Dularchand Yadav Murder: बिहार फिर उसी मोड़ पर खड़ा है, जहां लोकतांत्रिक प्रक्रिया और अपराध-राजनीति का गठजोड़ एक बार फिर प्रश्नों के कटघरे में है। मोकामा में जन सुराज से जुड़े कार्यकर्ता दुलारचंद यादव की गोली मारकर हत्या ने चुनावी माहौल को झकझोर दिया है। परिजन आरोप लगा रहे हैं कि यह कोई साधारण आपराधिक वारदात नहीं बल्कि राजनीतिक रंजिश का परिणाम है।
चुनावी मौसम में ऐसी घटना को आकस्मिक मानना कठिन है; यह उस पुरानी कहानी का ताजातरीन अध्याय है जिसमें बिहार के कुछ इलाकों में सत्ता, बाहुबल और राजनीतिक प्रतिष्ठा एक ही कथा के तीन पहलू रहे हैं।
इस घटना ने पुराने सवाल फिर जीवित कर दिए हैं; क्या बिहार सच में उस हिंसक राजनीतिक इतिहास से बाहर आ चुका है? क्या चुनाव अब वास्तव में जनता की आवाज में बदल गया है, या अब भी गोलियों और डर की छाया में ही होता है? मोकामा, जो कभी बाहुबल और राजनीतिक संघर्ष का प्रतीक रहा, अब भी उस छवि से मुक्त नहीं हो पाया है।
स्थानीय नेताओं का प्रभाव, पुराने मुकदमे, सत्ता-परिवर्तन की चिंता और बदलती राजनीतिक निष्ठाएं, इन सबका घातक मिश्रण अक्सर इसी तरह की घटनाओं में सामने आता है।
दुलारचंद यादव का अतीत भी निर्विवाद नहीं था; उन पर भी कई मामले दर्ज रहे थे।
पर यह भी सच है कि बिहार की राजनीति में “इतिहास” और “प्रतिष्ठा” के बीच कोई साफ़ रेखा नहीं खींची जा सकती है। जो कभी प्रतिद्वंद्वी होते हैं, वही अगले चुनाव में साथी बन जाते हैं। इसी उलझे हुए ताने-बाने में कई बार निजी दुश्मनी और राजनीतिक प्रतिशोध का फर्क धुंधला पड़ जाता है।
इस हत्या ने बिहार में फिर वही पुराना डर जगाया है, क्या हम चुनावी चेतना नहीं, बल्कि चुनावी हिंसा की ओर लौट रहे हैं? राजनीतिक दलों के बयान, आरोप-प्रत्यारोप और कठोर शब्दों की बौछार ने घटना को कानून-व्यवस्था से सीधे सत्ता संघर्ष के मैदान में धकेल दिया है। अब यह लड़ाई पुलिस की नहीं, बल्कि राजनीतिक नैतिकता की भी है।
ऐसे समय में सबसे पहली आवश्यकता है निष्पक्ष, तेज़ और पारदर्शी जांच की। किसी भी दल या नेता पर सीधे उंगली उठाना सरल है, पर लोकतांत्रिक समाज में आरोप और सत्य के बीच की दूरी संस्था और प्रक्रिया तय करती है, भीड़ नहीं। बिहार को कानून के शासन का भरोसा चाहिए, भावनाओं के उबाल का नहीं।
साथ ही चुनाव आयोग और प्रशासन को संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था और सशक्त निगरानी सुनिश्चित करनी होगी। मतदाता तभी निडर होकर मतदान करेंगे जब उन्हें विश्वास होगा कि उनकी पसंद बंदूक की शक्ति नहीं, बैलेट की ताकत तय करेगी।
बिहार ने पिछले दशक में बदलाव का दावा किया है; सड़कें, शिक्षा, रोजगार पर विमर्श बढ़ा है। पर यदि चुनावों की सुबह फिर गोली की आवाज़ सुनाई दे, तो यह सिर्फ एक हत्या नहीं, उस नए बिहार की उम्मीदों पर भी वार होगा। राजनीति विचारों की लड़ाई है, देहों की नहीं। अगर इस मूल सिद्धांत की रक्षा नहीं हुई, तो लोकतंत्र केवल पोस्टरों और भाषणों में बचेगा, जमीन पर नहीं।
अब समय है कि बिहार इस घटना को केवल “स्थानीय संघर्ष” कहकर आगे न बढ़े। बल्कि इसे एक चेतावनी समझे कि लोकतंत्र के रास्ते में जो काली छाया फिर से घिरती दिखने लगी है, उसे कानूनी, संवेदनशीलता और राजनीतिक परिपक्वता से दूर करना ही राज्य की असली प्रगति होगी।
बिहार अब गोली से नहीं, वोट से अपनी किस्मत लिखना चाहता है। नेताओं और संस्थाओं की परीक्षा यही है कि वे जनता की इस उम्मीद की रक्षा कर सकें।
संजीव सिंह के फेसबुक वॉल से. वह समाज से जुड़े मुद्दे पर लिखते-बोलते रहते हैं.
Last Updated on November 1, 2025 10:54 am
