‘Modi effect’ से भारत को कितना फायदा, कितना नुकसान? नई स्टडी में प्रति व्यक्ति आय पर बड़ा दावा

जैसे-जैसे पूरे भारत में नरेंद्र मोदी को लेकर थकान साफ तौर पर महसूस की जाने लगी है, वैसे-वैसे एक और ज्यादा बुनियादी सवाल उठ रहा है: क्या बदलाव के वादों के बावजूद हमें शुरू से ही ठगा जाता रहा? क्या ‘अच्छे दिन’, ‘न्यू इंडिया 2022’ और ‘विकसित भारत 2047’ जैसे चिकने-चुपड़े नारों के पीछे कोई बहुत बड़ा खालीपन था? अब राजनीतिक वैज्ञानिक केविन ग्रियर और रॉबिन ग्रियर की एक स्टडी हमारे इन संदेहों की पुष्टि करती है.

मोदी सरकार में भारत कितना बदला?
मोदी सरकार में भारत कितना बदला?

Modi effect: भारत में नरेंद्र मोदी को लेकर थकान और असंतोष की चर्चा अब ज्यादा साफ दिखाई देने लगी है. ऐसे में एक ज्यादा बुनियादी सवाल उठ रहा है—क्या बदलाव के बड़े-बड़े वादों के बावजूद हमें अब तक सिर्फ बहकाया गया? क्या ‘अच्छे दिन’, ‘न्यू इंडिया 2022’ और ‘विकसित भारत 2047’ जैसे नारों के पीछे कोई बड़ी कमी छिपी हुई थी?

अब राजनीतिक वैज्ञानिक केविन ग्रियर और रॉबिन ग्रियर की एक स्टडी ने इन आशंकाओं को आंकड़ों के जरिए परखने की कोशिश की है. संक्षेप में कहें तो Texas Tech University के शोधकर्ताओं की ओर से प्रकाशित इस पेपर का दावा है कि मोदी के नेतृत्व में भारत की शासन व्यवस्था और प्रति व्यक्ति आय में बढ़ोतरी, उस स्थिति से खराब रही, जैसी वह अन्य परिस्थितियों में हो सकती थी. यानी अगर सरकार मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली UPA, अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली NDA या यहां तक कि United Front गठबंधन की तरह चलती, तो प्रदर्शन बेहतर हो सकता था.

‘Strongman Bargain’ का सवाल

कुछ मतदाता populist नेताओं की ओर इसलिए आकर्षित होते हैं क्योंकि वे एक तरह का ‘Strongman Bargain’ पेश करते हैं. यानी मजबूत नेता के बदले कमजोर होती संस्थाओं को स्वीकार करना, इस उम्मीद में कि आर्थिक प्रदर्शन बेहतर होगा.

लेकिन इस स्टडी का दावा है कि मोदी के नेतृत्व में भारत को दोनों तरफ से नुकसान हुआ—संस्थाएं कमजोर हुईं और आर्थिक विकास भी अपेक्षा से धीमा रहा.

दूसरे शब्दों में, स्टडी के मुताबिक मोदी ने भारत को बदला जरूर, लेकिन यह बदलाव बेहतर दिशा में नहीं गया.

इस तर्क का आधार उन कई आर्थिक और राजनीतिक सिद्धांतों से जुड़ा है, जो मजबूत संस्थाओं और आर्थिक समृद्धि के बीच संबंध बताते हैं. इस संदर्भ में Rodrik et al. और Acemoglu et al. के शोध का भी हवाला दिया गया है.

‘Synthetic India’ से कैसे की गई तुलना?

शोधकर्ताओं ने इसके लिए एक स्वीकार्य सांख्यिकीय तकनीक Synthetic Control Method का इस्तेमाल किया.

उन्होंने एक तरह का ‘जुड़वां भारत’ तैयार किया, जिसे ‘Synthetic India’ नाम दिया गया. इसमें भारत जैसी परिस्थितियों वाली दूसरी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के आर्थिक प्रदर्शन को अलग-अलग वजन देकर एक मॉडल बनाया गया.

