भारतीय निवेशकों के लिए इस IPO में सीधे निवेश करना भले ही आसान न हो, लेकिन कंपनी के शेयर बाजार में सूचीबद्ध होते ही कई भारतीय निवेशक उसके शेयर खरीदने की कोशिश कर सकते हैं. इसकी संभावित लिस्टिंग अगले दो सप्ताह में भी हो सकती है. आखिर इसकी वजह क्या है? वजह है शेयर बाजार की भाषा में ‘पॉप’ यानी लिस्टिंग के बाद शेयर की कीमत में तेज उछाल आने की उम्मीद.
घरेलू शेयर बाजार से अपेक्षित रिटर्न नहीं मिलने के बीच भारतीय निवेशक अब तेजी से विदेशों के बाजारों का रुख कर रहे हैं. साल 2026 में अब तक निफ्टी करीब 6 फीसदी नीचे है, हालांकि पिछले एक सप्ताह में इसमें 7 फीसदी की तेजी आई है. ऐसे में भारतीय निवेशक अरबों डॉलर विदेशों में निवेश कर रहे हैं.
अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026-27 में विदेशी शेयरों और डेट इंस्ट्रूमेंट्स में भारतीयों का निवेश पहली बार 4 अरब डॉलर के पार जा सकता है.
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के आंकड़ों के मुताबिक, लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम (LRS) के तहत अप्रैल से अगस्त 2026 के बीच विदेशी शेयरों और डेट इंस्ट्रूमेंट्स में 1.73 अरब डॉलर का निवेश किया गया. यानी हर महीने औसतन करीब 35 करोड़ डॉलर विदेश भेजे गए.
इस आंकड़े की एक और अहम बात है. चालू वित्त वर्ष के शुरुआती पांच महीनों में विदेशों में किया गया 1.73 अरब डॉलर का निवेश पिछले साल इसी अवधि में लगाए गए 82.3 करोड़ डॉलर से दोगुने से भी ज्यादा है. पूरे वित्त वर्ष 2025-26 में यह आंकड़ा 2.65 अरब डॉलर था.
हालांकि, घरेलू बाजार में भारतीय निवेशकों की ओर से लगाए जा रहे पैसे के मुकाबले विदेशी निवेश की यह रकम अभी काफी कम है. उदाहरण के लिए, सितंबर महीने में ही म्यूचुअल फंड की सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) के जरिए घरेलू शेयर बाजार में करीब 3.4 अरब डॉलर का निवेश किया गया.
ग्लोबल निवेश प्लेटफॉर्म Vested के संस्थापक और CEO विरम शाह के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय निवेश के क्षेत्र में कारोबार तेजी से बढ़ रहा है. Vested के नए सक्रिय निवेशकों की संख्या 2024 में 133 फीसदी और 2025 में 79 फीसदी बढ़ी. वहीं, अक्टूबर 2026 तक नए सक्रिय निवेशकों की संख्या 2025 के मुकाबले 33 फीसदी अधिक हो चुकी थी.
विदेशी निवेश के लिए जमा की जाने वाली रकम में भी तेजी से इजाफा हुआ है. 2024 में इसमें 250 फीसदी, 2025 में 140 फीसदी और इस साल अक्टूबर तक 20 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई.
शाह ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया, “कुल मिलाकर 2023 के बाद से सालाना जमा होने वाली रकम करीब 10 गुना बढ़ गई है. यह भारतीय निवेशकों के बीच ग्लोबल निवेश की बढ़ती स्वीकार्यता को दिखाता है. इससे पता चलता है कि अंतरराष्ट्रीय शेयर और दूसरी वैश्विक संपत्तियां धीरे-धीरे निवेश पोर्टफोलियो में विविधता लाने का अहम हिस्सा बन रही हैं.”
Vested फिलहाल करीब 1.5 अरब डॉलर की संपत्तियों का प्रबंधन करता है और इसके लगभग 1.5 लाख सक्रिय निवेशक हैं.
विदेशों में बढ़ता निवेश, भारत से पूंजी बाहर जाने की चिंता
लेकिन विदेशों में निवेश करने वाले सिर्फ व्यक्तिगत निवेशक ही नहीं हैं. पिछले कुछ वर्षों में भारतीय कंपनियों का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) भी तेजी से बढ़ा है. इसे आउटवर्ड फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (Outward FDI) कहा जाता है.
