क्या क्षेत्रीय दलों का दौर खत्म हो रहा है? भारत के संघवाद पर बड़ा सवाल

– मनोज झा

भारतीय लोकतंत्र के नेहरूवादी दौर में, देश अभी-अभी औपनिवेशिक शासन से बाहर निकला था और अभूतपूर्व स्तर की चुनौतियों से जूझ रहा था। स्वतंत्रता की खुशी के साथ-साथ विभाजन और महात्मा गांधी की हत्या भी हुई। लाखों लोग विस्थापित हुए, समुदाय बिखर गए और एकजुट भारत का विचार ही नाजुक दिखाई देने लगा।

इन विशाल चुनौतियों के बावजूद भारत अराजकता में नहीं डूबा। इसके बजाय एक लोकतांत्रिक राष्ट्र-राज्य के निर्माण का उल्लेखनीय सामूहिक संकल्प उभरा। इसका यह अर्थ नहीं है कि नेहरू का दौर तनावों से मुक्त था। देश के विभिन्न हिस्सों में राजनीतिक हलचलें पहले से दिखाई देने लगी थीं। उदाहरण के लिए, भाषाई राज्यों की मांग सांस्कृतिक पहचानों की एक सशक्त अभिव्यक्ति थी। फिर भी नेहरू की राजनीतिक प्रतिष्ठा और संघवाद, लोकतांत्रिक संस्थाओं तथा राष्ट्रीय एकीकरण पर उनके जोर ने यह भावना पैदा की कि भारत की परियोजना में सभी क्षेत्रों की हिस्सेदारी है।

हालांकि भारत की लोकतांत्रिक संस्थाएं बचीं और परिपक्व हुईं, लेकिन शुरुआती वर्षों में मौजूद व्यापक राष्ट्रीय सहमति धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगी। कांग्रेस प्रणाली क्षेत्रीय आकांक्षाओं के पूरे दायरे का प्रतिनिधित्व करने की अपनी क्षमता खोने लगी। इसी बदलते राजनीतिक परिदृश्य में क्षेत्रीय दल प्रमुख राजनीतिक खिलाड़ी बनकर उभरे। यह लोकतंत्र के गहराने का संकेत था। इन दलों ने उन आवाजों और चिंताओं को राजनीतिक अभिव्यक्ति दी जो अक्सर राष्ट्रीय राजनीति में कम प्रतिनिधित्व पाती थीं। वे विशिष्ट ऐतिहासिक, भाषाई, सांस्कृतिक और आर्थिक संदर्भों से उभरे और स्थानीय वास्तविकताओं में निहित आकांक्षाओं को व्यक्त करने का प्रयास करने लगे।

तमिलनाडु में द्रविड़ आंदोलन ने हिंदी भाषी उत्तर के कथित सांस्कृतिक और राजनीतिक प्रभुत्व को चुनौती दी। जो शुरुआत में एक सामाजिक और सांस्कृतिक आंदोलन था, वह अंततः एक शक्तिशाली राजनीतिक ताकत में बदल गया। पंजाब में क्षेत्रीय राजनीति भाषा, धर्म और संघीय स्वायत्तता से जुड़ी चिंताओं को प्रतिबिंबित करती थी। असम और अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में क्षेत्रीय दल स्थानीय पहचानों की मान्यता और संसाधनों पर अधिक नियंत्रण की मांग करने वाले आंदोलनों से उभरे। जम्मू-कश्मीर में क्षेत्रीय राजनीतिक दलों ने स्थानीय आकांक्षाओं और राष्ट्रीय एकीकरण के बीच जटिल संबंधों को साधने का प्रयास किया। ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल में क्षेत्रीय दल विशिष्ट राजनीतिक और विकास संबंधी चिंताओं को व्यक्त करने का माध्यम बने।

