मारियो पूजो की मशहूर किताब The Godfather की दो बातें याद रखिए.
“बड़े लोग पैदा नहीं होते, बड़े बनते हैं.”
और दूसरी—“जो आदमी अपने बच्चों का पिता नहीं बन पाता, वह असल मायने में आदमी नहीं बन सकता.”
अब इन दोनों बातों को यश की फिल्म Toxic पर रखकर देखिए. दिलचस्प बात ये है कि फिल्म घूम-फिरकर हमें वहीं ले जाती है, जहां राय्या यानी यश अकेला बैठा है और इन्हीं बातों का मतलब समझने की कोशिश कर रहा है.
यहीं से Toxic की असली उलझन शुरू होती है.
फिल्म बनना चाहती है एक बड़ी, स्टाइलिश और हिंसक गैंगस्टर फिल्म. लेकिन साथ ही वह इस हिंसक मर्द की मानसिकता और उसके भीतर के अपराधबोध को भी समझना चाहती है.
नतीजा?
फिल्म कई बार खुद ही तय नहीं कर पाती कि उसे आखिर बनना क्या है.
कभी यह स्टाइलिश क्राइम फिल्म लगती है. कभी मनोवैज्ञानिक ड्रामा. कभी पिता-पुत्र की कहानी. और कभी ऐसा लगता है कि फिल्म बस यश के स्टारडम को बड़े पर्दे पर दिखाने में लगी है.
शुरुआत ही इतनी बड़ी कि सवाल उठने लगे
फिल्म की शुरुआत नादिया यानी कियारा आडवाणी से होती है. वह एक सर्कस कलाकार है और अपने छोटे बेटे टिकट को उसके पिता राय्या के बारे में समझा रही है.
वह बेटे से कहती है कि जिंदगी का एक बड़ा मकसद यह होना चाहिए कि उसका पिता उसे उसके नाम से पुकारे और उसे अपना बेटा स्वीकार करे.
और फिर अचानक नादिया खुद को आग लगा लेती है.
रॉयल सर्कस आग की लपटों में घिर जाता है.
दृश्य बड़ा है. विजुअली फिल्म शुरुआत में ही बता देती है कि पैसा खूब लगाया गया है.
लेकिन समस्या यहीं से शुरू हो जाती है.
क्योंकि कहानी जितनी बड़ी दिखाई जा रही है, उतनी साफ तरीके से बताई नहीं जा रही.
194 मिनट की फिल्म… लेकिन कहानी कहां है?
Toxic करीब 194 मिनट लंबी है.
इतने लंबे समय में दर्शक कम से कम यह तो समझना चाहता है कि किरदार कौन हैं, उनकी कहानी क्या है और वे ऐसा क्यों कर रहे हैं.
लेकिन यहां फिल्म कई किरदारों को लेकर आती है और फिर उन्हें अधूरा छोड़ देती है.
राय्या की बहन गंगा यानी नयनतारा, नादिया, रेबेका यानी तारा सुतारिया, एलिजाबेथ यानी हुमा कुरैशी और मेलिसा यानी रुक्मिणी वसंत—इनमें से ज्यादातर किरदारों की अपनी अलग पहचान ठीक से सामने नहीं आती.
उनकी पहचान लगातार राय्या से जुड़ी रहती है.
यानी वे कौन हैं, यह कम बताया जाता है.
राय्या के लिए वे क्या हैं, यह ज्यादा बताया जाता है.
और यही फिल्म की बड़ी कमजोरी बन जाती है.
राय्या खुद भी बहुत गहराई से नहीं लिखा गया है.
हम उसे बार-बार लोगों को मारते, शराब पीते, धूम्रपान करते, नशा करते, सेक्स करते और बड़े-बड़े डायलॉग बोलते देखते हैं.
अगर यही किसी नौकरी की जिम्मेदारियां होतीं, तो राय्या हर साल ‘Employee of the Year’ जरूर जीतता!
लेकिन मजाक छोड़िए.
