Pakistan-Afghanistan Tension: अफगानिस्तान को साधने की नीति अब पाकिस्तान पर भारी क्यों?

Pakistan-Afghanistan Tension के बीच 1 अक्टूबर के हवाई हमलों ने दोनों देशों के रिश्तों को फिर तनावपूर्ण बना दिया है. UNAMA ने 10 नागरिकों की मौत की पुष्टि की, जबकि पाकिस्तान ने 22 आतंकियों को मारने का दावा किया. इसी बीच पूर्व पाकिस्तानी मंत्री मुशाहिद हुसैन ने Afghan Jihad, CIA-ISI फंडिंग और TTP संकट से जुड़ी पुरानी रणनीति पर सवाल उठाए हैं.

Pakistan Airstrikes के बीच पूर्व मंत्री का दावा, पुरानी गलती क्या थी?
Pakistan Airstrikes के बीच पूर्व मंत्री का दावा, पुरानी गलती क्या थी?

Pakistan Afghanistan Conflict: पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ता दिखाई दे रहा है. 1 अक्टूबर को पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के हेलमंद और कुनार प्रांतों में हवाई हमले किए. पाकिस्तान का दावा था कि इन हमलों में 22 “आतंकवादी” मारे गए. वहीं, संयुक्त राष्ट्र सहायता मिशन अफगानिस्तान यानी UNAMA ने इन हमलों में 10 नागरिकों की मौत की पुष्टि की, जिनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे.

ये हमले अफगानिस्तान की जमीन पर पाकिस्तान की ओर से किए गए हालिया हमलों की कड़ी का हिस्सा हैं. इसी पृष्ठभूमि में पाकिस्तान के पूर्व सीनेटर और पूर्व सूचना मंत्री मुशाहिद हुसैन सैयद का एक पुराना सवाल फिर महत्वपूर्ण हो जाता है – क्या अफगानिस्तान को दशकों तक अपनी सुरक्षा और रणनीतिक हितों के हिसाब से प्रभावित करने की पाकिस्तान की कोशिशें आज उसी के लिए सुरक्षा संकट बन गई हैं?

मुशाहिद ने 25 सितंबर को जारी हुए पॉडकास्ट ‘Khancast’ में पाकिस्तान की अफगान नीति और उसके दशकों पुराने इतिहास पर विस्तार से बात की.

उनकी बातों का केंद्रीय तर्क यह था कि पाकिस्तान ने लंबे समय तक अफगानिस्तान में पसंदीदा नेताओं और गुटों को समर्थन देकर वहां की राजनीति को प्रभावित करने की कोशिश की, लेकिन अफगानिस्तान को नियंत्रित करने की यह रणनीति अंततः पाकिस्तान के लिए भी गंभीर सुरक्षा चुनौतियां लेकर आई.

अफगान जिहाद में CIA और ISI की भूमिका

मुशाहिद हुसैन ने दावा किया कि सोवियत संघ के खिलाफ अफगान जिहाद के दौरान अमेरिका की Central Intelligence Agency यानी CIA ने पाकिस्तान की Inter-Services Intelligence यानी ISI को 2.1 अरब डॉलर दिए थे.

उनके मुताबिक, इस पैसे का इस्तेमाल करीब 1 लाख मुजाहिदीन और 20,000 अरब स्वयंसेवकों को प्रशिक्षण देने में किया गया.

मुशाहिद ने इनमें अल-कायदा के मारे जा चुके संस्थापक ओसामा बिन लादेन और संगठन के नेता रहे अयमान अल-जवाहिरी का भी जिक्र किया. जवाहिरी को उन्होंने 9/11 हमलों के प्रमुख योजनाकारों में से एक बताया.

उनके मुताबिक, सऊदी अरब ने भी CIA के 2.1 अरब डॉलर के योगदान के बराबर रकम दी. इस तरह 1979 से 1989 के बीच सोवियत आक्रमण के दौरान अफगानिस्तान में कम से कम 5 अरब डॉलर का इस्तेमाल हुआ.

यहां मुशाहिद का तर्क केवल पैसों तक सीमित नहीं था. उनका कहना था कि इस पूरे दौर ने पाकिस्तान की सुरक्षा नीति, अफगान राजनीति और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को लंबे समय के लिए बदल दिया.

