– धीरेंद्र गुप्ता
छतरपुर: जिस Ken Betwa Link Project को देश के विकास के लिए बड़ा कदम बताया जा रहा है, उसी परियोजना से विस्थापित ढौढ़न गांव के परिवारों की जिंदगी की तस्वीर कुछ और कहानी कह रही है. करौदिया विस्थापन स्थल पर बारिश के बीच पानी, अंधेरा, खराब रास्ते और अधूरे पुनर्वास की शिकायतें सामने आ रही हैं.
विकास के बीच विस्थापन का दर्द
ढौढ़न गांव के सैकड़ों आदिवासी परिवारों को केन-बेतवा लिंक परियोजना के चलते विस्थापित किया गया है. अब ये परिवार छतरपुर के करौदिया विस्थापन स्थल पर रह रहे हैं.
विस्थापित परिवारों का आरोप है कि जिस जमीन, जंगल और घर को छोड़कर उन्होंने परियोजना के लिए अपना सब कुछ दिया, उसके बदले उन्हें ऐसी जिंदगी मिली है जहां बुनियादी सुविधाओं के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है.
बारिश में घर के अंदर भर रहा पानी
बारिश ने करौदिया में रहने वाले परिवारों की मुश्किल और बढ़ा दी है.
विस्थापितों के मुताबिक, बारिश का गंदा पानी उनके रहने की जगहों में घुस रहा है. राशन, कपड़े और चूल्हा जलाने के लिए रखी लकड़ियां तक भीग रही हैं.
यानी जिन परिवारों को एक सुरक्षित और बेहतर पुनर्वास की उम्मीद थी, उनके सामने अब बारिश से बचने की चुनौती खड़ी है.
15 दिनों से अंधेरा
विस्थापित परिवारों की एक बड़ी शिकायत बिजली को लेकर भी है.
उनका कहना है कि करौदिया विस्थापन स्थल पर 15 दिनों से बिजली नहीं है. बच्चों और बुजुर्गों के लिए रात का समय खास तौर पर मुश्किल हो गया है.
बारिश के मौसम में बिजली के साथ रास्तों की समस्या भी परेशानी बढ़ा रही है.

कागजों पर पुनर्वास, जमीन पर सवाल
विस्थापितों का आरोप है कि पुनर्वास की प्रक्रिया कागजों पर भले पूरी दिखाई देती हो, लेकिन जमीन पर तस्वीर अलग है.
कई परिवारों के पास कथित तौर पर पक्की छत, साफ पीने का पानी, बिजली और बेहतर सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं.
विस्थापितों का यह भी आरोप है कि उन्हें पूरा मुआवजा नहीं मिला और आधा-अधूरा मुआवजा देकर उनकी समस्याओं को छोड़ दिया गया.
हालांकि, इन आरोपों पर प्रशासन का पक्ष इस इनपुट में उपलब्ध नहीं है.
बच्चों और बुजुर्गों पर सबसे ज्यादा असर
बारिश, अंधेरा और बुनियादी सुविधाओं की कमी का असर सबसे ज्यादा बच्चों और बुजुर्गों पर पड़ रहा है.
विस्थापित परिवारों के मुताबिक, बच्चे अंधेरे और मुश्किल हालात में रहने को मजबूर हैं, जबकि बुजुर्ग अपने पुराने गांव और पुश्तैनी घर की यादों के साथ नई जगह पर जिंदगी शुरू करने की कोशिश कर रहे हैं.

सवाल सिर्फ पुनर्वास का नहीं
केन-बेतवा लिंक परियोजना को विकास और जल प्रबंधन की बड़ी परियोजना के तौर पर देखा जा रहा है. लेकिन किसी भी बड़ी परियोजना की सफलता सिर्फ उसके आकार या लागत से तय नहीं होती.
सवाल यह भी है कि उसकी कीमत कौन चुका रहा है और जिन लोगों की जमीन, घर और जीवन उस परियोजना के लिए बदले जा रहे हैं, उनके पुनर्वास की स्थिति क्या है.
अगर विकास के नाम पर किसी परिवार को अपना घर, जमीन और पुरानी जिंदगी छोड़नी पड़े, तो क्या सिर्फ मुआवजा देना ही पुनर्वास की जिम्मेदारी पूरी कर देता है?
और करौदिया के अंधेरे में खड़ा सबसे बड़ा सवाल शायद यही है…
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देश की विकास यात्रा में आगे बढ़ने के लिए क्या उन लोगों को पीछे छोड़ देना जरूरी है, जिनकी जमीन पर उस विकास की नींव रखी गई है?
Last Updated on August 23, 2026 9:50 am
