Rahul Gandhi Dharna: एक घायल छात्र. शरीर में 200 से ज्यादा पैलेट के छर्रे. आंख में तीन छर्रे और एक आंख की रोशनी पर खतरा. और FIR के लिए करीब 8 घंटे तक पुलिस स्टेशन के बाहर बैठे नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी. 21 अगस्त को दिल्ली में सामने आया यह घटनाक्रम सिर्फ एक शिकायत दर्ज कराने की कहानी नहीं, बल्कि पुलिस जवाबदेही और शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार को लेकर बड़ा राजनीतिक टकराव बन गया.
20 जुलाई को क्या हुआ था?
मामला 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर हुए छात्र प्रदर्शन से जुड़ा है. कांग्रेस का आरोप है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर पुलिस कार्रवाई के दौरान पैलेट गन का इस्तेमाल हुआ और साहिल लोचब गंभीर रूप से घायल हुए.
साहिल के मुताबिक, उनके शरीर में 200 से ज्यादा छर्रे लगे. उनकी आंख में तीन छर्रे गए और कुछ छर्रे दिल के पास भी बताए गए हैं. उनकी आंख की रोशनी अब भी प्रभावित है. साहिल को पहले लेडी हार्डिंग अस्पताल ले जाया गया और बाद में AIIMS रेफर किया गया, जहां उनकी दो सर्जरी हुईं.
दिल्ली पुलिस ने हालांकि प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन के इस्तेमाल से इनकार किया है. इस पूरे घटनाक्रम की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने हाई-पावर्ड कमेटी भी गठित की है.
14 अगस्त को दी गई थी शिकायत
साहिल ने 14 अगस्त को पुलिस को सात पन्नों की लिखित शिकायत दी थी. कांग्रेस की ओर से दावा किया गया कि शिकायत देने के बावजूद न तो FIR दर्ज की गई और न ही शिकायत का IO नंबर या acknowledgement दिया गया.
कांग्रेस के मुताबिक, 17 अगस्त को ईमेल और फोन के जरिए भी मामले को आगे बढ़ाया गया, लेकिन तब भी FIR दर्ज नहीं हुई.
यानी 20 जुलाई की घटना के करीब एक महीने बाद भी साहिल की शिकायत पर FIR नहीं हुई थी.
राहुल गांधी खुद थाने पहुंचे
21 अगस्त को राहुल गांधी साहिल, उनकी मां और वकील के साथ पहले मंदिर मार्ग पुलिस स्टेशन पहुंचे. वहां FIR दर्ज कराने की मांग की गई.
जब शिकायत दर्ज नहीं हुई तो राहुल गांधी संसद मार्ग स्थित पुलिस स्टेशन और DCP कार्यालय पहुंचे. वहां भी मामला आगे नहीं बढ़ा तो उन्होंने पुलिस स्टेशन के बाहर धरना शुरू कर दिया. उनके साथ साहिल और उनकी मां भी बैठ गए.
बाद में प्रियंका गांधी वाड्रा समेत कांग्रेस के कई नेता और कार्यकर्ता भी धरने में शामिल हुए.
‘FIR नहीं तो यहां से नहीं हटेंगे’
राहुल गांधी का कहना था कि मामला दर्ज करना न्याय की दिशा में पहला कदम है.
उन्होंने साहिल की मेडिकल रिपोर्ट दिखाते हुए कहा कि शरीर में अभी भी छर्रे मौजूद हैं, तीन छर्रे आंख में हैं और कुछ दिल के पास हैं.
राहुल ने सवाल उठाया कि अगर दिल्ली के बीचोंबीच स्थित पुलिस स्टेशन में एक घायल नागरिक को FIR दर्ज कराने के लिए इतना इंतजार करना पड़े, तो देश के छोटे शहरों और गांवों में आम नागरिक की स्थिति क्या होगी.
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पुलिस अधिकारियों ने उन्हें बताया कि ऊपर से FIR दर्ज नहीं करने के निर्देश हैं. यह राहुल गांधी का आरोप है, जिसकी स्वतंत्र पुष्टि पुलिस के हवाले से नहीं हुई है.
करीब 8 घंटे बाद FIR
राहुल गांधी के मुताबिक, वह सुबह करीब 11 से 11:30 बजे पुलिस स्टेशन पहुंचे थे और शाम करीब 7 बजे तक FIR दर्ज की गई.
FIR दर्ज होने के बाद राहुल गांधी ने इसे न्याय की दिशा में पहला कदम बताया. उनके धरने का मुख्य मुद्दा भी यही था कि साहिल की शिकायत पर औपचारिक मामला दर्ज किया जाए ताकि आगे जांच और जवाबदेही की प्रक्रिया शुरू हो सके.
राहुल ने अमित शाह पर भी उठाए सवाल
FIR दर्ज होने के बाद राहुल गांधी ने दावा किया कि अंतिम अनुमति गृह सचिव और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की ओर से मिलने के बाद ही FIR दर्ज की गई.
राहुल ने कहा कि अगर ऐसा हुआ है तो इससे सवाल उठता है कि FIR रोक कौन रहा था.
यह आरोप राहुल गांधी ने लगाया है. इसकी स्वतंत्र पुष्टि अभी सामने नहीं आई है.
उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह से भी सवाल किया कि 20 जुलाई की पुलिस कार्रवाई में पैलेट गन के इस्तेमाल को लेकर अब तक स्पष्ट जवाब क्यों नहीं दिया गया.
कांग्रेस ने इसे संवैधानिक अधिकारों का सवाल बताया
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी इस मामले को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साधा. उन्होंने आरोप लगाया कि साहिल और उनकी मां FIR दर्ज कराने के लिए दिल्ली पुलिस के चक्कर काट रहे थे, लेकिन उन्हें Daily Diary Number, acknowledgement और AIIMS की MLC रिपोर्ट तक नहीं दी गई.
कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने भी कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान कथित पुलिस बर्बरता की जांच के लिए FIR जरूरी है.
हालांकि, इन नेताओं के राजनीतिक आरोपों को आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए. मामले में जांच के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि 20 जुलाई को वास्तव में किसने पैलेट गन चलाई, किस परिस्थिति में इसका इस्तेमाल हुआ और जिम्मेदारी किसकी बनती है.
असली सवाल अब शुरू होता है
FIR दर्ज हो गई है. लेकिन इससे मामला खत्म नहीं होता.
अब जांच को यह पता लगाना होगा कि साहिल को लगी चोटों के पीछे क्या हुआ था. पैलेट गन का इस्तेमाल हुआ तो किसने किया? आदेश किसने दिया? क्या बल प्रयोग नियमों के मुताबिक था? और अगर नियमों का उल्लंघन हुआ, तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
क्योंकि लोकतंत्र में FIR सिर्फ कागज का एक नंबर नहीं होती. यह उस नागरिक के लिए न्याय की प्रक्रिया का पहला दरवाजा होती है, जो खुद को राज्य की कार्रवाई से पीड़ित बता रहा है.
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और सबसे बड़ा सवाल यही है. अगर एक घायल छात्र को अपनी FIR के लिए नेता प्रतिपक्ष के साथ पुलिस स्टेशन के बाहर घंटों धरने पर बैठना पड़े, तो सवाल सिर्फ साहिल की शिकायत का नहीं रह जाता. सवाल यह बन जाता है कि आम नागरिक को न्याय का पहला दरवाजा खोलने के लिए आखिर कितनी ताकत, कितनी पहचान और कितनी लड़ाई चाहिए?
Last Updated on August 21, 2026 8:30 pm