वित्त वर्ष 2018-19 से 2023-24 के बीच छह वर्षों में भारतीय कंपनियों ने विदेशों में करीब 85 अरब डॉलर का निवेश किया था. लेकिन इसके बाद के दो वर्षों और पांच महीनों में यह निवेश बढ़कर 82 अरब डॉलर तक पहुंच गया.
इसके पीछे भू-राजनीतिक परिस्थितियों और विकसित अर्थव्यवस्थाओं की ओर से उत्पादन को अपने देशों में वापस लाने यानी रीशोरिंग (Reshoring) की रणनीति को एक अहम वजह माना जा रहा है.
अब अगर व्यक्तिगत निवेशकों और कंपनियों की ओर से विदेशों में भेजी जा रही इस पूंजी को जोड़ दिया जाए, तो तस्वीर और बड़ी हो जाती है. इसके साथ भारत में पहले किए गए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से विदेशी निवेशकों की ओर से मुनाफा निकालना और ऊर्जा की ऊंची कीमतों के कारण बढ़ता व्यापार घाटा भी जुड़ जाता है.
इन सभी वजहों को देखते हुए पिछले डेढ़ साल में रुपये की तेज गिरावट को समझना मुश्किल नहीं है.
यही कारण है कि सरकार और वित्तीय नियामक विदेशी पूंजी को भारत में आकर्षित करने के लिए कई कदमों पर विचार कर रहे हैं या उन्हें लागू कर चुके हैं. इनमें सरकारी बॉन्ड में विदेशी निवेश पर विदहोल्डिंग टैक्स और कैपिटल गेन टैक्स खत्म करना, बैंकों की फॉरेन करेंसी नॉन-रेजिडेंट (FCNR) जमा पर विनिमय दर के जोखिम को उठाना और शेयरों पर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन (LTCG) तथा ट्रांजैक्शन टैक्स हटाने का प्रस्ताव शामिल है.
रुपये पर दबाव कम करने के लिए कुछ नियामकीय कदम भी उठाए गए हैं. इनके जरिए रुपये की गिरावट से बचाव यानी हेजिंग को महंगा बनाया गया है.
लेकिन एक बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम (LRS) के तहत विदेशों में पैसा भेजने की सालाना 2.5 लाख डॉलर की सीमा को कम कर सकती है?
क्या भारत विदेशों में पैसा भेजने की सीमा घटाएगा?
लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम की शुरुआत फरवरी 2004 में हुई थी. उस समय एक व्यक्ति के लिए विदेशों में पैसा भेजने की सालाना सीमा 25,000 डॉलर तय की गई थी.
इसके बाद समय-समय पर इस सीमा को बढ़ाया गया और फिलहाल यह 2.5 लाख डॉलर सालाना है. हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने इस सीमा को अब तक सिर्फ एक बार घटाया है.
यह फैसला अगस्त 2013 में लिया गया था. उस समय अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ओर से मौद्रिक प्रोत्साहन में कटौती के संकेतों के कारण वैश्विक बाजारों में भारी उथल-पुथल मची हुई थी. इस कदम के बाद RBI पर ‘कैपिटल कंट्रोल’ लागू करने के आरोप लगे थे.
कैपिटल कंट्रोल का मतलब है पूंजी के देश से बाहर जाने पर प्रतिबंध या नियंत्रण लगाना. कोई भी ऐसी अर्थव्यवस्था, जो विदेशी निवेश आकर्षित करना चाहती है, आमतौर पर इस तरह के प्रतिबंध लगाने से बचना चाहती है.
ऐसे में सवाल है कि क्या भारत सरकार और RBI रुपये पर दबाव कम करने के लिए एक बार फिर विदेशों में पैसा भेजने की सीमा घटाने का फैसला कर सकते हैं?
भारतीय निवेशक विदेशों में पैसा क्यों लगा रहे हैं?
भारतीय निवेशकों का विदेशों के बाजारों में पैसा लगाना सिर्फ ज्यादा रिटर्न कमाने की कोशिश नहीं है. इसके पीछे एक बड़ी वजह अपने निवेश पोर्टफोलियो में विविधता लाना भी है.
निवेश की दुनिया में एक कहावत है – अपने सारे अंडे एक ही टोकरी में नहीं रखने चाहिए. यानी निवेश का पूरा पैसा किसी एक बाजार या संपत्ति में लगाने के बजाय अलग-अलग देशों और क्षेत्रों में बांटना जोखिम कम करने का तरीका माना जाता है.
