Waste Colonialism: भारत ने अंग्रेजी हुकूमत से आजादी हासिल किए 80 साल पूरे कर लिए हैं. लेकिन मद्रास हाई कोर्ट के एक हालिया फैसले ने एक अलग तरह के ‘औपनिवेशिक शोषण’ की तरफ ध्यान खींचा है.
मामला है विदेशों से भारत भेजे गए ऐसे कचरे का, जिसे कागज के कचरे यानी waste paper के नाम पर import किया गया था. जांच हुई तो containers में सिर्फ recycling के लिए भेजा गया paper नहीं मिला, बल्कि बड़ी मात्रा में municipal solid waste यानी घरेलू और शहरी कचरा भी मिला.
इसी मामले की सुनवाई करते हुए मद्रास हाई कोर्ट ने इसे “waste colonialism” यानी ‘कचरा औपनिवेशिकता’ की गंभीर समस्या बताया. Court ने कहा कि विकसित देशों का अपना जहरीला या unwanted waste विकासशील देशों पर डालना environmental justice, public health और receiving country’s sovereignty के लिए गंभीर खतरा है.
आखिर हुआ क्या था?
मामला दो भारतीय paper manufacturers का था – M/s Sripathi Paper and Boards Pvt. Ltd. और M/s Rajarajeswari Krafts Pvt. Ltd.
दोनों कंपनियां paper बनाने के लिए विदेशों से waste paper import करती थीं.
Sripathi ने Canada की एक कंपनी से waste paper मंगाया था. Documents में माल को “Waste Paper – News & Pams” बताया गया था.
जून 2022 में Tuticorin Port पर जब Directorate of Revenue Intelligence यानी DRI ने consignment की जांच की तो तस्वीर बदल गई.
पांच containers में सिर्फ waste paper नहीं था.
उनमें इस्तेमाल की हुई PET bottles, plastic bags, plastic containers, broken glass bottles, soft-drink cans, street sweepings और दूसरे municipal waste पाए गए.
Tamil Nadu Pollution Control Board ने भी जांच के बाद पुष्टि की कि cargo में municipal solid waste मौजूद था.
और यही सबसे बड़ी समस्या थी.
भारत में ऐसे municipal solid waste का import प्रतिबंधित है.
यानी जिस चीज को recycling के लिए waste paper बताकर भारत लाया गया था, उसमें ऐसा कचरा मिला जिसे भारत में import करने की इजाजत ही नहीं थी.
फिर कंपनियों ने क्या कहा?
Companies ने अदालत में कहा कि उन्होंने सिर्फ waste paper मंगाया था.
Sripathi ने यह भी कहा कि वह इस consignment को वापस भेजने के लिए तैयार है.
लेकिन विवाद यहां पैदा हुआ कि इसे वापस भेजा कहां जाए.
Companies ने एक विकल्प रखा कि shipment को Dubai re-export करने की अनुमति दी जाए.
यानी कचरा Canada से भारत आया.
भारत में पकड़ा गया.
और अब उसे Canada वापस भेजने के बजाय Dubai भेजने की मांग की गई.
यहीं Madras High Court ने सख्त रुख अपनाया.
Court ने Dubai भेजने से क्यों मना किया?
Court का तर्क बहुत सीधा था.
अगर भारत में illegal तरीके से आया municipal waste वापस उसके मूल देश Canada या US भेजा जाना चाहिए, तो उसे किसी तीसरे देश में भेजकर समस्या को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता.
Court ने कहा कि एक illegal काम को ठीक करने के लिए दूसरा illegal रास्ता नहीं अपनाया जा सकता.
इस मामले में अदालत ने यह भी माना कि ऐसा waste किसी तीसरे देश में भेजना उस देश पर भी environmental burden डाल सकता है. Court के मुताबिक Basel Convention का मूल उद्देश्य ही यह सुनिश्चित करना है कि illegal waste movement की जिम्मेदारी उस देश और exporter पर रहे जहां से waste आया है.
इसलिए अदालत ने Dubai भेजने की मांग खारिज कर दी.
Waste को उसके मूल देश वापस भेजने का निर्देश दिया गया.
यानी Canada से आया तो Canada.
US से आया तो US.
किसी तीसरे देश में भेजकर जिम्मेदारी से बचने की अनुमति नहीं.
‘Waste Colonialism’ क्या है?
यही इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है.
Court ने “waste colonialism” शब्द का इस्तेमाल करते हुए कहा कि विकसित देश अगर अपना hazardous, toxic या unwanted waste विकासशील देशों में भेजते हैं, तो वे उस waste के disposal का environmental और social burden दूसरे देशों पर डाल रहे हैं.
मतलब आसान भाषा में समझिए.
जिस देश में कचरा पैदा हुआ, वह उसे अपने यहां dispose करने के बजाय दूसरे देश भेज दे.
वहां जमीन प्रदूषित होगी.
पानी प्रभावित हो सकता है.
लोगों की health पर असर पड़ सकता है.
लेकिन कचरा पैदा करने वाला देश उस environmental cost से बच जाता है.
Court ने इसी व्यवस्था को ‘waste colonialism’ कहा और इसे environmental justice के खिलाफ बताया.
भारत को इस पर आपत्ति क्यों है?
भारत खुद हर दिन भारी मात्रा में municipal solid waste पैदा करता है और उसके management की चुनौती पहले से बड़ी है.