शायद क्षेत्रीय दलों का सबसे महत्वपूर्ण योगदान भारतीय संघवाद को मजबूत करने में रहा है। उन्होंने दिखाया कि एकता समायोजन और बातचीत के माध्यम से भी बनाई जा सकती है। 1980 के दशक के उत्तरार्ध में शुरू हुआ और अगले लगभग तीन दशकों तक जारी रहा गठबंधन युग, क्षेत्रीय राजनीतिक प्रभाव का उच्चतम बिंदु था। केंद्र की सरकारें क्षेत्रीय दलों के समर्थन पर निर्भर थीं। राज्यों को अधिक सौदेबाजी शक्ति मिली, क्षेत्रीय मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली और संघीय सिद्धांत अधिक सार्थक बन गया।

2014 और 2019 में भाजपा द्वारा अपने दम पर बहुमत हासिल करने के बाद यह मजबूरी कम हो गई, हालांकि शासन गठबंधनों के माध्यम से चलता रहा। राजनीतिक शक्ति का बढ़ता केंद्रीकरण, राष्ट्रीय विमर्शों का बढ़ता प्रभुत्व और पारंपरिक क्षेत्रीय गढ़ों में राष्ट्रीय दलों का विस्तार क्षेत्रीय दलों के भविष्य को लेकर सवाल खड़े कर रहा है। इस केंद्रीकरण की सबसे स्पष्ट अभिव्यक्तियां वित्तीय क्षेत्र में दिखाई देती हैं: जीएसटी व्यवस्था ने राज्यों के अधिकांश कराधान को एक साझा परिषद में समाहित कर दिया है और उपकर (सेस) तथा अधिभार (सरचार्ज) का बढ़ता उपयोग उस साझा पूल से बाहर रहता है जिसे राज्यों के साथ बांटा जाता है।

कुछ पर्यवेक्षक क्षेत्रीय दलों के धीरे-धीरे पतन की भविष्यवाणी करते हैं। ऐसी भविष्यवाणियां शायद समय से पहले हैं। भारत की भाषाई, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और आर्थिक विविधताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जब तक ये विविधताएं मौजूद हैं, तब तक क्षेत्रीय आकांक्षाओं को व्यक्त करने वाले राजनीतिक दल प्रासंगिक बने रहेंगे। यह सच है कि कुछ जगहों पर क्षेत्रवाद संकीर्ण या स्थानीयतावादी राजनीति में बदल गया है; फिर भी व्यापक ऐतिहासिक रिकॉर्ड बताता है कि क्षेत्रीय दलों ने प्रतिनिधित्व का विस्तार किया है, जमे-जमाए अभिजात वर्ग को चुनौती दी है और ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर रहे समुदायों को राजनीतिक मुख्यधारा में लाया है।

समकालीन राजनीतिक परिदृश्य नई चुनौतियां पेश करता है। वर्तमान समय की सबसे बड़ी परीक्षा परिसीमन (Delimitation) की प्रक्रिया है। चूंकि लोकसभा सीटों का निर्धारण लंबे समय से 1971 की जनसंख्या के आंकड़ों पर स्थिर है, इसलिए दक्षिणी राज्यों को आशंका है कि जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण उत्तर भारत की राजनीतिक ताकत बढ़ा देगा और उनके प्रभाव को कम कर देगा।

भारत पारंपरिक यूरोपीय अर्थों में केवल एक राष्ट्र-राज्य नहीं है। यह अनेक पहचानों, भाषाओं, संस्कृतियों और इतिहासों के बीच एक सभ्यतागत समझौता भी है। क्षेत्रीय दल हमें इस वास्तविकता की याद दिलाते हैं। वे सुनिश्चित करते हैं कि केंद्र और राज्यों के बीच संवाद जीवित रहे।

आज चुनौती राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों के बीच चुनाव करने की नहीं है, न ही उन्हें विरोधी ध्रुवों के रूप में देखने की। भारत जैसे विशाल और विविध देश में लोकतंत्र की जीवंतता हमेशा इस बात पर निर्भर करेगी कि राष्ट्रीय कल्पना क्षेत्रीय आकांक्षाओं को किस हद तक समायोजित कर सकती है। इस अर्थ में, क्षेत्रीय दलों का भविष्य स्वयं ‘भारत के विचार’ (Idea of India) के भविष्य से अलग नहीं है।

लेखक राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) से राज्यसभा सांसद हैं।

Last Updated on June 12, 2026 10:22 am

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