अफगानिस्तान युद्ध में अमेरिका ने कितना पैसा खर्च किया?

मुशाहिद ने Brown University के शोध का हवाला देते हुए कहा कि अमेरिका ने अक्टूबर 2001 से अगस्त 2021 के बीच अफगानिस्तान में करीब 2.2 ट्रिलियन डॉलर खर्च किए.

उनके मुताबिक यह औसतन करीब 10 करोड़ डॉलर प्रतिदिन बैठता है.

Brown University के Costs of War Project के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2001 से वित्त वर्ष 2022 तक Afghanistan-Pakistan theatre में कुल लागत लगभग 2.3 ट्रिलियन डॉलर थी. भविष्य में Veterans यानी पूर्व सैनिकों की देखभाल से जुड़ी देनदारियों को भी जोड़ दिया जाए तो यह आंकड़ा करीब 3.4 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचता है.

लेकिन सवाल यह है कि इतना पैसा आखिर गया कहां?

मुशाहिद के मुताबिक, इसका फायदा अमेरिकी लोगों, अफगान अभिजात वर्ग और कुछ पाकिस्तानियों को मिला. उनके अनुसार, इस भू-राजनीतिक संघर्ष में पश्तून सबसे बड़े पीड़ित रहे.

हालांकि, उन्होंने अफगान जिहाद से पाकिस्तान को मिलने वाले एक बड़े लाभ का भी जिक्र किया. उनके मुताबिक, इस पूरे दौर की आड़ में पाकिस्तान परमाणु शक्ति बना.

1975 से शुरू हो गई थी अफगान राजनीति को प्रभावित करने की कोशिश?

मुशाहिद के मुताबिक, पाकिस्तान की अफगानिस्तान को प्रभावित करने की कोशिश सोवियत आक्रमण के समय से भी पहले शुरू हो चुकी थी.

उन्होंने 1975 का उदाहरण दिया.

उनके अनुसार, पाकिस्तान ने उस समय अफगानिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति दाऊद खान की सरकार के विरोधी नेताओं को शरण दी थी.

इनमें:

  • अहमद शाह मसूद
  • गुलबुद्दीन हिकमतयार
  • अब्दुल रब रसूल सय्याफ
  • बुरहानुद्दीन रब्बानी

जैसे नाम शामिल थे.

मुशाहिद के मुताबिक, यह कदम दाऊद खान की ‘Pashtunistan’ नीति के जवाब में उठाया गया था, जिसके कारण पाकिस्तान और अफगानिस्तान के संबंध खराब हुए थे.

उन्होंने इसी संदर्भ में कहा कि “अफगान जिहाद की तैयारी 1975 में ही शुरू हो गई थी.”

यानी उनके हिसाब से अफगानिस्तान में प्रभाव स्थापित करने की पाकिस्तान की रणनीति 1979 के सोवियत आक्रमण के बाद नहीं, बल्कि उससे कई साल पहले आकार लेने लगी थी.

“अफगान किसी के नहीं होते”

मुशाहिद हुसैन की बातचीत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा अफगान समाज और वहां की राजनीति को लेकर था.

उनका कहना था कि पाकिस्तान ने लंबे समय तक अफगानिस्तान में अपने पसंदीदा नेताओं या गुटों को समर्थन देकर वहां की राजनीति को प्रभावित करने की कोशिश की.

लेकिन उन्होंने इस सोच को खारिज किया कि अफगान नेता किसी दूसरे देश के “आदमी” या Proxy होते हैं.

मुशाहिद के शब्दों में, “अफगान किसी के नहीं होते. वे गरीब लेकिन गर्व करने वाले लोग हैं. वे सिर्फ अपने हैं और सबसे पहले राष्ट्रवादी हैं.”

उन्होंने अफगानिस्तान के अलग-अलग दौर के नेताओं का उदाहरण देते हुए कहा कि जाहिर शाह से लेकर नजीबुल्लाह, करजई और यहां तक कि तालिबान तक – सभी सबसे पहले अफगान रहे हैं.

यानी उनके अनुसार, अफगानिस्तान की राजनीति को केवल बाहरी ताकतों के चश्मे से समझना गलत होगा.