Madras High Court ने अपने फैसले में कहा कि भारत रोजाना 1,70,000 tonnes से ज्यादा municipal solid waste पैदा करता है और collection, segregation, treatment और disposal जैसी समस्याओं से पहले ही जूझ रहा है.
ऐसे में विदेशों का municipal waste भारत में लाना और बड़ी समस्या पैदा कर सकता है.
Court ने यह भी सवाल उठाया कि जब भारत में waste paper पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है, तो विदेश से इसे import करने की जरूरत और business model को भी गंभीरता से देखना चाहिए.
यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि container में क्या आया.
सवाल यह भी है कि विदेश से कचरा मंगाने की जरूरत ही क्यों पड़ी?
क्या यह सिर्फ एक कंपनी की गलती थी?
Court ने मामले में importers की due diligence पर भी सवाल उठाए.
अदालत के सामने रिकॉर्ड में यह बात आई कि consignments में prohibited municipal waste मौजूद था और adjudicating authority ने पाया था कि importers ने due diligence नहीं की थी.
Court ने यह भी कहा कि records में ऐसा material था जिससे यह चिंता पैदा होती है कि waste paper के नाम पर municipal solid waste भारत में लाने की कोशिश की गई हो सकती है.
हालांकि किसी भी criminal conspiracy का अंतिम निष्कर्ष निकालते समय अदालत के आदेश और संबंधित proceedings को ही आधार बनाया जाना चाहिए.
Court ने किस बात पर सबसे ज्यादा जोर दिया?
सबसे अहम बात यह है कि अदालत ने कहा कि अगर कोई waste गलत तरीके से भारत आया है, तो उसे भारत में ही dispose नहीं किया जा सकता.
Companies ने भारत में disposal का विकल्प भी मांगा था.
लेकिन Court ने इसे स्वीकार नहीं किया.
क्यों?
क्योंकि इससे भारत उस waste का destination बन जाता जिसे कानून भारत में आने से रोकता है.
Court ने साफ कहा कि regulatory framework का उद्देश्य ही यह है कि भारत दूसरे देशों में पैदा हुए waste के disposal का destination न बने.
यानी logic बेहद simple है.
जिस कचरे को भारत में आने की इजाजत ही नहीं है, उसे भारत में recycling या disposal के नाम पर रखने की इजाजत कैसे दी जा सकती है?
यह मामला बड़ा क्यों है?
क्योंकि यह सिर्फ पांच containers या दो companies का मामला नहीं है.
यह सवाल है कि दुनिया में waste का burden किसके हिस्से में जा रहा है.
अगर कोई विकसित देश अपना unwanted waste किसी गरीब या विकासशील देश में भेजता है, तो वहां सिर्फ कचरा नहीं पहुंचता.
उसके साथ pollution का risk आता है.
Soil contamination का खतरा आता है.
Water pollution की आशंका आती है.
और लंबे समय में public health पर असर पड़ सकता है.
इसीलिए Madras High Court ने इसे सिर्फ customs violation की तरह नहीं देखा, बल्कि इसके environmental और sovereignty implications पर भी जोर दिया. (Indian Kanoon)
सवाल सिर्फ कचरे का नहीं, जिम्मेदारी का भी है
इस फैसले से एक बड़ा सवाल निकलता है.
अगर किसी देश में कचरा पैदा हुआ है, तो उसकी जिम्मेदारी भी उसी देश की होनी चाहिए या नहीं?
और अगर कोई exporter गलत तरीके से waste दूसरे देश भेज देता है, तो receiving country उसे किसी तीसरे देश में भेजकर अपनी जिम्मेदारी खत्म कर सकती है?
Madras High Court का जवाब साफ है.
नहीं.
Illegal waste को आगे किसी और देश पर नहीं डाला जा सकता.
उसे उसके source country वापस भेजना होगा.
यही वजह है कि Court ने Canada और US से आए consignments को उनके origin countries वापस भेजने का रास्ता चुना.
आजादी के 80 साल बाद सवाल
भारत ने औपनिवेशिक शासन से आजादी हासिल की.
लेकिन Madras High Court का यह फैसला एक नए सवाल की तरफ इशारा करता है.
क्या आज की दुनिया में औपनिवेशिकता सिर्फ जमीन पर कब्जे का नाम है?
या फिर किसी दूसरे देश के environmental burden को अपने ऊपर डालना भी एक तरह का शोषण है?
अदालत ने इसे “waste colonialism” कहा है.
और शायद इस फैसले की सबसे बड़ी सीख यही है.
भारत recycling के नाम पर विदेशों का dumping ground नहीं बन सकता.
कचरा अगर Canada या US में पैदा हुआ है, तो उसकी जिम्मेदारी भी वहीं से शुरू होनी चाहिए.
और भारत के लिए सवाल अब सिर्फ यह नहीं है कि कितने containers में विदेशी कचरा आया.
सवाल यह है…
ये भी पढ़ें- Delhi में 1,777 H1N1 केस, केरल में 88 मौतें: कितना खतरनाक है Swine Flu?
कौन ला रहा है, किस नाम पर ला रहा है, किसकी अनुमति से ला रहा है और आखिर इसकी environmental कीमत कौन चुकाएगा?
यही वे सवाल हैं जिनका जवाब आने वाले समय में भारत की waste management policy और environmental governance के लिए बेहद महत्वपूर्ण होगा.
Last Updated on August 24, 2026 6:14 pm
