Nepal Flood: नेपाल-तिब्बत सीमा के पास पहाड़ों पर अचानक आई बाढ़ और गिरते पत्थरों ने सबको अपनी चपेट में ले लिया. सड़क पर पानी और मलबा तेजी से बढ़ रहा था. बसें फंस चुकी थीं और सामने पहाड़ से पत्थर गिर रहे थे. ऐसे में 21 भारतीय तीर्थयात्रियों के लिए एक साड़ी जिंदगी की सबसे बड़ी उम्मीद बन गई.
Indian Express ने इस घटना की ग्राउंड रिपोर्ट में बताया है कि नेपाल से सुरक्षित लौटे इन तीर्थयात्रियों ने किस तरह मौत के मुंह से निकलकर अपनी जान बचाई.
चेन्नई के रहने वाले नवु कबीरदास और उनकी पत्नी विजया भुवनेश्वरी भी इस समूह में शामिल थे. दोनों का कहना है कि उन्हें ऐसा लग रहा है जैसे उन्हें दूसरी जिंदगी मिली हो.
ये लोग कुल 57 यात्रियों के समूह में तीन बसों से नेपाल के रसुवा इलाके से गुजर रहे थे. उनकी बस काठमांडू से चीन की सीमा की ओर जा रही थी. रास्ते में बस कीचड़ में फंस गई और कुछ देर के लिए उसे रोकना पड़ा.
यही कुछ मिनट बाद में इन यात्रियों की जिंदगी बचाने वाले साबित हुए.
कबीरदास के मुताबिक, अचानक ऐसा तेज धमाका सुनाई दिया जैसे कोई बम फटा हो. इसके बाद पहाड़ से पत्थर गिरने लगे. देखते ही देखते बाढ़ का पानी इस तरह आया जैसे किसी बांध के टूटने के बाद पानी छोड़ा गया हो.
पीछे चल रही बस भी पानी की चपेट में आने लगी. नेपाली ड्राइवर ने खतरा भांप लिया और यात्रियों से तुरंत बस छोड़कर ऊपर की तरफ भागने को कहा.
लेकिन ऊपर जाना भी आसान नहीं था.
करीब एक मंजिल ऊंची कीचड़ भरी चढ़ाई थी. यात्री बार-बार फिसल रहे थे. रास्ते में कांटेदार झाड़ियां थीं और नीचे तेज पानी बह रहा था.
तभी समूह की एक महिला पूंगोडी ने अपनी साड़ी उतारी और उसे ऊपर से नीचे की तरफ लटका दिया.
बाकी यात्रियों ने साड़ी और वहां मौजूद एक केबल को मजबूती से पकड़ा और एक-एक करके ऊपर चढ़ने लगे.
एक महिला अकेले ऊपर नहीं चढ़ पा रही थी. तब उसने साड़ी को अपनी कमर में बांधा और बाकी लोगों ने उसे खींचकर ऊपर पहुंचाया.
यात्रियों के मुताबिक, सामने का मंजर किसी फिल्म जैसा था.
कांचीपुरम जिले की एक स्कूल हेडमिस्ट्रेस सत्य ने बताया कि उन्हें शुरू में दूर से धूल का गुबार दिखाई दिया. लेकिन कुछ ही सेकंड में समझ आया कि वह धूल नहीं, बल्कि पहाड़ से आता हुआ पानी, पत्थर और मलबा था.
उन्होंने बताया कि मलबे की लहर करीब 70 से 80 फीट ऊंची दिखाई दे रही थी. वह इतनी तेज थी कि उन्हें लगा जैसे सुनामी पहाड़ पर आ गई हो.
यात्री किसी तरह एक आर्म्ड पुलिस फोर्स कैंप तक पहुंचे. वहां उन्हें पानी और बिस्किट मिले. मोबाइल नेटवर्क मिलने पर उन्होंने अपनी तस्वीर तमिलनाडु भेजी, ताकि परिवारों को पता चल सके कि वे जिंदा हैं.
लेकिन खतरा अभी खत्म नहीं हुआ था.
अगले दिन इन लोगों को करीब तीन घंटे तक कांटेदार झाड़ियों और बेहद संकरे पहाड़ी रास्तों से गुजरना पड़ा. कई जगह रास्ते के एक तरफ गहरी खाई थी. जरा सी गलती का मतलब सीधे नीचे गिरना हो सकता था.
आखिरकार वे हेलिकॉप्टर से निकाले गए. इसके बाद काठमांडू और नई दिल्ली के रास्ते चेन्नई पहुंचे.
कई यात्रियों के पासपोर्ट और दूसरे जरूरी दस्तावेज बाढ़ में खो गए. एक यात्री ने नेपाल सरकार, नेपाल सेना, भारतीय दूतावास और तमिलनाडु सरकार का धन्यवाद किया.
लेकिन इस कहानी का सबसे दर्दनाक हिस्सा अभी बाकी है.
इन तीन बसों में कुल 57 लोग थे. इनमें से 36 यात्रियों से शनिवार तक संपर्क नहीं हो पाया था.
इसके अलावा चेन्नई से गए अलग 49 तीर्थयात्रियों का एक समूह भी लापता बताया गया. ये लोग बाढ़ आने से कुछ समय पहले चीन की तरफ स्थित ग्यिरोंग पोर्ट के इमिग्रेशन भवन में मौजूद थे.
तमिलनाडु के मंत्री ए राजमोहन के मुताबिक, नेपाल में तमिलनाडु से 400 से ज्यादा लोग गए थे और करीब 90 लोगों से संपर्क नहीं हो पाया था. हालांकि, अधिकारियों की ओर से जारी आंकड़ों में अभी पूरी तरह स्पष्टता नहीं है कि ये संख्या अलग-अलग समूहों के आंकड़ों से कैसे मेल खाती है.
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यानी नेपाल की इस तबाही में कुछ लोगों के लिए एक साड़ी जिंदगी की डोर बन गई, लेकिन दर्जनों परिवार अभी भी अपने अपनों की खबर का इंतजार कर रहे हैं.
Last Updated on August 30, 2026 1:30 pm