खास बात यह है कि ‘Synthetic India’ और वास्तविक भारत के बीच करीब 30 साल की अवधि में मजबूत समानता दिखाई दी. शोधकर्ताओं का कहना है कि इससे यह counterfactual मॉडल अपेक्षाकृत मजबूत बनता है और यह अनुमान लगाने में मदद मिलती है कि 2014 के बाद भारत का प्रदर्शन किस स्तर पर होना चाहिए था.

स्टडी के दो बड़े निष्कर्ष

पेपर में मुख्य रूप से दो बड़े निष्कर्ष सामने रखे गए हैं.

पहला, संस्थागत मजबूती को मापने वाले सभी 10 governance indicators में मोदी के भारत में तेज गिरावट दर्ज की गई.

इनमें liberal democracy, judicial constraints, political corruption और freedom of expression जैसे संकेतक शामिल थे.

यानी स्टडी का दावा है कि मोदी सरकार के दौर में सिर्फ एक या दो संस्थागत संकेतकों में गिरावट नहीं आई, बल्कि संस्थागत मजबूती को मापने वाले सभी 10 संकेतकों में गिरावट देखने को मिली.

10 governance indicators में मोदी प्रभाव

दूसरा और ज्यादा गंभीर दावा प्रति व्यक्ति आय को लेकर है.

शोधकर्ताओं के मुताबिक, 2023 में भारत की प्रति व्यक्ति आय उस स्तर से करीब 10 प्रतिशत कम थी, जिस स्तर पर वह अन्यथा पहुंच सकती थी.

यह निष्कर्ष उन लोगों के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण है जो कमजोर संस्थाओं को मजबूत आर्थिक प्रदर्शन के बदले स्वीकार करने को तैयार रहते हैं.

यह निष्कर्ष दुनिया के दूसरे देशों पर हुए एक शोध से भी मिलता-जुलता है. उस शोध के मुताबिक, दुनिया भर में वाम और दक्षिण दोनों तरह के populist नेताओं के शासन में 15 साल की अवधि के दौरान राष्ट्रीय GDP प्रति व्यक्ति में करीब 10 प्रतिशत की कमी आई.

लेकिन क्या यह स्टडी अंतिम सच है?

यहां रुकना जरूरी है.

किसी भी academic paper को अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता. इस स्टडी में इस्तेमाल methodology को लेकर भी जायज सवाल उठाए जा सकते हैं.

मसलन, कुछ निष्कर्ष statistical significance के test में खरे नहीं उतरते, यानी उनका p-value 0.05 से ज्यादा है. इसके अलावा ‘Synthetic India’ variable को आखिर किस तरह तैयार किया गया, किन देशों को कितना weight दिया गया और उसके आधार पर counterfactual कैसे बनाया गया—इन सभी सवालों पर सामाजिक विज्ञान के शोध में बहस सामान्य बात है.

स्टडी के आलोचक V-Dem Democracy Indices पर भी सवाल उठाते हैं. उनका कहना है कि इन democracy indices में subjective और biased variables हो सकते हैं.

लेकिन दूसरी तरफ यह भी तथ्य है कि अलग-अलग methodology वाले तीन अलग वैश्विक सर्वेक्षणों में लोकतांत्रिक मानकों में गिरावट के संकेत मिले हैं.

और यह गिरावट केवल भारत तक सीमित नहीं है. दुनिया के कई देशों में democratic backsliding देखने को मिली है.

भारत अकेला नहीं, लेकिन क्या ज्यादा तेजी से पीछे जा रहा है?

यही वह जगह है जहां ‘Synthetic India’ का तर्क शोधकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है.

भारत अकेला ऐसा देश नहीं है जहां लोकतांत्रिक संस्थाओं पर दबाव बढ़ा है. लेकिन स्टडी का दावा है कि भारत में यह democratic backsliding ज्यादा तेज रही है.

लेख में इसके उदाहरण के तौर पर एक कथित partisan Election Commission, पात्र मतदाताओं को बाहर करने के लिए बनाए गए SIR categories, BJP के लिए चुनावी फंड जुटाने में जांच एजेंसियों के इस्तेमाल, विपक्षी दलों के बैंक खातों को फ्रीज करने और चुनाव के बीच विपक्षी अभियानों पर छापेमारी जैसे मामलों का उल्लेख किया गया है.

