Prisoner Rehabilitation Scheme: करीब दो दशक जेल में रहने के बाद जब 44 साल का एक शख्स 2022 में कोल्हापुर सेंट्रल जेल से बाहर निकला, तो उसके पास इतिहास में BA, इतिहास और समाजशास्त्र में मास्टर डिग्री और कानून पढ़ने का सपना था. लेकिन एक लैपटॉप तक नहीं था.
महाराष्ट्र सरकार की एक छोटी-सी आर्थिक मदद ने उसके लिए नई जिंदगी की शुरुआत का रास्ता खोला. उसे ₹25 हजार की सहायता मिली. उसने ₹5 हजार उधार लेकर सेकेंड हैंड लैपटॉप खरीदा. आज वह मुंबई की एक निजी कंपनी में लीगल असिस्टेंट के तौर पर काम कर रहा है.
उसकी पहचान सार्वजनिक नहीं की गई है.
अब ऐसी ही मदद पाने वाले लोगों के लिए महाराष्ट्र सरकार ने रकम दोगुनी कर दी है.
₹25 हजार से अब ₹50 हजार
महाराष्ट्र के महिला एवं बाल विकास यानी WCD विभाग ने 18 अगस्त को जारी सरकारी प्रस्ताव के जरिए रिहा किए गए कैदियों के लिए मिलने वाली अनुदान राशि को ₹25 हजार से बढ़ाकर ₹50 हजार कर दिया है.
नई व्यवस्था के तहत अब सिर्फ दोषसिद्ध कैदी और प्रोबेशनर ही नहीं, बल्कि ऐसे लोग भी इस योजना का लाभ ले सकेंगे जिन्हें कम से कम एक साल हिरासत में रहने के बाद अदालत से बरी किया गया हो.
यह बढ़ी हुई सहायता 18 अगस्त या उसके बाद रिहा होने वाले पात्र लोगों पर लागू होगी.
राज्य कैबिनेट ने इस प्रस्ताव को 14 जुलाई को मंजूरी दी थी. योजना की समीक्षा अब हर तीन साल में पुणे स्थित WCD आयुक्त के स्तर पर की जाएगी.
महाराष्ट्र कैबिनेट के 14 जुलाई के फैसले में भी रिहा कैदियों के लिए सहायता राशि ₹25 हजार से बढ़ाकर ₹50 हजार करने की जानकारी दी गई थी. (ThePrint)
पैसा छोटा है, लेकिन नई शुरुआत बड़ी
इस योजना का मकसद सिर्फ पैसा देना नहीं है.
यह पैसा किसी रिहा कैदी के लिए सिलाई मशीन बन सकता है.
किसी के लिए बढ़ईगीरी के औजार.
किसी के लिए मुर्गी पालन की शुरुआत.
और किसी के लिए सेकेंड हैंड लैपटॉप.
यानी जेल से बाहर आने के बाद जिंदगी को दोबारा पटरी पर लाने के लिए एक छोटी पूंजी.
40 मुर्गियों से शुरू हुई नई जिंदगी
पालघर के 45 साल के एक किसान की कहानी भी कुछ ऐसी ही है.
वह करीब एक दशक जेल में रहने के बाद 2025 में बाहर आया. जून में उसे ₹25 हजार की सहायता मिली.
उसने इस पैसे से मुर्गियों के लिए कॉप और चारा खरीदा और करीब 40 मुर्गियों से अपना काम शुरू किया.
उसका कहना है कि फिलहाल वह खेती कर रहा है, लेकिन पोल्ट्री का सेटअप तैयार होने के बाद वह कहीं और से कर्ज लेकर मुर्गियों की संख्या बढ़ाना चाहता है.
एक महिला, जो पांच साल से ज्यादा समय जेल में रही थी, उसने भी इसी सहायता से कपड़ों का कारोबार शुरू किया.
एक दूसरे लाभार्थी ने पान की दुकान शुरू की.
यानी सरकारी सहायता किसी के लिए दुकान है, किसी के लिए कारोबार और किसी के लिए रोजगार का पहला कदम.
