USCIRF ने RSS पर प्रतिबंध की मांग की, भागवत के अमेरिका दौरे से पहले बढ़ा विवाद

मोहन भागवत के अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन दौरे से पहले RSS को लेकर विवाद बढ़ गया है. अमेरिकी धार्मिक स्वतंत्रता आयोग USCIRF ने RSS पर प्रतिबंध और उसके नेताओं को राजनयिक सम्मान न देने की सिफारिश की है. भारत पहले USCIRF की रिपोर्ट खारिज कर चुका है, जबकि कनाडा में 100 से ज्यादा संगठनों ने भागवत के दौरे का समर्थन किया है.

RSS पर प्रतिबंध की मांग क्यों?
RSS पर प्रतिबंध की मांग क्यों?

अमेरिका में धार्मिक स्वतंत्रता पर नजर रखने वाली संस्था USCIRF ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी RSS को लेकर अमेरिकी सरकार से कड़े कदम उठाने की मांग की है. आयोग के अधिकारियों ने न सिर्फ RSS पर प्रतिबंध लगाने की बात कही, बल्कि RSS नेताओं को राजनयिक सम्मान नहीं देने और उनके साथ उच्चस्तरीय बैठकें नहीं करने की सलाह भी दी है. खास बात यह है कि यह बयान RSS प्रमुख मोहन भागवत के अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन दौरे से कुछ ही हफ्ते पहले आया है.

USCIRF चेयरमैन ने क्या कहा?

अमेरिकी धार्मिक स्वतंत्रता आयोग यानी USCIRF के चेयरमैन आसिफ महमूद ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी RSS के सदस्य हैं और संगठन के सहयोगी संगठनों पर धार्मिक अल्पसंख्यकों, जिनमें ईसाई और मुस्लिम शामिल हैं, पर हमलों के आरोप हैं.

USCIRF ने महमूद और आयोग के कमिश्नर जीन मिल्स के बयान अपने X अकाउंट पर पोस्ट किए.

महमूद ने कहा कि RSS प्रमुख मोहन भागवत अमेरिका आने की योजना बना रहे हैं.

यानी भागवत का प्रस्तावित दौरा और USCIRF की यह टिप्पणी एक ही समय में सामने आई है.

RSS नेताओं को राजनयिक सम्मान न देने की मांग

USCIRF कमिश्नर जीन मिल्स ने इससे भी आगे जाकर अमेरिकी सरकार को सलाह दी है.

मिल्स के मुताबिक, अगर RSS के नेता भारतीय सरकार से जुड़े हुए भी हों, तब भी उन्हें अमेरिकी सरकार की ओर से उच्चस्तरीय बैठकों या राजनयिक सम्मान का हकदार नहीं माना जाना चाहिए.

उन्होंने कहा कि अमेरिकी सरकार को इसके बजाय उन RSS सदस्यों पर प्रतिबंध लगाने पर ध्यान देना चाहिए, जिन्हें धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघन के लिए जिम्मेदार पाया गया है.

25 अगस्त से शुरू होगा मोहन भागवत का दौरा

RSS प्रमुख मोहन भागवत 25 अगस्त से अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन के दौरे पर जाएंगे.

वे 29 अगस्त को न्यूयॉर्क में अमेरिकन हिंदूज फॉर एंगेजमेंट एंड डायलॉग यानी AHEAD की ओर से आयोजित ‘यूनिवर्सल ऑननेस सेलिब्रेशंस’ कार्यक्रम में शामिल होंगे.

ऐसे में भागवत के दौरे से पहले अमेरिकी संस्था की ओर से आया यह बयान विवाद को और बड़ा बनाता है.

कनाडा में 100 से ज्यादा संगठनों ने किया समर्थन

दूसरी तरफ कनाडा में तस्वीर कुछ अलग नजर आ रही है.

100 से ज्यादा संगठनों ने मोहन भागवत के प्रस्तावित कनाडा दौरे का समर्थन किया है. इन संगठनों ने कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी और मंत्रियों को पत्र लिखकर उन मांगों को खारिज करने की अपील की है, जिनमें भागवत को कनाडा में प्रवेश से रोकने की बात कही गई है.

संगठनों ने अपने पत्र में कहा कि किसी व्यक्ति के खिलाफ लगाए गए आरोपों के आधार पर कार्रवाई से पहले विश्वसनीय और स्वतंत्र सबूत होने चाहिए.

उन्होंने कनाडा सरकार से कानून, सबूत और उचित प्रक्रिया के आधार पर फैसला लेने की अपील की है.

भारत को CPC सूची में डालने की सिफारिश

USCIRF लंबे समय से भारत में धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर सवाल उठाता रहा है.