विदेशी शेयरों के अलावा अब भारतीय निवेशकों की दिलचस्पी फिक्स्ड इनकम स्ट्रैटेजी, प्राइवेट क्रेडिट, प्राइवेट मार्केट फंड और दूसरे वैकल्पिक निवेश विकल्पों में भी बढ़ रही है. ये विकल्प GIFT City के जरिए भी उपलब्ध हैं.
कोटक महिंद्रा बैंक की प्रेसिडेंट गौतमी गवांकर के मुताबिक, निवेशक GIFT City और दूसरे माध्यमों के जरिए अपने भारतीय निवेश के साथ वैश्विक अवसरों का लाभ उठाना चाहते हैं.
गवांकर ने कहा कि निवेशक मुद्रा विनिमय के जोखिम को कम करने और ऐसे क्षेत्रों में निवेश करने के लिए विदेशों का रुख कर रहे हैं, जहां भारतीय बाजार में अवसर सीमित हैं.
इन क्षेत्रों में AI इंफ्रास्ट्रक्चर, सेमीकंडक्टर, डिफेंस टेक्नोलॉजी, चिप निर्माण, बायोटेक्नोलॉजी और स्पेस टेक्नोलॉजी शामिल हैं. निवेशक इन क्षेत्रों में फंड के जरिए या सीधे सूचीबद्ध और गैर-सूचीबद्ध कंपनियों में निवेश कर रहे हैं.
विदेशों में सिर्फ शेयरों में ही नहीं, बल्कि दूसरे वित्तीय विकल्पों में भी भारतीयों का निवेश बढ़ा है.
उदाहरण के लिए, साल 2022 की शुरुआत में अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दरें लगभग शून्य थीं. लेकिन 2023 के मध्य तक इन्हें बढ़ाकर 5 फीसदी से ज्यादा कर दिया गया. इसके बाद वैश्विक स्तर पर ब्याज दरों में तेजी आई.
इसका असर भारतीय निवेशकों के फैसलों पर भी पड़ा. वित्त वर्ष 2022-23 और 2023-24 को मिलाकर भारतीयों ने विदेशों में बैंक जमा यानी फॉरेन डिपॉजिट में करीब 2 अरब डॉलर का निवेश किया.
विदेशों में प्रॉपर्टी खरीदने का भी बढ़ा आकर्षण
विदेशों में अचल संपत्ति यानी रियल एस्टेट खरीदना भी भारतीय निवेशकों के लिए आकर्षण का बड़ा केंद्र रहा है.
RBI की लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम के तहत वित्त वर्ष 2025-26 में विदेशों में प्रॉपर्टी खरीदने के लिए रिकॉर्ड 52.9 करोड़ डॉलर भेजे गए.
इसका एक दूसरा पहलू भारत में बढ़ती आय भी है. जैसे-जैसे लोगों की आमदनी और संपत्ति बढ़ती है, उनकी निवेश संबंधी आकांक्षाएं भी घरेलू बाजार से आगे बढ़ने लगती हैं. वे दूसरे देशों के बाजारों, संपत्तियों और अवसरों में भी निवेश करना चाहते हैं.
विदेश यात्रा पर भारतीयों के बढ़ते खर्च को भी इसी बदलाव के उदाहरण के तौर पर देखा जा सकता है.
वित्त वर्ष 2019-20 में भारतीयों ने विदेश यात्राओं पर करीब 7 अरब डॉलर खर्च किए थे. कोरोना महामारी के कारण यह खर्च 2020-21 में घटकर 3.2 अरब डॉलर रह गया. इसके बाद 2021-22 में यह बढ़कर 6.9 अरब डॉलर हुआ.
वित्त वर्ष 2022-23 में विदेश यात्रा पर भारतीयों का खर्च लगभग दोगुना होकर 13.7 अरब डॉलर पहुंच गया. वहीं, 2023-24 में यह बढ़कर रिकॉर्ड 17 अरब डॉलर हो गया.
यानी भारतीयों का पैसा अब सिर्फ देश के शेयर बाजार या घरेलू संपत्तियों तक सीमित नहीं है. बेहतर रिटर्न, निवेश में विविधता, वैश्विक अवसर और बढ़ती आय के चलते भारतीय निवेशक तेजी से अंतरराष्ट्रीय बाजारों की ओर बढ़ रहे हैं.
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Last Updated on November 6, 2026 7:02 am
