इस्तीफा हुआ, पेपर लीक पर कार्रवाई हुई… फिर भी क्यों नहीं रुकी छात्रों की मौत?

पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन और मंत्री के इस्तीफे के बावजूद छात्रों पर परीक्षा का दबाव कम नहीं हुआ. जुलाई में तीन 19 वर्षीय छात्रों की मौत ने सवाल खड़े किए हैं. आखिर क्यों नंबर, रैंक और एक परीक्षा को बच्चों के पूरे भविष्य से जोड़ दिया गया है?

कब खत्म होगी बच्चों की ये जानलेवा रेस! (PC-AI)
कब खत्म होगी बच्चों की ये जानलेवा रेस! (PC-AI)
  • प्रत्युष रंजन

पेपर लीक पर प्रदर्शन हुए, इस्तीफ़ा हुआ… लेकिन आत्महत्याएं नहीं रुकी है. जुलाई में महाराष्ट्र, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश में 19-19 साल के तीन छात्रों की मौत की खबरें सामने आई. इनमें दो मामलों में परीक्षा और रैंक से जुड़ा तनाव सामने आया, जबकि तीसरे मामले की जांच जारी है. समस्या पूरे सिस्टम और उस सामाजिक सोच की है, जहां बच्चे की काबिलियत को मार्कशीट से, उसकी बुद्धिमत्ता को रैंक से और उसके भविष्य को एक परीक्षा के नतीजे से मापा जाने लगा है. यह Rat Race 18 साल की उम्र में शुरू नहीं होती. इसकी शुरुआत तो बहुत पहले हो जाती है.

अच्छे स्कूल में एडमिशन चाहिए, क्लास में टॉप करना है, दूसरे बच्चों से ज्यादा नंबर लाने हैं, 10वीं और 12वीं में 95 प्रतिशत चाहिए, फिर NEET, JEE, CUET या कोई दूसरी परीक्षा Crack करनी है, अच्छा कॉलेज चाहिए और उसके बाद अच्छी नौकरी. इस पूरी दौड़ में शायद हम सबसे जरूरी सवाल पूछना ही भूल गए हैं – बच्चा ठीक है?

परिवारों पर समाज का दबाव है और उस दबाव का बोझ अनजाने में बच्चों के कंधों पर डाल दिया जाता है. रिश्तेदार पूछते हैं, कितने नंबर आए? कौन-सा कॉलेज मिला? NEET में क्या रैंक आई? JEE निकला या नहीं? फिर तुलना शुरू होती है, उसके बच्चे का हो गया, तुम्हारा क्यों नहीं हुआ? धीरे-धीरे बच्चे को लगने लगता है कि उसकी उपलब्धियां ही उसकी पहचान हैं और अगर वह इस दौड़ में पीछे रह गया तो शायद उसकी कोई कीमत ही नहीं है.

सबसे बड़ी समस्या शायद यह है कि परिवार कई बार उस दबाव को देख ही नहीं पाता, जिससे उनका बच्चा गुजर रहा होता है. उन्हें उसकी पढ़ाई दिखाई देती है, कोचिंग दिखाई देती है, टेस्ट के नंबर दिखाई देते हैं, मोबाइल पर बिताया समय दिखाई देता है, लेकिन उसके भीतर का डर, असफल होने की घबराहट, भविष्य को लेकर अनिश्चितता और दूसरों से लगातार तुलना किए जाने की तकलीफ दिखाई नहीं देती.

हमारी स्कूली शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था की भी इसमें बड़ी जिम्मेदारी है. स्कूल बच्चों को परीक्षा पास करना सिखाते हैं, लेकिन क्या उन्हें असफलता का सामना करना सिखाते हैं? क्या उन्हें बताया जाता है कि एक खराब रिजल्ट के बाद भी जिंदगी होती है? कि एक परीक्षा में फेल होना जिंदगी में फेल होना नहीं है? कि 18-20 साल की उम्र में करियर का एक रास्ता बंद हो जाए तो जिंदगी दूसरे कई रास्ते खोल सकती है?

हम बच्चों को Competition के लिए तैयार कर रहे हैं, लेकिन Failure, Rejection, Pressure और Uncertainty से लड़ने के लिए कितना तैयार कर रहे हैं? हमारी शिक्षा व्यवस्था में नंबरों, रैंक और प्रवेश परीक्षाओं के लिए जगह है, लेकिन Emotional Resilience, Mental Well-being, Failure Management और Life Skills के लिए कितनी जगह है?

18-20 साल की उम्र तक आते-आते यह Rat Race अपने चरम पर पहुंच जाती है. यही वह उम्र है, जब बच्चे से उम्मीद की जाती है कि वह अपने पूरे भविष्य का फैसला कर ले. एक खराब रैंक, एक असफल प्रयास या मनचाहा कॉलेज न मिलना उसे ऐसा महसूस करा सकता है जैसे आगे कुछ अच्छा बचा ही नहीं. लेकिन 19 साल की उम्र में किसी परीक्षा का परिणाम पूरी जिंदगी का परिणाम कैसे हो सकता है?

परिवार और स्कूलों की जिम्मेदारी सिर्फ बच्चों को सफल बनाना नहीं हो सकती. उन्हें बच्चों को मुश्किल परिस्थितियों से लड़ना, दबाव का सामना करना, असफलता स्वीकार करना, उससे सीखना और फिर सिर उठाकर आगे बढ़ना भी सिखाना होगा. बच्चों को यह भरोसा देना होगा कि तुम हार सकते हो, गिर सकते हो, एक परीक्षा में फेल हो सकते हो, तुम्हारी रैंक खराब हो सकती है, तुम्हें मनचाहा कॉलेज नहीं मिल सकता, लेकिन इनमें से कोई भी चीज तुम्हारी जिंदगी का अंत नहीं है.

पेपर लीक रोकना जरूरी है. दोषियों को सजा मिलनी चाहिए. परीक्षा व्यवस्था को निष्पक्ष बनाना जरूरी है और सरकारों तथा संस्थानों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए. लेकिन उससे भी बड़ी लड़ाई उस सामाजिक और शैक्षणिक व्यवस्था से है, जिसने बच्चों को यह महसूस करा दिया है कि उनकी पूरी जिंदगी का मूल्य एक परीक्षा, एक रैंक, एक कॉलेज या एक करियर से तय होगा.

हमें अपने बच्चों को सिर्फ जीतना नहीं सिखाना है. हमें उन्हें हारकर फिर खड़ा होना भी सिखाना है. क्योंकि किसी परीक्षा में एक साल गंवाना जिंदगी का अंत नहीं है, लेकिन किसी परीक्षा के दबाव में एक जिंदगी गंवा देना परिवार, स्कूल, समाज और पूरी शिक्षा व्यवस्था की सामूहिक हार है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. साल 2004 से डिजिटल पत्रकारिता में हैं. वर्तमान में Chief Editor – Digital Services, AI Integration & Fact Check Press Trust of India हैं.. पूर्व में Hindustan Times, India TV, News Nation, Dainik Jagran समेत कई संस्थानों में काम कर चुके हैं. उनके फेसबुक से लिया गया पोस्ट)

Last Updated on August 2, 2026 9:27 am

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