– धीरेंद्र गुप्ता
MP School: बारिश आते ही बालाघाट के किरनापुर इलाके में बच्चों की स्कूल जाने की राह किसी परीक्षा से कम नहीं रह जाती. यहां एक नाले पर पुल नहीं होने के कारण अभिभावकों को अपने बच्चों को कंधे पर बिठाकर पानी पार कराना पड़ता है. हैरानी की बात ये है कि पुल बनाने का आश्वासन मिले तीन साल बीत चुके हैं, लेकिन हालात आज भी वहीं हैं.
बारिश में स्कूल जाना सबसे बड़ी चुनौती
मामला जनपद पंचायत किरनापुर की ग्राम पंचायत सुसवा और उसके एक टोले के बीच बहने वाले नाले का है.
ग्रामीणों के मुताबिक, सामान्य दिनों में तो किसी तरह आवाजाही हो जाती है, लेकिन बारिश के दौरान नाला उफान पर आ जाता है. ऐसे में स्कूली बच्चों के लिए इसे पार करना बेहद मुश्किल और जोखिम भरा हो जाता है.
कई बार हालात इतने खराब हो जाते हैं कि अभिभावकों को बच्चों को कंधे पर बैठाकर नाला पार कराना पड़ता है.
तीन महीने तक स्कूल नहीं पहुंच पाते बच्चे
ग्रामीणों का कहना है कि बारिश के मौसम में समस्या सिर्फ आने-जाने तक सीमित नहीं रहती.
नाला उफान पर रहने के कारण कई स्कूली बच्चे करीब तीन महीने तक नियमित स्कूल नहीं पहुंच पाते. यानी जिस उम्र में बच्चों को किताब और स्कूल की चिंता होनी चाहिए, वहां उनके सामने स्कूल तक पहुंचने के लिए पानी पार करने की चुनौती खड़ी है.
तीन साल पहले मिला था पुल का भरोसा
ग्रामीण बताते हैं कि यह समस्या आज की नहीं है.
पूर्व में ग्राम पंचायत के सरपंच प्रकाश बाहे के नेतृत्व में सैकड़ों ग्रामीण बालाघाट कलेक्टर कार्यालय पहुंचे थे और अपनी समस्याओं को लेकर ज्ञापन सौंपा था.
समस्या का समाधान नहीं होने पर सरपंच समेत सभी पंचों ने सामूहिक इस्तीफा देने तक की बात कही थी.
इसके बाद आरईएस और लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों ने मौके का निरीक्षण किया. ग्रामीणों को बताया गया कि पुल निर्माण के लिए स्टीमेट तैयार किया जाएगा और जल्द निर्माण कराया जाएगा.
लेकिन…
आश्वासन के तीन साल बाद भी वही कहानी
तीन साल गुजर गए.
मौसम बदला.
बारिश फिर आई.
लेकिन पुल नहीं आया.
नाला आज भी बच्चों के रास्ते में खड़ा है और हर बारिश में वही पुरानी परेशानी लौट आती है.
ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन की ओर से आश्वासन तो मिला, लेकिन जमीन पर उसका असर दिखाई नहीं दिया.
अब आंदोलन और चुनाव बहिष्कार की चेतावनी
पुल का इंतजार करते-करते ग्रामीणों का गुस्सा अब बढ़ता जा रहा है.
ग्रामीणों ने प्रशासन की कथित उदासीनता के खिलाफ आंदोलन का रुख अपनाने और चुनाव बहिष्कार की चेतावनी दी है.
उनका सवाल सीधा है – जब तीन साल पहले पुल निर्माण का भरोसा दिया गया था, तो अब तक काम क्यों शुरू नहीं हुआ?
सवाल सिर्फ पुल का नहीं है
यह कहानी सिर्फ एक पुल की नहीं है.
यह सवाल उस व्यवस्था का है, जहां बच्चों को स्कूल पहुंचाने के लिए माता-पिता को उन्हें कंधे पर उठाकर उफनता नाला पार कराना पड़ता है.
तीन साल पहले अगर स्टीमेट और निरीक्षण हो चुका था, तो पुल आज भी कागजों में क्यों है?
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और सबसे बड़ा सवाल…
क्या किसी बच्चे के बहते पानी में फंसने या किसी परिवार के साथ हादसा होने के बाद ही प्रशासन को इस पुल की जरूरत महसूस होगी?
Last Updated on August 23, 2026 9:45 am
