Noida workers protests: नोएडा में बेहतर वेतन और काम की बेहतर शर्तों को लेकर अप्रैल में हुए मजदूरों के प्रदर्शन के बाद 200 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया गया. अब The Indian Express की जांच में सामने आया है कि सात FIR से जुड़े 222 जमानत आदेशों में 188 मामलों में अदालतों ने राहत दी. लेकिन कई मजदूरों के लिए जेल से बाहर आना कहानी का अंत नहीं, एक नई मुश्किल की शुरुआत है.
सड़क पर मजदूर, फिर जेल तक पहुंची कहानी
अप्रैल में नोएडा के औद्योगिक इलाकों में मजदूर वेतन बढ़ाने, काम के घंटे और ओवरटाइम समेत बेहतर कामकाजी परिस्थितियों की मांग को लेकर सड़कों पर उतरे थे.
इन प्रदर्शनों के पीछे बढ़ता आर्थिक दबाव, काम के बढ़ते लक्ष्य और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी शिकायतें भी थीं. कई मजदूरों ने बताया था कि कागज पर आठ घंटे की शिफ्ट होने के बावजूद उन्हें 10 से 12 घंटे तक काम करना पड़ता था. बड़ी संख्या में कर्मचारी ठेकेदारों के जरिए अस्थायी तौर पर काम कर रहे थे.
13 अप्रैल को प्रदर्शन के दौरान हिंसा की घटनाएं भी सामने आईं. इसके बाद पुलिस कार्रवाई हुई और 200 से ज्यादा लोगों को हिरासत में लिया गया. कुछ आरोपियों पर दंगा, आगजनी, साजिश और हत्या के प्रयास जैसे गंभीर आरोप लगाए गए. औसतन 53 दिन जेल में रहे आरोपी
यहीं से The Indian Express की जांच ने पुलिस कार्रवाई और उसके बाद अदालतों में चले मामलों को खंगालना शुरू किया.
सात प्रमुख FIR में 222 जमानत आदेशों की जांच की गई. इनमें 188 मामलों यानी करीब 84 फीसदी मामलों में जमानत मिली. जांच के मुताबिक, 106 गिरफ्तारियों में आरोपी औसतन 53 दिन हिरासत में रहे.
अदालतों के आदेशों में बार-बार एक बात सामने आई – सिर्फ प्रदर्शन में मौजूद होना किसी व्यक्ति को गंभीर अपराध का दोषी मानने के लिए पर्याप्त नहीं है.
कई मामलों में अदालतों ने पूछा कि आरोपी की कथित हिंसक गतिविधि से जुड़ा विशिष्ट सबूत कहां है?
अदालतों ने क्या सवाल उठाए?
जमानत आदेशों के विश्लेषण में तीन बातें खास तौर पर सामने आईं.
पहली – सिर्फ भीड़ में मौजूद होना जमानत से इनकार करने का आधार नहीं हो सकता.
दूसरी – गंभीर आरोप अपने आप में पर्याप्त नहीं हैं, अगर आरोपी के खिलाफ कोई ठोस और विशिष्ट सबूत नहीं है.
तीसरी – सामान्य मजदूरों और हिंसा भड़काने या प्रदर्शन को संगठित करने के आरोपी लोगों को एक ही नजर से नहीं देखा जा सकता.
कुछ मामलों में पुलिस ने आरोपियों को WhatsApp समूह बनाने, लोगों को प्रदर्शन में जुटाने या साजिश में भूमिका निभाने का आरोपी बनाया. जहां अदालतों को ऐसी भूमिका से जुड़ा प्रथम दृष्टया सबूत मिला, वहां जमानत खारिज भी हुई. यानी अदालतों ने यह नहीं कहा कि प्रदर्शन में हुई हिंसा के लिए किसी पर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए. सवाल यह था कि जिस व्यक्ति पर आरोप लगाया गया है, उसके खिलाफ व्यक्तिगत और ठोस सबूत क्या है?
किसी को घर के पास से उठाया, कोई ‘पूरी-सब्जी’ लेने निकला था
इस कहानी का सबसे मानवीय और परेशान करने वाला हिस्सा उन परिवारों की स्थिति है, जिनके सदस्य जेल से बाहर तो आ गए, लेकिन सामान्य जिंदगी में लौट नहीं पा रहे.