‘मैं जिंदगी भर एक गलती से पहचाना नहीं जाना चाहता था’
मुंबई के उस 44 वर्षीय व्यक्ति की कहानी इस योजना की जरूरत को और साफ करती है.
2005 में जब उसे हत्या के मामले में गिरफ्तार किया गया, तब वह BA के दूसरे साल में था. एक साल बाद उसे दोषी ठहराया गया और उम्रकैद की सजा हुई.
लेकिन जेल ने उसकी पढ़ाई नहीं रोकी.
2007 में उसने यशवंतराव चव्हाण महाराष्ट्र मुक्त विश्वविद्यालय से डिग्री की पढ़ाई शुरू की और डिस्टिंक्शन के साथ कोर्स पूरा किया.
इसके बाद मास्टर डिग्री की.
फिर कानून की पढ़ाई शुरू की.
जेल में उसने पहले अस्पताल में काम किया और बाद में जेल अधीक्षक के कार्यालय में काम करने लगा. अधिकारियों ने उसकी अच्छी लिखावट देखी और दूसरे कैदियों के फॉर्म भरने की जिम्मेदारी भी उसे देने लगे.
यहीं उसे सरकार की इस आर्थिक सहायता के बारे में पता चला.
उसने तय कर लिया था कि जेल से निकलते ही वह इसके लिए आवेदन करेगा.
उसका कहना था, “मैं अपनी बाकी जिंदगी सिर्फ एक गलती से पहचाना नहीं जाना चाहता था.”
जेल से बाहर निकलना ही काफी नहीं
यही इस पूरी योजना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है.
सजा पूरी होना या अदालत से बरी होना एक व्यक्ति की कानूनी स्थिति बदल सकता है.
लेकिन समाज में लौटना इतना आसान नहीं होता.
रोजगार की तलाश.
आर्थिक मुश्किल.
लोगों का संदेह.
पुराने रिकॉर्ड का बोझ.
और सबसे बड़ी बात, दोबारा सामान्य जिंदगी शुरू करने के लिए शुरुआती पूंजी का अभाव.
TISS से जुड़े Prayas के प्रोजेक्ट डायरेक्टर डॉ. विजय राघवन ने कहा कि ऐसी योजना राज्य की उस जिम्मेदारी को पहचानती है, जिसमें जेल से बाहर आए लोगों को समाज में दोबारा शामिल करने और उनका पुनर्वास करने की जरूरत होती है. उनके मुताबिक, ऐसे लोग सामाजिक कलंक और रोजगार पाने की मुश्किलों का सामना करते हैं. (TISS)
योजना में आवेदन कैसे होता है?
इस सहायता के लिए आवेदक को प्रोबेशन अधिकारी के जरिए एक प्रस्ताव देना होता है.
इसमें बताया जाता है कि वह कौन सा कारोबार या काम शुरू करना चाहता है और उसके लिए किन चीजों की जरूरत होगी.
सामान खरीदने के कोटेशन भी देने होते हैं.
इसके बाद प्रोबेशन अधिकारी आवेदक के घर जाकर स्थिति की जांच करता है.
जेल से भी रिपोर्ट ली जाती है.
प्रस्ताव मंजूर होने के बाद रिहाई प्रमाणपत्र समेत जरूरी दस्तावेज जमा किए जाते हैं और फिर सहायता राशि जारी की जाती है.
यह योजना 18 से 65 साल की उम्र के लोगों के लिए है.
खास प्राथमिकता उन लोगों को दी जाती है जिन्होंने जेल में किसी काम या ट्रेड का प्रशिक्षण लिया हो और उसी क्षेत्र में अपना काम शुरू करना चाहते हों.
1993 में सिर्फ ₹1 हजार से शुरू हुई थी योजना
यह योजना नई नहीं है.
महाराष्ट्र में इसकी शुरुआत 1993 में ₹1 हजार की सहायता से हुई थी.
2002 में रकम बढ़ाकर ₹5 हजार की गई.