लेख इन्हें मोदी-शाह सरकार की ओर से देश के संस्थागत ढांचे पर किए गए गंभीर हमलों के उदाहरण के रूप में पेश करता है.

अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग पर भी सवाल

यहां एक दिलचस्प विरोधाभास सामने आता है.

लेख के मुताबिक, जब अंतरराष्ट्रीय सर्वे या रैंकिंग मोदी सरकार के पक्ष में अच्छी तस्वीर दिखाती हैं, तब उनकी विश्वसनीयता पर सवाल नहीं उठाए जाते.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद World Bank के Ease of Doing Business Index और Logistics Performance Index का उल्लेख कर चुके हैं. दोनों सूचकांकों में subjective variables का इस्तेमाल होता है.

मोदी ने 2019 में World Economic Forum (WEF) Global Competitiveness Report में भारत की प्रगति का भी सकारात्मक उल्लेख किया था.

हालांकि 2025 में WEF के संस्थापक क्लाउस श्वाब को उन खुलासों के बाद पद छोड़ना पड़ा, जिनमें भारत समेत कुछ देशों को फायदा पहुंचाने के लिए rankings में कथित हेरफेर का आरोप सामने आया था.

प्रति व्यक्ति आय में 10% की कमी का मतलब कितना बड़ा है?

अब इस स्टडी के सबसे बड़े आर्थिक दावे पर लौटते हैं.

अगर कोई मोदी समर्थक यह कहे कि उसे संस्थाओं की स्थिति से फर्क नहीं पड़ता, तो भी स्टडी का 10 प्रतिशत प्रति व्यक्ति आय वाला दावा नजरअंदाज करना आसान नहीं है.

लेख के मुताबिक, यह अंतर एक दशक में करीब 2.65 ट्रिलियन डॉलर के संचयी सांकेतिक नुकसान के बराबर बैठता है.

तुलना के लिए भारत की 2023 GDP करीब 3.5 ट्रिलियन डॉलर थी.

हालांकि यहां भी यह स्पष्ट करना जरूरी है कि 2.65 ट्रिलियन डॉलर वास्तविक सरकारी नुकसान नहीं है. यह उस counterfactual मॉडल से निकाला गया सांकेतिक अनुमान है कि अगर भारत का प्रदर्शन Synthetic India की trajectory के मुताबिक होता, तो संभावित अंतर कितना होता.

लेकिन भारत की GDP ranking तो बढ़ी है?

यहां सरकार के समर्थकों की तरफ से एक मजबूत तर्क सामने आता है.

भारत आज दुनिया की प्रमुख तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है. देश की GDP ranking 2014 में 10वें स्थान से बढ़कर 2025 में चौथे स्थान पर पहुंची. हालांकि बाद में भारत छठे स्थान पर आ गया.

लेकिन स्टडी के लेखक कहते हैं कि ये आंकड़े उनके निष्कर्ष को गलत साबित नहीं करते.

क्यों?

क्योंकि कुल GDP का आकार और प्रति व्यक्ति आय अलग-अलग चीजें हैं.

लेख का दावा है कि पिछले दशक में भारतीय अर्थव्यवस्था की growth UPA दौर की तुलना में धीमी रही, हालांकि UPA के कई आंकड़ों को बाद में दोबारा calculate करने पर उनकी growth दरें भी कम हुई थीं.

इस संदर्भ में नोटबंदी को भी आर्थिक विकास पर नकारात्मक असर डालने वाले कदमों में गिना गया है.

लेख नोटबंदी को एक ऐसा फैसला बताता है, जिसने आर्थिक विकास को नुकसान पहुंचाया और जिसे उस समय किसी दूसरी सरकार के लिए भी उठाना बेहद जोखिम भरा कदम माना जाता.

साथ ही लेख में कहा गया है कि private investment और household savings रिकॉर्ड निचले स्तर पर हैं.

