Gurukul Education: भारत की पुरानी शिक्षा व्यवस्था की एक बेहद मजबूत तस्वीर हमारे दिमाग में बसी हुई है – जंगल के बीच गुरुकुल, गुरु के सामने बैठे शिष्य और हर पृष्ठभूमि के बच्चों के लिए ज्ञान के दरवाजे खुले हुए. किताबों, कैलेंडरों, कॉमिक्स, टीवी और धार्मिक कथाओं ने इस तस्वीर को और मजबूत किया है.
लेकिन इतिहास की कहानी इतनी सीधी नहीं है.
सार्वजनिक स्मृति में जिस ‘आदर्श गुरुकुल’ की तस्वीर को अक्सर भारत की महान शिक्षा परंपरा के प्रतीक के तौर पर पेश किया जाता है, उसके व्यापक प्रसार और प्रभावशीलता के सबूत बहुत सीमित हैं. इतिहासकार अनिरुद्ध कनिसेट्टी का तर्क है कि भारत की पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था में आम लोगों की शिक्षा शायद ही कभी शासकों की प्राथमिकता रही.
गुरुकुल में किसे शिक्षा मिलती थी?
प्राचीन संस्कृत महाकाव्यों और धर्मशास्त्रों में शिक्षा की चर्चा होती है, लेकिन उसका दायरा आम भारतीय तक नहीं पहुंचता था.
इन ग्रंथों में मुख्य रूप से राजकुमारों, ऋषियों और ब्राह्मणों जैसे अभिजात वर्ग की शिक्षा की बात होती है. आम लोगों की शिक्षा को लेकर वैसी चिंता नजर नहीं आती, जैसी आज हम उस दौर की कल्पना करते समय करते हैं.
धर्मशास्त्रों में तो शूद्रों को वैदिक ज्ञान से दूर रखने की स्पष्ट बातें मिलती हैं.
उदाहरण के लिए, गौतम धर्मसूत्र में वेद सुनने वाले शूद्र के कानों में पिघला हुआ टिन डालने और वेद का पाठ करने वाले की जीभ काटने जैसी कठोर सजाओं का उल्लेख है.
हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि गैर-अभिजात वर्ग के लोगों को किसी भी तरह की शिक्षा नहीं मिलती थी.
पढ़ाई कम, हुनर ज्यादा
आम लोगों के लिए शिक्षा का एक बड़ा हिस्सा काम सीखने से जुड़ा था.
खेती, कारोबार, लेखा-जोखा और दूसरे पेशेवर हुनर अक्सर परिवारों और जातिगत समुदायों के भीतर ही सीखे जाते थे. यह व्यवस्था किसी औपचारिक सार्वजनिक स्कूल की तरह नहीं थी.
इसका फायदा यह था कि लोग अपने पेशे का ज्ञान अगली पीढ़ी तक पहुंचाते थे. लेकिन इसकी बड़ी सीमा यह थी कि इससे सामाजिक और आर्थिक तरक्की के मौके बहुत सीमित रहते थे.
शासकों ने किस तरह की शिक्षा को पैसा दिया?
प्राचीन और मध्यकालीन राज्यों के लिए शिक्षा सिर्फ ज्ञान फैलाने का जरिया नहीं थी. राज्य को जिन लोगों की जरूरत थी, शिक्षा का पैसा अक्सर उसी तरह के विशेषज्ञ तैयार करने में लगाया गया.
8वीं सदी के राजा करुणंददक्कन ने उदाहरण के तौर पर एक शालै में वैदिक वंश के आधार पर 95 सीटों का प्रबंध किया था. इनमें 45 सीटें पविलिय शाखा, 36 तैत्तिरीय और 14 तलवकार शाखा के लिए थीं.
यानी राज्य का निवेश आम जनता की सार्वभौमिक शिक्षा में नहीं, बल्कि अपने लिए जरूरी धार्मिक और प्रशासनिक विशेषज्ञ तैयार करने में ज्यादा था.
