Child Nutrition: मां का साया नहीं, दादी का सहारा था… 4.5 किलो के अतुल की कहानी कुपोषण का दर्द बताती है

छिंदवाड़ा के तामिया ब्लॉक के गंगवानी गांव में एक साल का अतुल गंभीर बीमारियों और अति-कुपोषण से जूझ रहा था. उसका वजन महज 4.5 किलो रह गया था. मां के निधन के बाद वृद्ध दादी उसे लेकर जिला अस्पताल के पोषण पुनर्वास केंद्र पहुंचीं. 14 दिन के इलाज के बाद उसका वजन 5.5 किलो हुआ.

4.5 किलो के अतुल को 14 दिन के इलाज ने दी नई उम्मीद
4.5 किलो के अतुल को 14 दिन के इलाज ने दी नई उम्मीद

– धीरेंद्र गुप्ता

छिंदवाड़ा। देश आजादी के 80 साल पूरे करने की ओर बढ़ चुका है, लेकिन कुपोषण का संकट अब भी बचपन (Child Nutrition) का पीछा नहीं छोड़ रहा. सरकारें योजनाओं, अभियानों और विज्ञापनों के जरिए कुपोषण खत्म करने के दावे करती हैं, लेकिन जमीनी तस्वीर कई बार इन दावों से बिल्कुल अलग नजर आती है. छिंदवाड़ा के तामिया ब्लॉक के सुदूर गंगवानी गांव का एक साल का मासूम अतुल इसी हकीकत की दर्दनाक तस्वीर सामने लाता है.

अतुल की मां का साया उसके सिर से पहले ही उठ चुका है. इसके बाद गंभीर बीमारियों और अति-कुपोषण ने उसकी मुश्किलें और बढ़ा दीं. हालत यह थी कि एक साल के बच्चे का वजन महज 4.5 किलो रह गया था. मासूम की हालत देखकर उसकी वृद्ध और अनपढ़ दादी को ही उसके इलाज के लिए संघर्ष करना पड़ा.

दादी लेकर पहुंचीं पोषण पुनर्वास केंद्र

बीते 27 जुलाई को अतुल की दादी उसे लेकर जिला अस्पताल स्थित पोषण पुनर्वास केंद्र यानी NRC पहुंचीं. यहां बच्चे को भर्ती कर उपचार शुरू किया गया.

करीब 14 दिनों तक NRC में उसका इलाज चला. इस दौरान संक्रमण को नियंत्रित करने के साथ बच्चे को पोषण देने पर विशेष ध्यान दिया गया. पोषण प्रशिक्षक अंकिता साहू और डॉ. एल.एन. साहू की देखरेख में इलाज और पोषण प्रबंधन किया गया.

इलाज के बाद अतुल का वजन 4.5 किलो से बढ़कर 5.5 किलो हो गया. डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की मेहनत के साथ उसकी दादी का संबल भी इस मुश्किल दौर में उसके लिए बेहद अहम रहा.

मासूम को नई जिंदगी जरूर मिली, लेकिन उसकी कहानी सिर्फ एक बच्चे के ठीक होने की कहानी नहीं है. यह उस व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करती है, जिसके तहत कुपोषण से जूझ रहे बच्चों तक समय रहते मदद पहुंचनी चाहिए.

करोड़ों खर्च, फिर भी सवाल क्यों?

आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में कुपोषण खत्म करने के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं. आंगनवाड़ी, पोषण अभियान, स्वास्थ्य सेवाओं और पोषण पुनर्वास केंद्रों के जरिए बच्चों तक जरूरी पोषण और इलाज पहुंचाने की व्यवस्था होने का दावा किया जाता है.

फिर सवाल यह है कि अतुल की हालत इतनी गंभीर होने तक व्यवस्था को इसकी जानकारी क्यों नहीं हुई?

जब एक साल का बच्चा गंभीर बीमारियों और अति-कुपोषण से जूझ रहा था, तब महिला एवं बाल विकास विभाग और स्वास्थ्य विभाग की स्थानीय निगरानी व्यवस्था कहां थी?

क्यों एक वृद्ध और अनपढ़ दादी को अपने पोते की जान बचाने के लिए खुद सिस्टम के दरवाजे खटखटाने पड़े?

अतुल का वजन बढ़ना राहत की बात जरूर है, लेकिन यह मामला याद दिलाता है कि कुपोषण सिर्फ आंकड़ा नहीं है. यह उस बच्चे का बचपन है, जो दो वक्त के पौष्टिक आहार के लिए आज भी तरस रहा है.

Last Updated on August 25, 2026 12:17 pm

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