क्या राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी नई है? चोल काल से अयोध्या तक का पूरा इतिहास

नई दिल्ली:  क्या मंदिरों में चढ़ावे और दान को लेकर उठ रहे विवाद कोई नई बात हैं, या इतिहास में भी ऐसे आरोप लगते रहे हैं? अयोध्या के श्रीराम मंदिर में दान-चढ़ावे को लेकर उठे सवालों के बीच यह चर्चा और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। लेकिन इस बहस को समझने के लिए हमें करीब एक हजार साल पीछे, चोल साम्राज्य के दौर में जाना होगा, जहां मंदिरों की संपत्ति, पुजारियों की भूमिका, राजसत्ता और भ्रष्टाचार से जुड़े चौंकाने वाले उदाहरण मिलते हैं। इस रिपोर्ट में हम इन्हीं ऐतिहासिक तथ्यों को समझेंगे। यह विश्लेषण सार्वजनिक इतिहासकार अनिरुद्ध कनिसेट्टी द्वारा The Print में प्रकाशित लेख पर आधारित है।

यह ऐसी सुर्खी है जो वर्ष 2026 में सामने आई हो सकती थी। एक मंदिर समिति घोटाले में फंस गई। आधी रात में दो लोगों की हत्या कर दी गई। देवता के लिए चढ़ाए गए आभूषण निजी हाथों में गायब हो गए। खजाना कहां गया, इसका पता लगाने के लिए निरीक्षक आधी रात को पहुंचे। लेकिन यह मंदिर आज के अयोध्या का नहीं, बल्कि लगभग एक हजार वर्ष पहले तमिल तट पर स्थित था। निरीक्षक चोल राजा के अधिकारी थे और यह पूरा मामला पत्थर पर खुदे एक शिलालेख में आज भी दर्ज है। सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि जब मध्यकालीन दोषियों को आखिरकार न्याय के कटघरे में लाया गया, तो वे बाहर से आए चोर या विधर्मी नहीं थे, बल्कि मंदिर के अपने पुजारी थे।

हम अक्सर मान लेते हैं कि प्राचीन भारत के मंदिर ईश्वर के पवित्र धाम थे, उनकी संपत्ति पवित्र थी, वह धन अच्छे कार्यों के लिए दान किया जाता था और श्रद्धालुओं द्वारा ईमानदारी से उपयोग किया जाता था। लेकिन आज अयोध्या के राम मंदिर ट्रस्ट, जो देश के सबसे समृद्ध मंदिर ट्रस्टों में से एक है, पर चढ़ावे, आभूषणों और बाजार मूल्य से कई गुना अधिक कीमत पर खरीदी गई जमीनों को लेकर जांच चल रही है।

कुछ समय पहले ईशा फाउंडेशन के स्वयंभू आध्यात्मिक गुरु जग्गी वासुदेव ने “फ्री तमिलनाडु टेम्पल्स” अभियान शुरू किया था, जिसे बाद में आर्ट ऑफ लिविंग के श्री श्री रविशंकर ने भी समर्थन दिया। इस अभियान का तर्क था कि सरकारी नियंत्रण में मंदिरों का पतन होता है और उनका प्रबंधन श्रद्धालुओं के हाथ में होना चाहिए। लेकिन यदि हम यह मानना चाहें कि धार्मिक संस्थाएं भ्रष्टाचार और घोटालों जैसी सांसारिक समस्याओं से ऊपर होती हैं, तो मध्यकालीन इतिहास इसके ठीक उलट चेतावनी देता है।

मंदिर और उनकी संपत्तियां

यह समझने के लिए हमें लगभग वर्ष 1100 के दक्षिण भारत के एक विशाल मंदिर की कल्पना करनी होगी। उस समय कावेरी घाटी में ऊंची दीवारों और भव्य गोपुरमों से घिरे विशाल मंदिर परिसर तेजी से विकसित हो रहे थे। उनके आसपास बाजार, आवासीय बस्तियां और सैकड़ों एकड़ उपजाऊ कृषि भूमि फैली होती थी, जिन्हें नहरों, झाड़ियों और पेड़ों से विभाजित किया गया था।

एक अकेले मंदिर के पास दर्जनों गांवों में जमीन हो सकती थी, जो जरूरी नहीं कि उसी के आसपास हों। श्रद्धालु कई दिनों या हफ्तों की यात्रा करके वहां पहुंचते और सोना, पशु, भूमि, आभूषण या कांस्य मूर्तियां दान करते थे।

मंदिरों को ब्राह्मण पुरोहितों के वेतन, कपूर जैसी महंगी वस्तुओं के आयात और बड़ी संख्या में कर्मचारियों के खर्च के लिए भारी दान की आवश्यकता होती थी। यहां तक कि छोटे मंदिर भी जमीन रखते थे, धन उधार देते थे और दर्जनों लोगों को रोजगार देते थे। स्वाभाविक रूप से इतनी बड़ी संपत्ति और संसाधनों ने राजनीतिक और आर्थिक हितों को आकर्षित किया।

