ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट पर आदिवासियों की आपत्ति, क्या बिना सहमति छीनी जा रही जमीन?

ग्रेट निकोबार मेगा प्रोजेक्ट के लिए 166 वर्ग किलोमीटर वन भूमि के इस्तेमाल पर विवाद गहरा गया है. लिटिल और ग्रेट निकोबार ट्राइबल काउंसिल ने कलकत्ता हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर पक्षकार बनाए जाने की मांग की है. परिषद ने वन अधिकार कानून के तहत ग्राम सभाओं की सहमति पर सवाल उठाए हैं, जबकि केंद्र सरकार ने इस मांग का विरोध किया है.

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट: आदिवासी परिषद हाईकोर्ट पहुंची, वन अधिकारों पर क्यों उठे सवाल?
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट: आदिवासी परिषद हाईकोर्ट पहुंची, वन अधिकारों पर क्यों उठे सवाल?
Great Nicobar Project: ग्रेट निकोबार मेगा प्रोजेक्ट के लिए 166 वर्ग किलोमीटर वन भूमि के इस्तेमाल को लेकर कानूनी विवाद गहरा गया है. लिटिल और ग्रेट निकोबार ट्राइबल काउंसिल के अध्यक्ष और सदस्यों ने कलकत्ता हाईकोर्ट की पोर्ट ब्लेयर पीठ में याचिका दाखिल कर एक लंबित जनहित याचिका (PIL) में पक्षकार बनाए जाने की मांग की है. उनका कहना है कि निकोबारी समुदाय ने अपनी पैतृक भूमि को परियोजना के लिए देने की सहमति कभी नहीं दी.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय, जनजातीय कार्य मंत्रालय और अंडमान-निकोबार प्रशासन ने ट्राइबल काउंसिल की इस मांग का विरोध किया है. उनका कहना है कि पक्षकार बनाए जाने की मांग देर से की गई है और इससे पहले से चल रही कानूनी सुनवाई का दायरा बढ़ सकता है.

₹81,000 करोड़ की परियोजना पर विवाद क्यों?

केंद्र सरकार की करीब ₹81,000 करोड़ की ग्रेट निकोबार परियोजना के तहत एक एकीकृत टाउनशिप, गलाथिया बे में ट्रांसशिपमेंट कंटेनर पोर्ट, सौर और गैस आधारित बिजली संयंत्र तथा सैन्य और नागरिक इस्तेमाल वाला नया हवाई अड्डा बनाने की योजना है.

हाल ही में जारी ड्राफ्ट मास्टर प्लान में पर्यटन को भी ग्रेट निकोबार के विकास का प्रमुख आधार बताया गया है. इसके तहत एक नया तटीय शहर, सेवा क्षेत्र और बंदरगाह से जुड़ा वित्तीय केंद्र विकसित करने की योजना है.

लेकिन परियोजना के रणनीतिक और आर्थिक महत्व के साथ-साथ वन भूमि, पर्यावरण और स्थानीय आदिवासी समुदायों के अधिकारों को लेकर सवाल उठ रहे हैं.

आदिवासी परिषद की आपत्ति क्या है?

ट्राइबल काउंसिल के अध्यक्ष बरनाबास मंजू, दो ग्राम प्रमुखों और निकोबारी समुदाय के एक सदस्य ने अदालत में कहा है कि समुदाय ने वन भूमि को परियोजना के लिए देने की सहमति नहीं दी थी.

उनका दावा है कि वन अधिकार अधिनियम (Forest Rights Act – FRA) के तहत आदिवासियों की ग्राम सभाएं भी आयोजित नहीं की गईं. परिषद ने यह भी कहा है कि समुदाय लंबे समय से अपनी पैतृक भूमि पर लौटने की मांग करता रहा है, खासकर द्वीप के दक्षिण-पूर्वी और पश्चिमी तटों पर स्थित अपने पारंपरिक क्षेत्रों में.

यह मामला पूर्व केंद्रीय सचिव मीना गुप्ता की ओर से दाखिल जनहित याचिका से जुड़ा है. हाईकोर्ट में इस बात की जांच की जा रही है कि वन अधिकार अधिनियम के तहत वन भूमि के हस्तांतरण की प्रक्रिया का सही तरीके से पालन हुआ था या नहीं.

वन अधिकार प्रमाणपत्र पर सवाल

विवाद का एक प्रमुख केंद्र 18 अगस्त 2022 को जारी Record of Forest Rights (RoFR) प्रमाणपत्र है. इस प्रमाणपत्र में कहा गया था कि परियोजना के लिए वन भूमि के इस्तेमाल से पहले वन अधिकारों के निपटारे की प्रक्रिया पूरी कर ली गई थी.

याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि प्रमाणपत्र में ग्राम सभाओं की सहमति का गलत उल्लेख किया गया. उनकी याचिका के मुताबिक, जिन बैठकों को सहमति का आधार बताया गया, उनमें निकोबारी समुदाय का कोई सदस्य मौजूद नहीं था.

याचिका में सब-डिविजनल लेवल कमेटी (SDLC) की कार्यवाही पर भी सवाल उठाए गए हैं. यह समिति ग्राम सभाओं से मिले वन अधिकारों के दावों की जांच करती है और प्रमाणपत्र तैयार करने की प्रक्रिया में भूमिका निभाती है.

अध्यक्ष के हस्ताक्षर और सहमति पर विवाद

याचिका के अनुसार, ट्राइबल काउंसिल के अध्यक्ष बरनाबास मंजू ने 13 अगस्त 2022 की SDLC बैठक में अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC) पर हस्ताक्षर किए थे. लेकिन याचिकाकर्ताओं का दावा है कि उन्हें बैठक में अपनी सदस्यता, उद्देश्य और फैसले के संभावित परिणामों की पर्याप्त जानकारी नहीं दी गई थी.

याचिका में कहा गया है कि मंजू को यह भी जानकारी नहीं थी कि उन्हें SDLC का सदस्य बनाया गया है. परिषद का आरोप है कि अध्यक्ष को पूरी जानकारी के बिना समुदाय की ओर से सहमति देने के लिए अधिकृत नहीं माना जा सकता.

याचिका के मुताबिक, मंजू ने बाद में 22 नवंबर 2022 को प्रशासन को पत्र लिखकर वन भूमि हस्तांतरण के लिए दी गई NOC वापस लेने की बात कही थी.

परिषद ने यह भी दावा किया है कि उसने प्रशासन को कई पत्र लिखे और विभिन्न अधिकारियों के दौरों के दौरान अपनी मांगें रखीं. इनमें मेगा प्रोजेक्ट के लिए आयोजित पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) की सार्वजनिक सुनवाई के दौरान उठाई गई मांगें भी शामिल हैं.

केंद्र सरकार और प्रशासन का क्या कहना है?

सितंबर के अंत में दाखिल हलफनामे में केंद्र सरकार और केंद्रशासित प्रदेश प्रशासन ने ट्राइबल काउंसिल की मांग खारिज करने की अपील की. उनका कहना है कि वन अधिकार प्रमाणपत्र करीब चार साल पुराना है और लंबित जनहित याचिका भी लगभग दो साल से चल रही है. ऐसे में अब परिषद को पक्षकार बनाना सुनवाई में देरी कर सकता है.

केंद्र ने यह भी कहा कि परिषद की ओर से उठाए गए मुद्दे पहले से ही लंबित जनहित याचिका में विचाराधीन हैं. उसके मुताबिक, यदि अदालत परिषद की दलीलें सुनने का फैसला करती है, तो उन्हें मौजूदा मामले में उठाए गए मुद्दों तक सीमित रखा जाना चाहिए. केंद्र ने परिषद को औपचारिक पक्षकार बनाने और अलग से लिखित दलीलें दाखिल करने की अनुमति देने का भी विरोध किया है.

अंडमान-निकोबार प्रशासन के जनजातीय कल्याण निदेशालय ने भी कहा कि अध्यक्ष अपनी ओर से SDLC के फैसले पर दी गई सहमति वापस नहीं ले सकते. प्रशासन ने इस कदम को प्रक्रियागत रूप से अनुचित बताया है.

अब अदालत के सामने क्या सवाल हैं?

इस मामले में हाईकोर्ट को यह देखना है कि वन अधिकार अधिनियम के तहत ग्राम सभाओं की प्रक्रिया, SDLC की भूमिका और वन अधिकार प्रमाणपत्र जारी करने में नियमों का पालन हुआ या नहीं. साथ ही, यह भी तय होना है कि ट्राइबल काउंसिल को लंबित जनहित याचिका में पक्षकार बनाया जाए या नहीं.

इससे पहले केंद्र और अंडमान-निकोबार प्रशासन ने मीना गुप्ता की जनहित याचिका पर भी आपत्ति जताई थी. उनका तर्क था कि वह द्वीपों की निवासी नहीं हैं. हालांकि, कलकत्ता हाईकोर्ट की सर्किट बेंच ने उस आपत्ति को खारिज कर मामले की सुनवाई जारी रखने पर सहमति दी थी.

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ग्रेट निकोबार परियोजना को लेकर अब मूल सवाल यही है – क्या विकास और रणनीतिक जरूरतों के नाम पर वन भूमि के इस्तेमाल से पहले स्थानीय आदिवासी समुदायों की सहमति और उनके वन अधिकारों की प्रक्रिया का पूरी तरह पालन किया गया था?

Last Updated on October 20, 2026 8:41 am

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