उन्होंने पाकिस्तान की राजनीति से तुलना करते हुए कहा कि वहां Army Chief अपना आदमी प्रधानमंत्री बनाना चाहता है और प्रधानमंत्री अपना आदमी Army Chief बनाना चाहता है. लेकिन अफगानिस्तान में यही मॉडल लागू नहीं होता.

क्या पाकिस्तान ने करजई को राष्ट्रपति बनाने में भूमिका निभाई?

मुशाहिद ने हामिद करजई के राष्ट्रपति बनने के दौर का भी जिक्र किया.

उनके मुताबिक, 2004 में पाकिस्तान ने करजई को सत्ता में आने में मदद की थी.

मुशाहिद ने दावा किया कि जब करजई ने तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति और सेना प्रमुख जनरल परवेज मुशर्रफ से मदद मांगी, तो मुशर्रफ ने समर्थन किया और अफगान शरणार्थियों से करजई के पक्ष में वोट करने को कहा.

उनके मुताबिक, इसका परिणाम करजई की जीत के रूप में सामने आया.

मुशाहिद ने अमेरिका के पूर्व Afghanistan Special Envoy रिचर्ड हॉलब्रुक के साथ अपनी बातचीत का भी जिक्र किया.

उनके मुताबिक, हॉलब्रुक ने उनसे पूछा था कि अफगानिस्तान का राष्ट्रपति कौन होना चाहिए क्योंकि वह “करजई को हटाना” चाहते थे. हॉलब्रुक अपने साथ संभावित उम्मीदवारों की एक सूची भी लेकर आए थे.

मुशाहिद ने उन्हें मजाक में जवाब दिया था – “करजई आपसे ज्यादा लंबे समय तक रहेंगे.”

मुशाहिद का मतलब राजनीतिक रूप से था. लेकिन संयोग से करजई वास्तव में हॉलब्रुक से ज्यादा समय तक जीवित रहे. हॉलब्रुक की 2010 में मृत्यु हो गई थी.

क्या पाकिस्तान अब भी अफगानिस्तान को “पांचवां प्रांत” मानता है?

मुशाहिद से जब पूछा गया कि क्या पाकिस्तान अभी भी अफगानिस्तान को अपना “fifth province” यानी पांचवां प्रांत मानता है, तो उन्होंने मौजूदा पाकिस्तानी सैन्य नेतृत्व को लेकर एक महत्वपूर्ण बात कही.

उनके मुताबिक, जनरल असीम मुनीर के नेतृत्व वाला मौजूदा Establishment पहला ऐसा नेतृत्व है जो अफगानिस्तान को इस नजरिए से नहीं देखता और तालिबान को अपना नहीं मानता.

यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पाकिस्तान और तालिबान के बीच पिछले कुछ समय में संबंधों में तनाव बढ़ा है.

लेकिन मुशाहिद के पूरे तर्क का बड़ा सवाल यही है – अगर दशकों तक अफगानिस्तान में प्रभाव बनाए रखने की नीति अपनाई गई, तो उस नीति का आज पाकिस्तान की अपनी सुरक्षा पर क्या असर पड़ा?

TTP से बातचीत का फैसला क्यों हुआ था?

मुशाहिद ने 5 जुलाई 2022 को हुई एक National Security Meeting का भी जिक्र किया.

उनके मुताबिक, इस बैठक में तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा, लेफ्टिनेंट जनरल नदीम अंजुम, जो उस समय DG-ISI थे, और लेफ्टिनेंट जनरल फैज हमीद, जो उस समय पेशावर के Corps Commander थे, शामिल थे.

बैठक में फैज हमीद ने Tehreek-e-Taliban Pakistan यानी TTP के साथ बातचीत शुरू करने की जरूरत पर प्रस्तुति दी थी.

मुशाहिद के मुताबिक, इस प्रस्ताव पर केवल तीन लोगों ने सवाल उठाया था:

  • खुद मुशाहिद हुसैन
  • National Democratic Movement के नेता मोहसिन दावर
  • Pakistan Peoples Party के नेता बिलावल भुट्टो जरदारी

यहां से पाकिस्तान की TTP नीति को लेकर एक और बड़ा सवाल सामने आता है – क्या बातचीत के जरिए सुरक्षा संकट खत्म करने की कोशिश ने समस्या को कम किया या आगे चलकर हालात और जटिल हुए?