कांचीपुरम से प्राप्त मद्रास म्यूजियम कॉपर प्लेट्स (दसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध) बताती हैं कि उलागालंदा पेरुमल मंदिर स्थानीय बुनकरों और कपास उत्पादक गांवों को सोना उधार देता था। मंदिर के खातों का रखरखाव बुनकर करते थे और हर वर्ष शहर के वरिष्ठ व्यापारी उनकी जांच करते थे। इस व्यवस्था को चोल राजा उत्तम चोल (973-985 ई.) का संरक्षण प्राप्त था।

इतिहासकार जेम्स हाइट्ज़मैन ने अपनी पुस्तक Gifts of Power में पाया कि निजी भूमि स्वामित्व के लिए प्रयुक्त शब्द “काणी” (kāṇi) का उपयोग 980 ई. से पहले बहुत कम होता था, लेकिन इसके बाद तेजी से बढ़ गया। चोल काल में मंदिरों के विस्तार के साथ-साथ भूमि स्वामित्व और किराये से जुड़े शब्दों का भी विस्तार हुआ।

भूमि दान की असल कहानी

सामान्य धारणा यह है कि कोई धार्मिक किसान अपनी जमीन मंदिर को दान कर देता था। लेकिन व्यवहार में ऐसा कम होता था।

हाइट्ज़मैन के अनुसार, अधिकांश मामलों में “भूमि दान” का अर्थ खेत का स्वामित्व नहीं बल्कि उस भूमि से होने वाली आय का एक हिस्सा मंदिर को सौंपना था।

12वीं शताब्दी के भूमि व्यापारी आज के रियल एस्टेट कारोबारियों की तरह बेहद आक्रामक थे। जापानी इतिहासकार नोबोरू कराशिमा ने अपनी पुस्तक Ancient to Medieval: South Indian Society in Transition में कई शिलालेखों का उल्लेख किया है, जिनमें सूखा, बाढ़ या करों के बोझ से परेशान गांवों की जमीन खरीदने वालों का जिक्र मिलता है। कई बार ये जमीनें राजकीय अधिकारियों की मौजूदगी में आयोजित बड़ी नीलामियों (परुविलै) में खरीदी जाती थीं।

जब ऐसी खरीदी गई भूमि मंदिर को दान की जाती थी तो उसे देवदान (Devadāna) कहा जाता था। बदले में राजा उस भूमि को करमुक्त घोषित कर देता था। कई मामलों में राजा को मिलने वाला कर सीधे मंदिर को दे दिया जाता था।

लेकिन कई शिलालेख बताते हैं कि ऐसी भूमि “कुडी-निंगा” (kudi-ninga) थी, यानी किसान वहीं रहता था।

इसका मतलब यह था कि दानदाता ने अक्सर सस्ती जमीन खरीदी, कर राजा के बजाय मंदिर को दिया, बदले में धार्मिक सम्मान पाया और भूमिहीन किसानों से खेती कराकर अधिकांश फसल और भविष्य में भूमि बेचने का अधिकार अपने पास रखा।

मंदिर भी करते थे जमीन की खरीद

शिलालेख बताते हैं कि मंदिर केवल दान स्वीकार नहीं करते थे, बल्कि स्वयं भी जमीन खरीदते थे।

कराशिमा ने श्रीरंगम के पास स्थित जंबुकेश्वरम मंदिर का अध्ययन करते हुए पाया कि 12वीं और 13वीं शताब्दी में मंदिर प्रशासन ने सीधे गांवों की जमीन खरीदी। एक सौदे में 39 अलग-अलग विक्रेताओं से पांच चरणों में भूमि खरीदी गई थी।

यदि आज के मंदिर भूमि विवादों से इसकी कोई समानता दिखाई देती है, तो वह मात्र संयोग हो सकता है।

किसानों की बेदखली

देवदान भूमि का एक और प्रकार था “कुडी-निक्की” (kudi-nikki), जिसमें किसान को जमीन से बेदखल कर दिया जाता था।

कराशिमा को कोल्लिडम नदी के किनारे स्थित किलपालुवुर में ऐसे कई उदाहरण मिले, जहां सैन्य सरदारों ने बड़ी संख्या में किसानों को हटाकर जमीन अपने नियंत्रण में ले ली।

स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि 12वीं शताब्दी के कई चोल राजाओं ने किसानों को दोबारा उनकी जमीन लौटाने की कोशिश की और प्रभावशाली परिवारों को नीलामी में जमीन खरीदने पर रोक लगाई। लेकिन बाद के अभिलेख बताते हैं कि यह प्रयास सफल नहीं हुआ।

मंदिरों में चोरी और सरकारी हस्तक्षेप

जिस घटना का उल्लेख शुरुआत में किया गया, वह वर्तमान तमिलनाडु के मयिलादुथुरै जिले के सायावनम मंदिर की 12वीं शताब्दी की घटना है।