नालंदा भी सबके लिए स्कूल नहीं था
नालंदा को आज भारत की महान शिक्षा परंपरा के प्रतीक के तौर पर याद किया जाता है.
यह बौद्ध महाविहार तिब्बत, चीन और जावा तक से विद्वानों को आकर्षित करता था. यहां प्रवेश के लिए मौखिक परीक्षा होती थी, जिसमें बौद्ध और वैदिक ग्रंथों की जानकारी जरूरी थी.
नालंदा से पढ़े विद्वानों की मांग पूर्वी एशिया तक थी.
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती.
11वीं सदी से भारतीय राज्यों की जरूरतें बदलने लगीं. शासकों को सिर्फ धार्मिक विशेषज्ञ नहीं, बल्कि लेखाकार और प्रशासनिक कर्मचारी भी चाहिए थे.
इसी दौर में ब्राह्मण और कायस्थ परिवारों से जुड़े लोग राजस्व वसूली और रिकॉर्ड रखने जैसे कामों में तेजी से आगे आए.
नतीजा यह हुआ कि राज्य का समर्थन धीरे-धीरे प्रशिक्षित नौकरशाहों की तरफ बढ़ने लगा.
शूद्र भी बने शिक्षक और विद्वान
दिलचस्प बात यह है कि प्रशासनिक और व्यावहारिक ज्ञान, वैदिक ज्ञान की तुलना में ज्यादा लचीला साबित हुआ.
कई भूमिधर जातियों ने लेखांकन और दूसरे उपयोगी विषयों को पढ़ाया, भले ही उनमें से कई तकनीकी रूप से शूद्र मानी जाती थीं.
लाहौर के हिंदू और शाहजहां के सचिव रहे चंदर भान ब्राह्मण ने लिखा कि उन्हें ‘जटमल शूद्र’ और ‘गोपी चंद शूद्र’ से शिक्षा मिली थी.
दक्षिण भारत में भी कुछ शूद्र विद्वानों ने अलग रास्ता अपनाया.
17वीं सदी में तमिल क्षेत्र के धमारपुरम, तिरुवावडुतुरई और तिरुप्पनंतल के शैव मठों यानी आधीनम का नेतृत्व वेल्लाल समुदाय के लोगों के हाथ में था. वेल्लाल एक उच्च दर्जे की कृषक जाति मानी जाती थी और कुछ विद्वान उन्हें ‘शुद्ध शूद्र’ यानी सत-शूद्र मानते हैं.
इतिहासकार इवा कोपेड्रेयर का तर्क है कि वेल्लालों ने शैव आगमों की व्याख्या के जरिए विद्वानों के नेटवर्क में जगह बनाई.
यानी जिस ज्ञान व्यवस्था में प्रवेश कभी कुछ ऊंची जातियों तक सीमित माना जाता था, उसमें सामाजिक उपयोगिता के रास्ते भी खुल रहे थे.
मदरसे भी ‘पारंपरिक शिक्षा’ का हिस्सा थे
भारत की पारंपरिक शिक्षा की चर्चा में गुरुकुल और नालंदा का नाम तो खूब आता है, लेकिन इंडो-फारसी मदरसों का जिक्र अपेक्षाकृत कम होता है.
18वीं सदी का लखनऊ स्थित फरंगी महल इसका बड़ा उदाहरण था.
यहां कुरान की पढ़ाई के साथ तर्कशास्त्र, दर्शन, गणित और यूक्लिड की ज्यामिति भी पढ़ाई जाती थी.
फरंगी महल में 700 सीटें थीं और यहां ईरान समेत दूसरे इलाकों से विद्वान आते थे.
नालंदा की तरह यहां की शिक्षा भी छात्रों को एशिया के अलग-अलग हिस्सों में रोजगार के अवसर दे सकती थी – इस्तांबुल से लेकर इस्फहान और मलक्का तक.
लेकिन यह भी आम जनता के लिए सार्वभौमिक शिक्षा की व्यवस्था नहीं थी. यह मुख्य रूप से प्रशासनिक और न्यायिक अभिजात वर्ग को तैयार करने वाली व्यवस्था थी.