इमरान खान TTP के साथ बातचीत के पक्ष में थे?

जब मुशाहिद से पूछा गया कि क्या पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान TTP के साथ बातचीत के पक्ष में थे, तो उन्होंने कहा कि खान ने यहां तक सुझाव दिया था कि TTP का एक कार्यालय पेशावर में होना चाहिए.

यह दावा मुशाहिद की बातचीत का हिस्सा है. उनके अनुसार, उस समय पाकिस्तान में TTP के साथ बातचीत को लेकर राजनीतिक और सुरक्षा स्तर पर अलग-अलग राय मौजूद थी.

2026 में पाकिस्तान की सुरक्षा स्थिति कितनी गंभीर?

मुशाहिद ने मौजूदा सुरक्षा स्थिति पर भी चिंता जताई.

उन्होंने कहा कि 2026 में अब तक 200 पुलिसकर्मी मारे जा चुके हैं और खैबर पख्तूनख्वा में करीब 600 आतंकवादी हमले दर्ज किए गए हैं.

इसी आधार पर उन्होंने पाकिस्तान के लिए “healing touch” और “course correction” की जरूरत बताई.

उनका कहना था कि यह बदलाव सिर्फ घरेलू राजनीति में नहीं, बल्कि Afghanistan policy में भी जरूरी है.

मुशाहिद के मुताबिक, पाकिस्तान की मौजूदा समस्या केवल आतंकवाद या अफगानिस्तान तक सीमित नहीं है. इसमें Geopolitics, Counter-Terrorism और Domestic Politics तीनों एक-दूसरे से जुड़ चुके हैं.

उनके अनुसार, यह मिश्रण इतना खतरनाक हो गया है कि स्थिति किसी भी समय विस्फोटक हो सकती है.

चीन, तुर्की, ईरान और रूस भी पाकिस्तान की नीति से असहमत?

मुशाहिद ने दावा किया कि चीन, तुर्की, ईरान, कतर, रूस और उज्बेकिस्तान जैसे देशों का मानना है कि पाकिस्तान का मौजूदा दृष्टिकोण सही नहीं है.

हालांकि, बातचीत में इन देशों के रुख के बारे में विस्तृत प्रमाण या अलग-अलग उदाहरण प्रस्तुत नहीं किए गए. इसलिए इस हिस्से को मुशाहिद के आकलन के तौर पर ही देखा जाना चाहिए.

दशकों पुरानी नीति का हिसाब अब पाकिस्तान से कौन मांगेगा?

पाकिस्तान-अफगानिस्तान संबंधों की कहानी सिर्फ सीमा विवाद या हालिया हवाई हमलों की कहानी नहीं है.

मुशाहिद हुसैन की बातों में एक बड़ा ऐतिहासिक सवाल छिपा है – क्या किसी पड़ोसी देश की राजनीति को दशकों तक अपनी सुरक्षा जरूरतों के हिसाब से प्रभावित करने की कोशिश आखिरकार उल्टा असर डाल सकती है?

पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में अलग-अलग दौर में अलग-अलग नेताओं और गुटों के साथ संबंध बनाए. सोवियत युद्ध से लेकर अमेरिकी युद्ध, तालिबान और TTP तक यह नीति कई चरणों से गुजरी.

आज जब पाकिस्तान खुद अफगानिस्तान से लगे इलाकों में आतंकवादी हमलों और सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहा है और अफगान धरती पर हवाई हमले कर रहा है, तब मुशाहिद का यह सवाल खास महत्व रखता है.

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उनका संदेश भी इसी दिशा में था – पाकिस्तान नई गलतियां कर सकता है, लेकिन उसे अपनी पुरानी गलतियों को दोहराना नहीं चाहिए.

और शायद यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सवाल है – क्या पाकिस्तान अब अपनी Afghanistan Policy में वास्तव में course correction करेगा, या दशकों पुरानी रणनीति का चक्र इसी तरह चलता रहेगा?

Last Updated on October 5, 2026 7:58 am

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