फिल्म जिस जटिल किरदार को बनाना चाहती है, उसे उतनी गहराई नहीं मिलती.
फिर भी Toxic को सीधे खारिज क्यों नहीं किया जा सकता?
क्योंकि फिल्म के अंदर कुछ दिलचस्प विचार छिपे हुए हैं.
पूरी कहानी को सात पापों—अहंकार, लालच, वासना, ईर्ष्या, लालच से जुड़ी अतृप्ति, क्रोध और आलस्य—के इर्द-गिर्द पढ़ा जा सकता है.
फिल्म में पिता-पुत्र का रिश्ता भी बेहद महत्वपूर्ण है.
इसे एक तरह से Animal के उलट नजरिए से भी देखा जा सकता है.
लेकिन फर्क यह है कि यहां ‘डैडी इश्यू’ को सिर्फ मर्दानगी दिखाने के लिए इस्तेमाल नहीं किया गया. फिल्म एक ऐसे आदमी को दिखाना चाहती है जो अपने किए की कीमत चुकाता है.
राय्या खुद को बहुत ताकतवर समझता है.
लेकिन आखिर में उसे अपने ही अतीत और अपने अपराधबोध के सामने झुकना पड़ता है.
Toxic में Hamlet का कनेक्शन भी है
फिल्म को अगर ध्यान से देखें तो इसमें Shakespeare के Hamlet की छाया भी नजर आती है.
Hamlet में मरा हुआ पिता अपने बेटे के सामने आकर बदला लेने की बात करता है.
Toxic में कहानी कुछ उलट जाती है.
यहां टिकट की मौजूदगी राय्या के अपराधबोध से जुड़ जाती है.
क्लाइमैक्स में यह सवाल उठता है कि टिकट वास्तव में मौजूद है या वह राय्या के दिमाग का एक हिस्सा है?
यहीं फिल्म अचानक दिलचस्प हो जाती है.
एक सीन में राय्या कार चला रहा है और टिकट पीछे बैठा है. बच्चे के मासूम सवाल राय्या के जमीर को परेशान करते हैं.
राय्या गुस्से में कार से बाहर निकलता है. कार आगे बढ़ती है और झील में गिर जाती है.
राय्या टिकट को बचाने के लिए पानी में कूदता है.
लेकिन निर्देशक यह साफ नहीं करतीं कि क्या राय्या ने जानबूझकर कार को गिरने दिया था.
यही अस्पष्टता फिल्म को एक अलग अर्थ देती है.
आग से बर्फ तक… यही है Toxic का सबसे दिलचस्प हिस्सा
फिल्म की शुरुआत में रॉयल सर्कस आग में जलता है.
छोटा टिकट अपने घर और मां को आग में खत्म होते देखता है.
राय्या थोड़ी दूर खड़ा है.
अब क्लाइमैक्स पर पहुंचिए.
वही दोनों लगभग उसी स्थिति में दिखाई देते हैं.
लेकिन इस बार आग नहीं, बर्फ है.
टिकट के चेहरे पर वही जोकर वाला मेकअप है.
और उनकी तरफ हिमस्खलन बढ़ रहा है.
अब सवाल उठता है—क्या उस रात की आग में टिकट और राय्या दोनों की मौत हो गई थी?
क्या बाद में दिखाई गई पूरी कहानी राय्या के दिमाग की बनाई हुई दुनिया थी?
क्या निर्देशक ने आग को बर्फ में बदलकर दोनों किरदारों को हमेशा के लिए एक साथ कर दिया?
फिल्म इन सवालों का सीधा जवाब नहीं देती.
और शायद यही इसका सबसे मजबूत हिस्सा है.
लेकिन महिलाओं को लेकर फिल्म फंस जाती है
यहां Toxic की सबसे बड़ी समस्या सामने आती है.
फिल्म पितृसत्ता और हिंसक मर्दानगी को तोड़ने की कोशिश करती दिखाई देती है, लेकिन महिलाओं को जिस तरह दिखाया गया है, वह उसी पुराने ‘मेल गेज’ से बाहर नहीं निकल पाती.
