– धीरेंद्र गुप्ता
Deaf Mute Couple: कभी-कभी अदालत का फैसला सिर्फ किसी मुकदमे का अंत नहीं करता, बल्कि किसी टूटते हुए परिवार को भी संभाल लेता है. ग्वालियर में ऐसा ही एक मामला सामने आया है, जहां आर्थिक तंगी के कारण तलाक की कगार पर पहुंचे एक मूक-बधिर दंपति को हाईकोर्ट की पहल से नई शुरुआत का मौका मिला. कोर्ट ने दोनों के लिए रोजगार की व्यवस्था कराई और हाईकोर्ट परिसर में ही एक कैफे शुरू कराया.
1999 में शादी, 2018 से तलाक की लड़ाई
दीपक और पूजा ने 1999 में शादी की थी. दोनों दिल्ली के एक कैफे में काम करते थे. शुरुआत में जिंदगी ठीक चलती रही, लेकिन आर्थिक परेशानियां बढ़ीं तो पति-पत्नी के बीच विवाद भी बढ़ने लगे.
हालात यहां तक पहुंचे कि 2018 से दोनों तलाक के लिए अदालत पहुंच गए.
लेकिन इस कहानी में अदालत ने सिर्फ यह नहीं देखा कि रिश्ता टूट रहा है. उसने यह भी समझने की कोशिश की कि आखिर इसकी जड़ क्या है.
आर्थिक तंगी बनी सबसे बड़ी वजह
पूजा ने अदालत के सामने अपनी चिंता रखी. उनकी दो बेटियां हैं और उन्हें डर था कि अगर पति के साथ भी रहना हुआ, लेकिन कोई पक्का रोजगार नहीं मिला, तो बेटियों की परवरिश की चिंता जिंदगी भर बनी रहेगी.
यानी विवाद सिर्फ पति-पत्नी के बीच का नहीं था. उसके पीछे रोजी-रोटी और भविष्य की चिंता भी थी.
यहीं से हाईकोर्ट की पहल शुरू हुई.
कोर्ट ने रोजगार का रास्ता निकाला
मामले में मध्यप्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के जरिए हाईकोर्ट परिसर में ही दंपति के लिए एक कैफे की व्यवस्था की गई.
इस पहल के बाद दोनों साथ रहने के लिए राजी हो गए.
यानी अदालत ने रिश्ते को बचाने के साथ-साथ उस वजह को भी दूर करने की कोशिश की, जो इस रिश्ते में तनाव की बड़ी वजह बन रही थी.
कैफे का नाम रखा गया ‘ईशारा’
इस कैफे का नाम भी खास रखा गया है – ‘ईशारा’.
मूक-बधिर दंपति के लिए ग्राहकों से संवाद का तरीका भी अलग रखा गया है. कैफे में एक व्हाइट बोर्ड लगाया गया है, जहां ग्राहक अपना ऑर्डर लिखकर दे सकते हैं.
यानी जिस संवाद की कमी को समाज अक्सर बाधा मानता है, उसे यहां एक नए तरीके से रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनाया गया है.
‘कोर्ट ने रिश्ता भी बचाया, रोजगार भी दिया’
नई जिंदगी शुरू करने वाली पूजा का कहना है कि कोर्ट ने उनका रिश्ता बचाने के साथ रोजगार का रास्ता भी दिया.
उनका संदेश भी सीधा है – पति-पत्नी के बीच झगड़े हो सकते हैं, लेकिन परेशानी आने पर मिलकर उसका सामना करना चाहिए.
इस पहल के पीछे सोच यही नजर आती है कि कई बार रिश्ते को बचाने के लिए सिर्फ समझौता नहीं, बल्कि सम्मान के साथ जीने का रास्ता देना भी जरूरी होता है.
अदालत सिर्फ फैसला सुनाने की जगह नहीं?
ग्वालियर हाईकोर्ट की यह पहल इसलिए भी अलग नजर आती है क्योंकि यहां अदालत ने मामले को सिर्फ तलाक के कानूनी विवाद की तरह नहीं देखा.
आर्थिक तंगी रिश्ते में तनाव की वजह बन रही थी. इसलिए समाधान भी रोजगार के जरिए तलाशा गया.
‘ईशारा’ कैफे इस बात का उदाहरण है कि न्याय सिर्फ कागज पर लिखा फैसला नहीं होता. कभी-कभी न्याय किसी को दोबारा खड़े होने का मौका देना भी होता है.
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और शायद इस कहानी का सबसे बड़ा सवाल यही है – अगर किसी रिश्ते को टूटने से बचाने के लिए सिर्फ कानून नहीं, बल्कि रोजगार और सम्मान की जरूरत हो, तो क्या हमारी न्याय व्यवस्था को ऐसे मानवीय रास्तों के बारे में और ज्यादा सोचना चाहिए?
Last Updated on August 21, 2026 8:53 pm