आधी रात को हुई एक अचानक जांच में पता चला कि शिव ब्राह्मण पुजारियों ने ही मंदिर के आभूषण चुराए थे।

उन्हें दंडस्वरूप 180 स्वर्ण मुद्राओं का जुर्माना लगाया गया, जो मंदिर की लगभग 20.5 दिनों की आय के बराबर था।

चोल काल के अनेक शिलालेख बताते हैं कि राजकीय अधिकारी मंदिरों के मामलों में हस्तक्षेप करते थे, पुजारियों और समितियों पर गलत लेखा-जोखा रखने के लिए जुर्माना लगाते थे और उन कोषों की जांच करते थे जिनका हिसाब पत्थरों पर दर्ज दानों से मेल नहीं खाता था।

अर्थात मध्यकालीन मंदिर पूरी तरह आत्म-नियंत्रित संस्थाएं नहीं थे।

क्या राजा समाधान थे?

पहली नजर में ऐसा लगता है कि राजा भ्रष्टाचार के खिलाफ संतुलन बनाए रखते थे। लेकिन घटनाक्रम कुछ और कहानी कहता है।

भारी करों के कारण गांवों को पहले अपनी सामुदायिक जमीन बेचनी पड़ती थी। नीलामी राजकीय अधिकारी कराते थे। बाद में वही अधिकारी भूमि को करमुक्त घोषित करते थे और तय करते थे कि किसान रहेगा या हटेगा।

हाइट्ज़मैन के अध्ययन के अनुसार, करमुक्त मंदिर भूमि दान करने वाले अधिकांश लोग वे धनी व्यक्ति थे जिन्हें राजदरबार से सम्मानसूचक उपाधियां मिली हुई थीं।

घोटाले और जनता का हस्तक्षेप

व्यवहार में मध्यकालीन धनाढ्य वर्ग ने राजा की कर व्यवस्था और मंदिरों से मिलने वाले धार्मिक सम्मान दोनों का लाभ उठाया।

धीरे-धीरे गांवों की कर योग्य सामुदायिक भूमि को पवित्र और निजी करमुक्त भूमि में बदल दिया गया।

इसका परिणाम यह हुआ कि:

  • चोल राज्य की आय घटती गई।
  • भव्य मंदिरों का निर्माण होता गया।
  • भूमिहीन किसान लगातार कमजोर होते गए।

13वीं शताब्दी की शुरुआत तक स्थिति इतनी खराब हो गई कि अनेक परिवार दिवालिया हो गए और कई लोगों को स्वयं को बंधुआ मजदूर के रूप में बेचना पड़ा।

शिवपुरम का बड़ा घोटाला

चोल इतिहासकार के. ए. नीलकंठ शास्त्री ने तंजावुर के पास स्थित शिवपुरम के एक बड़े मंदिर घोटाले का उल्लेख किया है।

13वीं शताब्दी की उथल-पुथल के दौरान दो ब्राह्मण पुजारियों ने मंदिर पर कब्जा कर लिया और कर्नाटक से भाड़े के सैनिक बुलाकर आसपास के गांवों से 50,000 स्वर्ण मुद्राएं वसूल लीं।

उन्होंने मंदिर से चोरी की, कर देने से इनकार किया और देवी के लिए रखा गया हार अपनी उपपत्नी को दे दिया।

अंततः गांव की सभा ने हस्तक्षेप किया, पुजारियों पर शिव और राजा दोनों के साथ विश्वासघात का आरोप लगाया और उनकी सारी संपत्ति जब्त कर ली।

सरकारी अधिकारी हमेशा मंदिर समितियों से बेहतर थे?

चोल साम्राज्य के पतन के बाद कई गांवों और क्षेत्रीय सभाओं ने मंदिरों की व्यवस्था फिर से संभालने की कोशिश की। लेकिन भूमि स्वामित्व की संरचना में जो बदलाव आ चुके थे, वे स्थायी साबित हुए।

इतिहास यह नहीं कहता कि सरकारी अधिकारी हमेशा मंदिर समितियों से बेहतर थे। बल्कि यह बताता है कि कई बार दोनों ही मंदिरों से आर्थिक लाभ उठाने में समान रूप से रुचि रखते थे। मध्यकालीन समाज के कई धनी दानदाता भी इसी व्यवस्था का हिस्सा थे।

आज मंदिरों की स्वायत्तता बनाम सरकारी नियंत्रण पर चल रही बहसों में इतिहास की यही बारीकी अक्सर नजरअंदाज हो जाती है।

ईश्वर अपने भक्तों के हृदय में पूर्ण हो सकते हैं, लेकिन वही पूर्णता हमेशा उनके राजनीतिक संरक्षकों या मंदिरों के प्रबंधकों तक नहीं पहुंचती।

Last Updated on July 2, 2026 1:21 pm

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