यानी कैमरा कई जगह महिलाओं को उनकी कहानी के लिए नहीं, बल्कि पुरुष किरदार की दुनिया का हिस्सा बनाकर देखता है.
सेक्स सीन भी ज्यादातर राय्या के चरित्र को आगे बढ़ाते हैं. महिलाओं के चरित्र को नहीं.
एक दृश्य में राय्या कई महिलाओं के साथ बिस्तर पर दिखाई देता है. दूसरे दृश्य में वह एक महिला के शरीर से कोकीन लेता है.
फिल्म इसे उसके चरित्र की खराब मानसिकता दिखाने के लिए इस्तेमाल कर सकती थी.
लेकिन समस्या यह है कि ऐसे दृश्य हमेशा उस मकसद को मजबूत नहीं कर पाते.
तकनीकी तौर पर फिल्म शानदार है
यहां Toxic को क्रेडिट देना होगा.
प्रोडक्शन डिजाइन बेहद शानदार है.
कैमरामैन राजीव रवि कई जगह कमाल करते हैं.
आग, रोशनी और अंधेरे का इस्तेमाल खास तौर पर प्रभावशाली है.
मैकाऊ के सीक्वेंस भी देखने लायक हैं.
लेकिन स्लो मोशन की इतनी भरमार है कि कई बार लगता है फिल्म आगे बढ़ने के बजाय वहीं खड़ी है.
म्यूजिक भी कई जगह जरूरत से ज्यादा तेज और भारी हो जाता है.
और एडिटिंग असमान है.
कहीं सीन बहुत तेजी से कट होता है, तो कहीं इतना धीरे कि दर्शक घड़ी देखने लगे.
हालांकि यश के डबल रोल वाले हिस्सों में एडिटिंग काफी अच्छी है.
और यश?
यश स्टार हैं.
यह बात फिल्म बार-बार याद दिलाती है.
लेकिन समस्या यही है.
Toxic कहीं-कहीं एक किरदार की कहानी कम और ‘यश फिल्म’ ज्यादा लगती है.
रॉकी यानी KGF की छाया भी पूरी तरह नहीं जाती.
यश जब स्क्रीन पर आते हैं तो फिल्म का कैमरा उन्हें बड़ा बनाने में लग जाता है.
लेकिन जिस वक्त कहानी को उनके किरदार के अंदर जाना चाहिए, फिल्म कई बार फिर स्टाइल और एक्शन की तरफ लौट जाती है.
तो क्या Toxic खराब फिल्म है?
पूरी तरह नहीं.
और क्या यह वह शानदार फिल्म बन पाई है, जो बनने की कोशिश करती है?
शायद नहीं.
Toxic के पास महत्वाकांक्षा है.
इसमें अपराधबोध है. पिता-पुत्र का रिश्ता है. पितृसत्ता पर सवाल है. मर्दानगी पर सवाल है. सात पापों का विचार है. Hamlet जैसी परतें हैं.
लेकिन इन सबको जोड़ने वाली कहानी उतनी मजबूत नहीं है.
सबसे दिलचस्प बात यह है कि फिल्म जिस ‘पैन-इंडियन’ मर्दाना सिनेमा के फॉर्मूले को तोड़ना चाहती है, आखिर में कई जगह उसी फॉर्मूले में फंस जाती है.
यही Toxic की सबसे बड़ी विडंबना है.
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फिल्म उस चीज को तोड़ना चाहती है, जिससे वह खुद बार-बार बनती हुई दिखाई देती है.
और शायद यही वजह है कि Toxic देखने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह नहीं रहता कि राय्या अच्छा आदमी था या बुरा.
सवाल यह रह जाता है—
क्या वह उस मर्दानगी से कभी बाहर निकल पाया, जिसे फिल्म शुरू से खत्म करना चाहती थी?
Last Updated on August 30, 2026 4:03 pm