फिर अंग्रेज आए तो क्या बदला?
जब भारत पर ब्रिटिश नियंत्रण बढ़ा, तब सरकारी संरक्षण वाली भारतीय शिक्षा पहले से ही मुख्य रूप से अभिजात वर्ग तक सीमित थी.
लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं था कि आम लोगों के अपने स्कूल नहीं थे.
इतिहासकार परिमला राव ने Beyond Macaulay में 19वीं सदी में ब्रिटिश अधिकारियों की ओर से किए गए कई सर्वेक्षणों का उल्लेख किया है.
बंगाल में विलियम एडम के सर्वे में 1,463 हिंदू शिक्षकों में 1,255 गैर-ब्राह्मण पाए गए. दक्षिण बिहार के कई इलाकों में एक भी ब्राह्मण शिक्षक नहीं था.
लेकिन इन स्कूलों की हालत खराब थी. संसाधन कम थे और शिक्षकों को बेहद कम वेतन मिलता था.
उत्तर-पश्चिमी प्रांतों में एक स्कूल मास्टर की कमाई घास काटने वाले व्यक्ति से भी कम थी.
बच्चों को स्कूल से ज्यादा काम की जरूरत थी
यहां कहानी का एक और पहलू सामने आता है.
बच्चों का स्कूल से दूर रहना हमेशा जातिगत रोक की वजह से नहीं था. गरीब परिवारों के लिए बच्चों का काम करना जरूरी था.
1823 में मद्रास के एक अधिकारी ने दर्ज किया कि कुछ माता-पिता का कहना था कि लड़कों को स्कूल भेजने से बेहतर है कि वे बैलों की देखभाल करें.
यानी शिक्षा की समस्या सिर्फ सामाजिक भेदभाव की नहीं थी. गरीबी और परिवार की आर्थिक जरूरत भी बड़ी बाधा थी.
वैदिक शिक्षा पर फिर भी पाबंदी
हालांकि लेखांकन या लिपिकीय शिक्षा उन लोगों के लिए उपलब्ध हो सकती थी जो शिक्षक को भुगतान कर सकें, वैदिक शिक्षा पर जातिगत सीमाएं बनी रहीं.
मालाबार के संस्कृत स्कूलों के 19वीं सदी के एक सर्वे में वेद और धर्मशास्त्र की कक्षाओं में लगभग सभी छात्र ब्राह्मण लड़के थे.
इन कक्षाओं में 471 ब्राह्मण लड़के और तीन ब्राह्मण लड़कियां दर्ज थीं.
इसके उलट ज्योतिष की कक्षाओं में वैश्य, शूद्र और दूसरी जातियों के छात्र भी दाखिल थे. इनमें कुछ लड़कियां भी थीं.
अंग्रेजों ने भी बनाई ‘ब्राह्मण शिक्षक’ की तस्वीर
यहीं से कहानी और दिलचस्प हो जाती है.
स्थानीय स्कूलों को धीरे-धीरे औपनिवेशिक शिक्षा व्यवस्था में शामिल किया गया. 1882 तक ब्रिटिश सरकार द्वारा चलाए जा रहे 85,000 प्राथमिक स्कूलों में से करीब 70,000 मूल रूप से भारतीय स्कूल थे.
लेकिन ब्रिटिश अधिकारियों के बीच ब्राह्मण शिक्षकों को प्राथमिकता देने की सोच भी विकसित हुई.
एक अधिकारी ने ‘सरकार की सुरक्षा’ के लिए शिक्षण पद ब्राह्मणों के लिए सुरक्षित रखने की बात कही.
अहमदाबाद के एक ब्रिटिश जज ने कहा कि किसी ब्राह्मण छात्र का शूद्र शिक्षक के सामने झुकना ‘अनुचित’ होगा.