GDP के आंकड़ों को लेकर भी बड़ी बहस

पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमणियन और उनके सह-लेखकों के एक शोध का हवाला देते हुए लेख में कहा गया है कि 2005 से 2011 के बीच भारत की GDP growth को करीब 1 से 1.5 प्रतिशत अंक कम आंका गया था.

वहीं 2012 से 2023 के बीच GDP growth को करीब 1.5 से 2 प्रतिशत अंक ज्यादा आंका गया.

इसका मतलब यह है कि UPA और मोदी सरकार के दौर की आर्थिक growth की सीधी तुलना करना उतना आसान नहीं है, जितना राजनीतिक बहस में अक्सर दिखाई देता है.

इसके अलावा Covid महामारी ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया. ठीक इसी तरह 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी का असर UPA सरकार के दौर में पड़ा था.

इसलिए लेख का तर्क है कि अगर इन वैश्विक घटनाओं को ध्यान में रखा जाए, तो भारत के relative economic performance की तुलना ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है.

एक स्टडी पूरी कहानी नहीं बताती

इस पूरे मामले में सबसे जरूरी सावधानी यही है कि कोई एक academic study अंतिम फैसला नहीं हो सकती.

लेकिन दूसरी तरफ, लेख का दावा है कि अब ऐसे कई संकेत मौजूद हैं जो यह सवाल उठाते हैं कि मोदी सरकार के दौर में भारत की संस्थाओं और अर्थव्यवस्था दोनों पर दबाव बढ़ा है.

और यह असंतोष सिर्फ एक वर्ग तक सीमित नहीं है.

लेख में छात्रों, middle class और किसानों जैसे अलग-अलग सामाजिक समूहों में बढ़ती नाराजगी का भी उल्लेख किया गया है.

यानी तस्वीर सिर्फ GDP growth की नहीं है. सवाल यह भी है कि देश के अलग-अलग वर्ग सरकार के कामकाज और आर्थिक दिशा को किस नजर से देख रहे हैं.

मोदी की छवि और सरकार की स्थिरता का सवाल

लेख के अंत में दावा किया गया है कि नरेंद्र मोदी की लंबे समय में तैयार की गई मजबूत राजनीतिक छवि अब कमजोर पड़ रही है और उनके साथ उनकी सरकार का पूरा राजनीतिक ढांचा भी अस्थिर दिखाई दे रहा है.

लेकिन यहां भी यह निष्कर्ष लेखक की राजनीतिक व्याख्या है, कोई स्थापित तथ्य नहीं.

इस लेख के लेखक अमिताभ दुबे कांग्रेस के सदस्य हैं. वह @dubeyamitabh हैं और लेख में स्पष्ट किया गया है कि उनके विचार व्यक्तिगत हैं.

तो फिर असली सवाल क्या है?

भारत की GDP ranking का 10वें से चौथे और फिर छठे स्थान तक पहुंचना एक तथ्य है. आर्थिक विकास भी हुआ है.

लेकिन दूसरी तरफ एक नई स्टडी यह दावा कर रही है कि 2023 में भारत की प्रति व्यक्ति आय संभावित स्तर से करीब 10 प्रतिशत नीचे थी और संस्थागत मजबूती के सभी 10 indicators में गिरावट आई.

इन दोनों तस्वीरों को एक साथ रखकर देखना जरूरी है.

क्या किसी देश के विकसित होने की कसौटी सिर्फ यह होनी चाहिए कि उसकी GDP दुनिया में कितने नंबर पर है? या फिर विकास का मतलब यह भी है कि आम नागरिक की प्रति व्यक्ति आय बढ़े, निवेश और बचत मजबूत हों और लोकतांत्रिक संस्थाएं भी उतनी ही मजबूत बनी रहें?

आखिर ‘विकसित भारत 2047’ का सपना सिर्फ एक बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का है, या एक ऐसी मजबूत अर्थव्यवस्था और लोकतंत्र बनाने का भी, जहां विकास के साथ संस्थाओं की विश्वसनीयता भी कायम रहे?

Last Updated on August 19, 2026 8:31 am

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