The Indian Express की रिपोर्ट के मुताबिक, एक 34 वर्षीय दिहाड़ी मजदूर को 14 अप्रैल को नोएडा के लेबर चौक से उस समय गिरफ्तार किया गया, जब वह काम की तलाश में निकला था. वह करीब 40 दिन बाद जमानत पर बाहर आया. उसके परिवार ने जेल और अदालत के चक्कर में करीब 50 हजार रुपये खर्च किए.
एक दूसरा मामला 19 साल के मजदूर का है. वह जनवरी में नोएडा आया था और 12वीं पास करने के बाद काम करके अपने परिवार की मदद करना चाहता था.
14 अप्रैल को वह अपने काम की जगह से सिर्फ पूरी-सब्जी लेने बाहर निकला था. पुलिस ने उसे तीन अन्य लोगों के साथ हिरासत में लिया. आरोप गंभीर थे और उसे जेल भेज दिया गया.
18 मई को जमानत मिलने के बाद वह बाहर आया और बाद में कॉल सेंटर में काम करने लगा.
लेकिन उसके लिए डर खत्म नहीं हुआ.
उसने परिवार के हवाले से बताया कि उसके माता-पिता अब दिन में करीब छह बार फोन करते हैं, इस डर से कि कहीं पुलिस उसे दोबारा न उठा ले.
जेल से बाहर, लेकिन कर्ज में परिवार
एक और परिवार के दो युवक 14 अप्रैल को नोएडा के सेक्टर 58 स्थित घर के बाहर की गली से पकड़े गए थे.
उन पर हत्या के प्रयास, दंगा, खतरनाक हथियारों से चोट पहुंचाने और संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसे आरोप लगाए गए.
परिवार ने आरोपों से इनकार किया और बताया कि दोनों को बाहर निकालने की कोशिश में करीब 3 लाख रुपये खर्च हो चुके हैं.
यानी जमानत का मतलब सिर्फ जेल का दरवाजा खुलना नहीं था.
उसके साथ आया –
कर्ज.
अदालतों के चक्कर.
जेल में मुलाकात का खर्च.
काम छूटने का नुकसान.
और कई परिवारों के लिए एक नया डर – अगर दोबारा पुलिस उठा ले गई तो?
16 साल के नाबालिग का मामला भी सामने आया
मजदूरों की ओर से अदालत में पैरवी कर रहे वकील के मुताबिक, एक 16 वर्षीय नाबालिग को भी दो महीने से ज्यादा समय तक वयस्कों के साथ कसना जेल में रखा गया था.
वकील के मुताबिक, उसे दो जमानतदारों के साथ 50-50 हजार रुपये के बॉन्ड भरने को कहा गया था. बाद में यह राशि 30-30 हजार रुपये की गई और अन्य मामलों में व्यक्तिगत बॉन्ड पर जमानत मिली.
वकील का कहना था कि मजदूरों को जमानत के बाद भी बॉन्ड भरने, सत्यापन कराने और अपने मूल स्थानों से अदालतों तक आने-जाने में लगातार खर्च उठाना पड़ रहा है.
एक प्रदर्शन, कई FIR और ‘जमानत’ का पेच
25 वर्षीय फैक्ट्री कर्मचारी मनीषा चौहान ने इलाहाबाद हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज 11 FIR को एक साथ जोड़ने की मांग की है.
उनकी दलील है कि ये FIR 10 से 13 अप्रैल के दौरान हुई घटनाओं से जुड़ी हैं और कई मामलों में पुलिस की चार्जशीट में सबूत और गवाह भी एक-दूसरे से मिलते-जुलते हैं.
उनके वकील माणिक गुप्ता के मुताबिक, एक ही आंदोलन से जुड़े कई मामलों में अलग-अलग FIR होने के कारण किसी आरोपी को एक मामले में जमानत मिलने के बाद दूसरे मामले में जेल में रहना पड़ सकता है.
यानी कागज पर जमानत मिल गई, लेकिन जेल से बाहर निकलने की राह फिर भी बंद रह सकती है.