यानी अंग्रेज अधिकारी भारतीय समाज को समझने के लिए कई बार प्राचीन धार्मिक ग्रंथों पर निर्भर थे, जबकि जमीन पर सामाजिक और शैक्षणिक व्यवस्था कहीं ज्यादा जटिल थी.
बॉम्बे प्रेसीडेंसी के गवर्नर माउंटस्टुअर्ट एलफिंस्टन ने कई नए स्कूल खोले और उनमें ब्राह्मण शिक्षकों को नियुक्त किया.
सदी के अंत तक ज्यादातर भारतीय स्कूल मास्टर ब्राह्मण हो चुके थे.
इस तरह गांव के स्कूल में ब्राह्मण शिक्षक की वह तस्वीर, जिसे आज कभी-कभी प्राचीन और स्वाभाविक भारतीय शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा समझ लिया जाता है, कुछ हद तक औपनिवेशिक दौर में बनी.
लेकिन अंग्रेजी शिक्षा ने रास्ते भी खोले
इस कहानी का दूसरा पहलू भी उतना ही जरूरी है.
औपनिवेशिक दौर में बने शहरी शिक्षण संस्थानों ने पहले शिक्षा से दूर रहे कई परिवारों के लिए सरकारी नौकरियों और सामाजिक-आर्थिक तरक्की के रास्ते खोले.
यानी ब्रिटिश शिक्षा व्यवस्था की आलोचना अपनी जगह है, लेकिन यह भी सच है कि उसके जरिए कई ऐसे परिवार आगे बढ़ पाए जिन्हें पहले शिक्षा और सरकारी सेवाओं तक सीमित पहुंच हासिल थी.
आज के स्कूलों की हालत और पुरानी कहानी
आज जब सरकारी स्कूलों की जर्जर इमारतों, कम संसाधनों और कमजोर व्यवस्थाओं के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होते हैं, तो यह समस्या अचानक पैदा हुई हुई नहीं लगती.
लेखक का तर्क है कि इसके पीछे भारत के शासक वर्गों की लंबे समय से चली आ रही उदासीनता है – शिक्षा को देर से पैसा मिला, शिक्षकों को कम भुगतान हुआ और स्कूलों से लगातार ज्यादा काम की उम्मीद की गई.
लेकिन आज के छात्र और परिवार शिक्षा को सिर्फ ज्ञान नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक तरक्की का रास्ता मानते हैं.
यही वजह है कि समाधान अतीत की उसी सरकारी शिक्षा व्यवस्था को वापस लाने में नहीं हो सकता, जो मुख्य रूप से दरबार और राज्य के लिए जरूरी विशेषज्ञ तैयार करने पर केंद्रित थी.
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असली सवाल अतीत नहीं, भविष्य है
भारत में गुरुकुल, नालंदा और ‘प्राचीन शिक्षा व्यवस्था’ को लेकर गर्व होना स्वाभाविक है. लेकिन इतिहास को सिर्फ गौरव की कहानी बना देना शायद उतना ही खतरनाक है जितना उसे पूरी तरह खारिज कर देना.
अगर पुराने दौर में शिक्षा का फायदा समाज के हर वर्ग तक नहीं पहुंचा था, तो आज सवाल यह होना चाहिए कि हम उस अतीत से क्या सीखना चाहते हैं.
क्या भारत की शिक्षा व्यवस्था का भविष्य सचमुच अतीत के गुरुकुल में छिपा है, या हमें ऐसी नई व्यवस्था बनाने की जरूरत है जिसमें बच्चे की जाति, परिवार की हैसियत या जन्म नहीं, बल्कि उसकी जरूरत और क्षमता तय करे कि उसे कैसी शिक्षा मिलेगी?
लेखक अनिरुद्ध कनिसेट्टी पब्लिक हिस्टोरियन हैं. वे ‘Lords of Earth and Sea: A History of the Chola Empire’ और पुरस्कार विजेता ‘Lords of the Deccan’ के लेखक हैं. वे Echoes of India और Yuddha पॉडकास्ट होस्ट करते हैं. लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं.
Last Updated on August 20, 2026 10:23 am
