नई दिल्ली: अमेरिका और ईरान के बीच हुए 14 सूत्री अंतरिम समझौता ज्ञापन (Memorandum of Understanding – MOU) के आधिकारिक रूप से सार्वजनिक होने के बाद भारत में भी इस पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं तेज हो गई हैं। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने समझौते को लेकर केंद्र सरकार की विदेश नीति की आलोचना करते हुए कहा कि इसके क्षेत्रीय और रणनीतिक प्रभावों पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।
जयराम रमेश ने सोशल मीडिया पर जारी अपने बयान में कहा कि इस समझौते को “इस्लामाबाद MOU” कहा जा रहा है। उनके अनुसार, यह पाकिस्तान की बढ़ती क्षेत्रीय भूमिका और पश्चिम एशिया की बदलती भू-राजनीतिक स्थिति का संकेत माना जा रहा है।
“पाकिस्तान की बढ़ी भूमिका भारत के लिए चिंता का विषय”
कांग्रेस नेता ने कहा कि वर्ष 2008 के मुंबई आतंकी हमलों के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़ गया था। उनके अनुसार, मौजूदा परिस्थितियों में पाकिस्तान का इस प्रक्रिया से जुड़ना भारत की विदेश नीति के लिए चुनौती के रूप में देखा जा सकता है।
उन्होंने दावा किया कि पाकिस्तान अब पश्चिम एशिया की सुरक्षा और रणनीतिक संरचना में पहले की तुलना में अधिक सक्रिय भूमिका निभा रहा है, जिसके भारत की सुरक्षा और कूटनीतिक हितों पर प्रभाव पड़ सकता है।
हालांकि, भारत सरकार की ओर से इस विषय पर कोई आधिकारिक टिप्पणी जारी नहीं की गई है।
“अगले 60 दिन होंगे निर्णायक”
जयराम रमेश ने कहा कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच हुआ समझौता अपने मूल स्वरूप और भावना के अनुरूप लागू रहता है तो इसे क्षेत्रीय स्थिरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।
साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि समझौते के सफल क्रियान्वयन को लेकर अभी अनिश्चितता बनी हुई है और अगले 60 दिन इसकी सफलता तय करने में महत्वपूर्ण होंगे।
“ईरान को मिले रणनीतिक लाभ”
कांग्रेस नेता के अनुसार, इस समझौते से ईरान को कुछ महत्वपूर्ण और अप्रत्याशित रणनीतिक लाभ मिलते दिखाई दे रहे हैं।
उन्होंने कहा कि हालिया संघर्ष के दौरान ईरान ने अपनी सैन्य क्षमता और प्रतिरोध की शक्ति का प्रदर्शन किया है। उनके अनुसार, खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के सदस्य देशों ने समझौते का सावधानीपूर्वक स्वागत किया है, लेकिन वे भविष्य में अपनी क्षेत्रीय रणनीतियों की समीक्षा कर सकते हैं।
इजराइल और नेतन्याहू को लेकर टिप्पणी
जयराम रमेश ने अपने बयान में कहा कि यह समझौता इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के लिए राजनीतिक झटका माना जा सकता है।
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि क्षेत्र की परिस्थितियां अभी पूरी तरह स्थिर नहीं हैं और आने वाले समय में घटनाक्रम बदल सकते हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इजराइल सरकार के प्रति लगातार समर्थन की नीति अपनाए हुए हैं, जबकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई देशों के रुख में बदलाव देखने को मिल रहा है।
यह कांग्रेस का राजनीतिक आरोप है। इस पर केंद्र सरकार की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
अमेरिका की रणनीति पर भी सवाल
कांग्रेस नेता ने अपने बयान में कहा कि अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान के खिलाफ अपनाई गई रणनीति अपने घोषित उद्देश्यों को पूरी तरह हासिल नहीं कर सकी।
उन्होंने कहा कि इस पूरे घटनाक्रम ने आधुनिक युद्ध में सैन्य शक्ति की सीमाओं को भी उजागर किया है।
जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हालिया द्विपक्षीय बातचीत का भी उल्लेख करते हुए विदेश नीति पर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत की वर्तमान विदेश नीति में संतुलन की कमी दिखाई दे रही है।
भारत सरकार की प्रतिक्रिया का इंतजार
फिलहाल केंद्र सरकार या विदेश मंत्रालय (MEA) ने जयराम रमेश के इन राजनीतिक आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया जारी नहीं की है।
उधर, अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका-ईरान समझौते का वास्तविक प्रभाव अगले कुछ सप्ताह और महीनों में सामने आएगा। विशेष रूप से ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार, पश्चिम एशिया की स्थिरता और भारत सहित एशियाई देशों की रणनीतिक स्थिति पर इसके प्रभाव पर दुनिया की नजर बनी हुई है।
Last Updated on June 18, 2026 1:10 pm