आयोग भारत को ‘विशेष चिंता का देश’ यानी Country of Particular Concern, CPC घोषित करने की सिफारिश कर चुका है.

USCIRF ने पहली बार 2004 में यह सिफारिश की थी. 2020 में इसे फिर दोहराया गया. इसके बाद 2021 से 2026 तक की रिपोर्टों में भी आयोग ने भारत को CPC सूची में शामिल करने की मांग की.

हालांकि, यहां एक जरूरी बात समझना जरूरी है. USCIRF की सिफारिश का मतलब यह नहीं है कि अमेरिका ने भारत को CPC घोषित कर दिया है.

RSS और RAW पर प्रतिबंध की बात भी कर चुका है USCIRF

मार्च में जारी USCIRF की सालाना रिपोर्ट में भारत में धार्मिक स्वतंत्रता के कथित उल्लंघनों की आलोचना की गई थी.

रिपोर्ट में RSS और रिसर्च एंड एनालिसिस विंग यानी RAW जैसी संस्थाओं और कुछ लोगों पर प्रतिबंध लगाने का समर्थन किया गया था.

भारत सरकार ने इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया था. भारत का कहना था कि USCIRF संदिग्ध स्रोतों और वैचारिक सोच के आधार पर लगातार देश की खराब छवि पेश करता है.

16 मार्च को विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने USCIRF की आलोचना करते हुए कहा था कि भारत की चुनिंदा आलोचना करने के बजाय आयोग को अमेरिका में हिंदू मंदिरों में तोड़फोड़ की घटनाओं पर ध्यान देना चाहिए.

आखिर USCIRF है क्या?

यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम यानी USCIRF अमेरिका की एक स्वतंत्र सरकारी संस्था है.

इसे अमेरिकी कांग्रेस ने 1998 के इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम एक्ट के तहत बनाया था.

इसका मुख्य काम दुनिया के अलग-अलग देशों में धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक उत्पीड़न की स्थिति की निगरानी करना है.

आयोग अपनी रिसर्च और जांच के आधार पर सालाना रिपोर्ट जारी करता है और अमेरिकी राष्ट्रपति, विदेश मंत्री तथा कांग्रेस को नीतिगत सिफारिशें देता है.

क्या USCIRF सीधे प्रतिबंध लगा सकता है?

यहां फर्क समझना जरूरी है.

USCIRF खुद किसी देश या संगठन पर प्रतिबंध लागू नहीं करता. यह अमेरिकी सरकार को सिफारिशें देता है.

आयोग किसी देश को ‘विशेष चिंता का देश’ यानी CPC घोषित करने की सिफारिश कर सकता है. इसी तरह किसी गैर-सरकारी संगठन या समूह को ‘विशेष चिंता वाली संस्था/समूह’ यानी EPC के तौर पर चिन्हित करने की सिफारिश भी कर सकता है.

इसके अलावा आयोग अमेरिकी सरकार से प्रतिबंध, राजनयिक दबाव या दूसरे कदम उठाने की सिफारिश कर सकता है.

मतलब साफ है – USCIRF की सिफारिश अपने-आप प्रतिबंध नहीं बन जाती. अंतिम फैसला अमेरिकी सरकार के हाथ में होता है.

फिर USCIRF की बात इतनी अहम क्यों है?

क्योंकि USCIRF कोई निजी NGO नहीं है.

यह अमेरिकी कांग्रेस द्वारा बनाई गई आधिकारिक संस्था है. इसके सदस्य अमेरिकी राष्ट्रपति और अमेरिकी कांग्रेस के दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के नेताओं की ओर से नियुक्त किए जाते हैं.

इसलिए इसकी रिपोर्ट और सिफारिशें अमेरिकी विदेश नीति में इनपुट के साथ-साथ राजनीतिक दबाव का जरिया भी बन सकती हैं.

और अब सवाल सिर्फ RSS पर USCIRF की टिप्पणी का नहीं है.

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एक तरफ अमेरिका की सरकारी संस्था RSS के खिलाफ प्रतिबंध और राजनयिक दूरी की सिफारिश कर रही है. दूसरी तरफ कनाडा में 100 से ज्यादा संगठन मोहन भागवत के दौरे का समर्थन करते हुए उचित प्रक्रिया और स्वतंत्र सबूत की बात कर रहे हैं. भारत सरकार पहले ही USCIRF की रिपोर्ट को खारिज कर चुकी है.

तो असली सवाल यही है – क्या यह मामला सिर्फ धार्मिक स्वतंत्रता की चिंता का है, या इसके पीछे भारत-अमेरिका संबंधों, वैश्विक राजनीति और RSS की अंतरराष्ट्रीय छवि को लेकर एक बड़ा कूटनीतिक संघर्ष भी आकार ले रहा है?

Last Updated on August 20, 2026 10:01 am

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