2016 में यह ₹25 हजार हुई.
उसी साल योजना का बजट ₹12 लाख था और 48 आवेदन मंजूर किए गए थे.
2017 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने राज्य को योजना के लिए आवंटन बढ़ाकर कम से कम ₹2 करोड़ करने का निर्देश दिया.
2020 में बजट बढ़ाकर ₹1 करोड़ किया गया और जरूरत पड़ने पर एक और करोड़ रुपये उपलब्ध रखने की व्यवस्था की गई.
अधिकारियों के मुताबिक वास्तविक खर्च करीब ₹1.20 करोड़ रहा है और इससे हर साल लगभग 480 लोगों को लाभ मिलता रहा है.
जेल सुधार समिति ने दायरा बढ़ाने की बात कही थी
महाराष्ट्र सरकार की ओर से गठित जस्टिस राधाकृष्णन कमेटी ने 2018 में जेल सुधारों पर अपनी सिफारिशों में इस सहायता का दायरा बढ़ाने की बात कही थी.
कमेटी ने सुझाव दिया था कि सहायता सिर्फ रोजगार शुरू करने तक सीमित न रहे, बल्कि इसमें आवास, घरेलू सामान, शिक्षा, प्रशिक्षण और कौशल विकास जैसी जरूरतों को भी शामिल किया जाए.
यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कोई व्यक्ति जेल से बाहर आया या नहीं.
सवाल यह भी है कि वह बाहर आने के बाद टिकेगा कैसे.
₹50 हजार काफी हैं या सिर्फ शुरुआत?
इस योजना से जुड़े लाभार्थियों का कहना है कि ₹25 हजार एक शुरुआत के लिए मददगार थे और रकम बढ़ना अच्छी बात है.
लेकिन असली चुनौती इससे आगे की है.
क्या ₹50 हजार से किसी व्यक्ति को स्थायी रोजगार मिल सकता है?
क्या उसे बैंक लोन आसानी से मिलेगा?
क्या समाज उसे दोबारा स्वीकार करेगा?
क्या नियोक्ता उसके पुराने रिकॉर्ड को देखकर नौकरी देने से मना नहीं करेगा?
और क्या सरकारी सहायता जेल से बाहर आने के तुरंत बाद उसके हाथ तक पहुंच पाएगी?
TISS के Prayas की हालिया वार्षिक रिपोर्ट में भी रिहा कैदियों के पुनर्वास के लिए सहायता बढ़ाने, दस्तावेजी अड़चनों को कम करने और रिहाई के बाद जल्दी सहायता पहुंचाने जैसी जरूरतों पर जोर दिया गया है. (TISS)
असली सवाल: सजा खत्म होने के बाद समाज क्या करता है?
किसी अपराध में दोषी ठहराए गए व्यक्ति को कानून के मुताबिक सजा मिलती है. लेकिन सजा पूरी होने के बाद क्या उसका पूरा जीवन भी सजा बन जाना चाहिए?
यहां सरकार की ₹50 हजार की मदद एक रकम से कहीं ज्यादा बड़ी चीज की तरफ इशारा करती है.
सुधार का मतलब सिर्फ जेल के अंदर व्यवहार बदलना नहीं है. सुधार तब पूरा होता है, जब जेल से बाहर आया व्यक्ति दोबारा सम्मान के साथ काम कर सके, अपने पैरों पर खड़ा हो सके और समाज में लौट सके.
लेकिन सवाल यही है.
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अगर एक सेकेंड हैंड लैपटॉप किसी पूर्व कैदी को लीगल असिस्टेंट बना सकता है, 40 मुर्गियां किसी को दोबारा किसान बनने का मौका दे सकती हैं और एक छोटी दुकान किसी की नई जिंदगी शुरू कर सकती है, तो क्या हमारा न्याय तंत्र सिर्फ सजा देने तक सीमित रहेगा, या समाज में वापस लौटने का रास्ता भी बनाएगा?
Last Updated on August 21, 2026 10:22 am