याचिका में इसी वजह से आरोप लगाया गया है कि कई FIR की व्यवस्था जांच से ज्यादा लगातार हिरासत का जरिया बन गई है. यह फिलहाल याचिकाकर्ता की दलील है और अदालत का अंतिम फैसला आना बाकी है.
मजदूरों की मांग क्या थी?
नोएडा के इन प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि में वेतन और कामकाजी परिस्थितियों को लेकर नाराजगी थी.
हरियाणा में मानेसर के प्रदर्शनों के बाद 9 अप्रैल को राज्य सरकार ने न्यूनतम मासिक मजदूरी में 35 फीसदी बढ़ोतरी का ऐलान किया था. इसके बाद 14 अप्रैल को उत्तर प्रदेश ने भी नोएडा और गाजियाबाद में अंतरिम वेतन वृद्धि की घोषणा की.
अकुशल श्रमिकों के लिए वेतन 11,313 रुपये से बढ़ाकर 13,690 रुपये और कुशल श्रमिकों के लिए 13,940 रुपये से बढ़ाकर 16,868 रुपये किया गया.
यानी जिस मुद्दे को लेकर मजदूर सड़क पर उतरे थे, उस पर सरकार ने वेतन बढ़ाया.
लेकिन प्रदर्शन के बाद शुरू हुई पुलिस और कानूनी कार्रवाई की कीमत कई परिवार आज भी चुका रहे हैं.
जंतर-मंतर और नोएडा की कहानी में फर्क क्यों?
The Indian Express की पड़ताल ने नोएडा के प्रदर्शन की तुलना हाल के जंतर-मंतर प्रदर्शन से भी की है.
जंतर-मंतर पर परीक्षा व्यवस्था को लेकर हुए आंदोलन के बाद केंद्र और राज्यों की ओर से प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हिंसक प्रदर्शन से जुड़े मामलों में कार्रवाई न करने का आश्वासन दिया गया था.
इसके उलट नोएडा के मजदूरों को ऐसा आश्वासन नहीं मिला. वहां 200 से ज्यादा गिरफ्तारियां हुईं और फिर अदालतों के जरिए धीरे-धीरे राहत मिली.
यहीं यह कहानी सिर्फ नोएडा के मजदूरों की नहीं रह जाती.
यह सवाल बन जाती है कि क्या विरोध करने वाले हर व्यक्ति को एक ही नजर से देखा जा सकता है?
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असली सवाल: विरोध की कीमत कौन चुका रहा है?
कानून-व्यवस्था बनाए रखना सरकार की जिम्मेदारी है. अगर किसी प्रदर्शन में हिंसा, आगजनी या किसी व्यक्ति के खिलाफ अपराध के ठोस सबूत हैं, तो कार्रवाई होनी चाहिए.
लेकिन दूसरी तरफ, अदालतों के जमानत आदेश यह भी याद दिलाते हैं कि आरोप और अपराध साबित होना एक ही बात नहीं है.
The Indian Express की जांच में सामने आए 222 जमानत आदेशों में 188 मामलों में राहत मिलना और कई आदेशों में आरोपी की व्यक्तिगत भूमिका तथा सबूत पर सवाल उठना इस बहस को और गंभीर बनाता है.
और सबसे बड़ा सवाल शायद यही है –
अगर एक मजदूर बेहतर वेतन और बेहतर काम की मांग को लेकर सड़क पर आता है, तो क्या उसकी आवाज का जवाब सिर्फ पुलिस और मुकदमे से दिया जाएगा?
और अगर अदालत बाद में पूछती है कि उस व्यक्ति ने आखिर किया क्या था, तो क्या तब तक उसके परिवार द्वारा चुकाई गई जेल, जमानत, कर्ज और डर की कीमत वापस की जा सकती है?
लोकतंत्र में विरोध का अधिकार और कानून-व्यवस्था की जरूरत दोनों साथ चलने चाहिए. असली परीक्षा यही है कि व्यवस्था हिंसा के दोषियों तक पहुंचे, लेकिन सिर्फ भीड़ का हिस्सा होने की कीमत किसी निर्दोष मजदूर को अपनी जिंदगी से न चुकानी पड़े.
Last Updated on August 21, 2026 8:41 am
