पढ़ाई के लिए जान जोखिम में डाल रहे 25 बच्चे, रोज 2 नदियां पार कर पहुंचते हैं स्कूल

मध्य प्रदेश के बड़वाह में करीब 25 बच्चों का स्कूल पहुंचना किसी चुनौती से कम नहीं है. घोंसला गांव से बासवा स्कूल जाने के लिए विद्यार्थियों को रोज करीब 2 किलोमीटर का सफर तय कर बांकुर और खिरकिया नदी पार करनी पड़ती है. पुल की घोषणा और भूमि पूजन के दो साल बाद भी निर्माण शुरू नहीं हुआ है.

CM मोहन यादव की पुल की घोषणा के बाद भी नहीं बदली तस्वीर
CM मोहन यादव की पुल की घोषणा के बाद भी नहीं बदली तस्वीर

– धीरेंद्र गुप्ता

मध्य प्रदेश: एक मशहूर शेर है. तस्कीन ए दिल के वास्ते वादा तो कीजिए हमे मालूम है आपसे आया न जाएगा. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने भी वादा कर दिया कि दो पुल बन रहे हैं. लोगों ने तालियां पीटी. बस कहानी ख़त्म. अब तक ना पुल बने और ना ही मुख्यमंत्री की तरफ से कोई जवाब आया कि पुल क्यों नहीं बने या कब बनेंगे? नतीजा उन मासूमों को भुगतना पड़ रहा है जो किताब ढोने की उम्र में सरकार की नाकामियों और जुमलों का बोझ ढो रहे हैं. मध्य प्रदेश के बड़वाह में करीब 25 बच्चों के सामने स्कूल पहुंचने से पहले एक बड़ी चुनौती खड़ी है. इन बच्चों को रोज दो नदियों का तेज बहाव पार करके स्कूल जाना पड़ता है. गीली ड्रेस, कीचड़ और जान का खतरा अब इनके रोजमर्रा के सफर का हिस्सा बन चुका है.

दो नदियां पार करके स्कूल का सफर

मामला बड़वाह जनपद की ग्राम पंचायत बासवा के पास घोंसला गांव का है. यहां के करीब 25 विद्यार्थी बासवा स्कूल में पढ़ते हैं.

घोंसला से बासवा स्कूल आने के लिए बच्चों को रोज करीब 2 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है. इस रास्ते में पहले बांकुर नदी और फिर खिरकिया नदी को पार करना पड़ता है.

खिरकिया नदी में करीब 100 मीटर तक तेज बहाव वाला हिस्सा है, जिसे विद्यार्थियों को पार करना पड़ता है.

सुबह स्कूल जाने से लेकर शाम लौटने तक यही रास्ता उनकी मजबूरी है. नदी पार करते समय बच्चों की ड्रेस भीग जाती है और कीचड़ से कपड़े खराब हो जाते हैं. सबसे बड़ा खतरा तेज बहाव का रहता है.

‘रोज नदी से गुजरना पड़ता है, डर लगता है’

घोंसला निवासी छात्रा दिव्या चौहान ने अपनी परेशानी बताते हुए कहा, “हमें रोज नदी से गुजरना पड़ता है. डर लगता है. ड्रेस भी गीली हो जाती है और कीचड़ लग जाती है.”

सोचिए, जिस उम्र में बच्चों को किताबें लेकर सुरक्षित रास्ते से स्कूल पहुंचना चाहिए, उस उम्र में उन्हें हर दिन नदी के बहाव को पार करने का जोखिम उठाना पड़ रहा है.

सिर्फ बच्चों की परेशानी नहीं

यह समस्या केवल विद्यार्थियों तक सीमित नहीं है. बासवा के किसानों और आसपास के चार गांवों के ग्रामीणों को भी खेती, अस्पताल और बाजार जाने के लिए इसी बहते पानी से होकर गुजरना पड़ता है.

रहवासी गुरु शिव पटेल का कहना है कि यह समस्या आजादी के बाद से बनी हुई है.

उनके मुताबिक, मुख्यमंत्री ने पुल बनाने की घोषणा की और विधायक ने भूमि पूजन भी किया, लेकिन दो साल बीतने के बाद भी पुल की एक ईंट तक नहीं लगी.

घोषणा हुई, भूमि पूजन भी हुआ, फिर पुल कहां है?

पिछले साल मुख्यमंत्री मोहन यादव ने खिरकिया और बांकुर नदी पर पुल बनाने की घोषणा की थी. इसके बाद विधायक सचिन बिरला ने भूमि पूजन भी किया.

लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि इसके बावजूद आज तक निर्माण शुरू नहीं हुआ.

यानी सरकारी घोषणा और जमीन पर मौजूद हकीकत के बीच का अंतर यहां साफ दिखाई देता है.

ग्रामीण लगातार कर रहे पुल की मांग

ग्रामीण श्याम सिंह पवार, अंकित गौड़, सुमेर सिंह पंवार और जयपाल सिंह सहित कई लोग पुल निर्माण की मांग कर रहे हैं.

ग्रामीणों के लिए पुल सिर्फ आने-जाने का रास्ता नहीं है. इससे बच्चों का स्कूल जाना सुरक्षित होगा और किसानों व चार गांवों के लोगों को अस्पताल, बाजार और खेती के काम से आने-जाने में भी राहत मिलेगी.

सवाल सिर्फ पुल का नहीं, बच्चों के भविष्य का है

सरकारें शिक्षा को बच्चों का अधिकार बताती हैं. लेकिन अगर स्कूल तक पहुंचने के रास्ते में ही नदी खड़ी हो और बच्चों को रोज तेज बहाव पार करना पड़े, तो सवाल व्यवस्था से पूछा जाना जरूरी है.

आखिर कब तक इन बच्चों को शिक्षा हासिल करने के लिए अपनी जान जोखिम में डालनी पड़ेगी?

भूमि पूजन के बाद पुल का निर्माण कब शुरू होगा? और कब इन बच्चों का स्कूल तक का रास्ता नदी के तेज बहाव से निकलकर एक सुरक्षित सड़क और पुल पर पहुंचेगा?

क्योंकि सवाल सिर्फ एक पुल का नहीं है.

सवाल उन 25 बच्चों के भविष्य का है, जिन्हें किताबों तक पहुंचने के लिए हर रोज नदी पार करनी पड़ रही है.

Last Updated on August 19, 2026 11:42 am

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