रों की वास्तविक आवाज सुन रहे हैं?
DUSU का परिणाम कम-से-कम इतना स्पष्ट कर देता है कि इस सवाल को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा.
असली सबक
दीपांशु शौकीन की जीत को केवल NSUI की हार के रूप में देखना शायद इस चुनाव की पूरी तस्वीर नहीं होगी.
यह उस छात्र की जीत भी है जिसने संगठन के बाहर जाकर चुनाव लड़ा और छात्रों से सीधे संवाद किया.
यह उस मुद्दे की जीत है जिसे उसने अपने अभियान में प्रमुखता दी.
और यह स्थापित छात्र संगठनों के लिए एक संदेश भी है कि कैंपस की राजनीति में संगठन का नाम महत्वपूर्ण है, लेकिन छात्र का भरोसा उससे भी अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है.
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अब कांग्रेस और NSUI के सामने सवाल है-
क्या वे इस नतीजे को सिर्फ एक चुनावी हार मानेंगे, या टिकट वितरण, जमीनी कार्यकर्ताओं की भूमिका और छात्र राजनीति की अपनी पूरी रणनीति पर आत्ममंथन करेंगे?
डूसू का यह चुनाव शायद इसी सवाल का सबसे बड़ा राजनीतिक दस्तावेज बन गया है.
(लेखक करीब दो दशकों से ब्रॉडकास्ट और डिजिटल मीडिया में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार, क्रिएटिव डायरेक्टर और कंटेंट क्रिएटर हैं. उन्होंने एनडीटीवी सहित कई प्रमुख मीडिया संस्थानों में काम किया और सावधान इंडिया तथा क्राइम पेट्रोल जैसे चर्चित क्राइम शोज़ में क्रिएटिव डायरेक्टर की भूमिका निभाई. ग्राउंड रिपोर्टिंग, तथ्य आधारित पत्रकारिता और प्रभावी प्रेजेंटेशन से उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई है.)
Last Updated on September 20, 2026 11:06 am
