– धीरेंद्र गुप्ता
मध्य प्रदेश: जिस जगह बच्चों का भविष्य बनना चाहिए, वहां अगर पढ़ाई के बजाय शिक्षकों के कथित आचरण और बंद कमरों की कहानी सामने आने लगे, तो सवाल सिर्फ एक स्कूल पर नहीं, पूरी शिक्षा व्यवस्था पर उठता है.
छिंदवाड़ा के भूराभगत क्षेत्र से सामने आई शिकायत में आदिवासी छात्रों ने प्रभारी प्राचार्य और एक महिला अतिथि शिक्षक के कथित संबंधों को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं. छात्रों का कहना है कि स्कूल में पढ़ाई प्रभावित हो रही है और उन्हें अपनी शिकायत लेकर करीब 100 किलोमीटर दूर जिला मुख्यालय तक पहुंचना पड़ा.
जेन जी के बाद जेन अल्फा की आवाज?
दिल्ली के जंतर मंतर पर हुए जेन जी आंदोलन के बाद अब देश के अलग-अलग हिस्सों में नई पीढ़ी के बच्चों के अपनी बात खुलकर रखने की तस्वीरें सामने आ रही हैं.
छिंदवाड़ा में भी पिछले 10 दिनों में यह तीसरा बड़ा मामला बताया जा रहा है, जहां बच्चों ने सामने आकर उच्च अधिकारियों के सामने अपने स्कूल और छात्रावास प्रबंधन से जुड़ी शिकायतें रखी हैं.
बच्चों का दावा है कि उन्होंने बिना किसी दबाव या डर के प्रशासन के सामने अपनी बात रखी. सवाल यह है कि क्या जेन जी के बाद अब जेन अल्फा भी अपने हक और बेहतर व्यवस्था के लिए आवाज उठाने लगी है?
स्कूल में पढ़ाई के बजाय मोबाइल में व्यस्त रहने का आरोप
मामला छिंदवाड़ा जिले के भूराभगत क्षेत्र के बिचबहरी गांव स्थित शासकीय विद्यालय का है.
छात्रों और ग्रामीणों का आरोप है कि स्कूल में शैक्षणिक गतिविधियां ठीक से नहीं चल रही हैं. उनके मुताबिक, प्रभारी प्राचार्य और महिला अतिथि शिक्षक पढ़ाई के समय मोबाइल में व्यस्त रहते हैं.
स्कूल का निर्धारित समय शाम 4:30 बजे तक है, लेकिन आरोप है कि बच्चों को दोपहर करीब 3 बजे ही घर भेज दिया जाता है.
इसके बाद दोनों शिक्षक कथित तौर पर शाम 7 बजे तक स्कूल के एक कमरे में बंद रहते हैं. छात्रों का कहना है कि इस दौरान किसी को उस कमरे में जाने की अनुमति नहीं होती.
‘बंद कमरे’ को लेकर छात्रों की शिकायत
सबसे गंभीर आरोप इसी कथित बंद कमरे को लेकर है.
छात्रों ने प्रभारी प्राचार्य और महिला शिक्षक के बीच कथित प्रेम संबंधों की शिकायत की है. उनका आरोप है कि बच्चों को समय से पहले घर भेजने के बाद दोनों शिक्षक स्कूल के एक कमरे में काफी देर तक रहते हैं.
हालांकि, ये सभी आरोप फिलहाल छात्रों और ग्रामीणों की शिकायत पर आधारित हैं. इनकी पुष्टि जांच के बाद ही हो सकती है.
शिकायत पहले भी हुई, कार्रवाई नहीं हुई?
ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने इस अव्यवस्था को लेकर पहले भी संबंधित अधिकारियों से शिकायत की थी. लेकिन उनके मुताबिक, शिकायतों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई.
इसके बाद 16 अगस्त को आयोजित ग्रामसभा की बैठक में भी संबंधित शिक्षकों को पद से हटाने का प्रस्ताव पारित किया गया.
इसके बावजूद समस्या का समाधान नहीं होने का आरोप लगाते हुए छात्र और ग्रामीण जिला मुख्यालय की जनसुनवाई में पहुंचे.
100 किलोमीटर दूर जाकर क्यों बतानी पड़ी बात?
यहां कहानी सिर्फ शिक्षकों पर लगे आरोपों तक सीमित नहीं है.
बड़ा सवाल यह है कि अगर बच्चों और ग्रामीणों ने स्थानीय स्तर पर शिकायत की थी, तो उन्हें अपनी बात रखने के लिए करीब 100 किलोमीटर दूर जिला मुख्यालय क्यों जाना पड़ा?
क्या स्थानीय शिक्षा विभाग और प्रशासनिक निगरानी तंत्र इतना कमजोर है कि बच्चों की शिकायत जिला मुख्यालय पहुंचने के बाद ही सुनी जाएगी?
अधिकारियों पर भी सवाल
मामले में विकासखंड शिक्षा अधिकारी और जनजाति कार्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं.
अगर स्कूल में लंबे समय से ऐसी शिकायतें थीं, तो उनकी जांच पहले क्यों नहीं हुई? क्या स्कूलों की निगरानी सिर्फ कागजों तक सीमित है?
वहीं, आदिवासी विकास विभाग के सहायक आयुक्त ने मामले में तत्काल कार्रवाई करने की बात कही है.
आरोपों की जांच जरूरी
छात्रों और ग्रामीणों ने जो आरोप लगाए हैं, वे गंभीर हैं. लेकिन इन आरोपों को सच मानने से पहले उनकी निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच जरूरी है. जांच में यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि स्कूल में पढ़ाई की स्थिति क्या है, बच्चों को समय से पहले क्यों भेजा जाता था और बंद कमरे में क्या होता था.
लेकिन इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल शायद यही है.
अगर बच्चे अपने स्कूल की शिकायत लेकर 100 किलोमीटर दूर कलेक्टर की जनसुनवाई तक पहुंच रहे हैं, तो क्या यह सिर्फ शिक्षकों की कथित लापरवाही की कहानी है, या फिर उस व्यवस्था की भी, जो बच्चों की आवाज उनके स्कूल और गांव में ही नहीं सुन पाई?
और अगर वाकई जेन जी के बाद जेन अल्फा अपने हक के लिए आवाज उठाने लगी है, तो क्या प्रशासन अब उनकी आवाज सुनने और व्यवस्था सुधारने के लिए तैयार है?
Last Updated on August 19, 2026 8:59 am
