APJ Abdul Kalam Story: मिलाइल मैन एपीजे अब्दुल कलाम की आज पुण्यतिथि है. उनके गुज़रने के ग्यारह साल बाद भी, पूर्व राष्ट्रपति का सफर युवाओं के प्रेरणादायी है. साल 2015 को IIM शिलांग के छात्रों से बात करते हुए डॉ. ए.पी.जे अब्दुल कलाम का निधन हो गया था. उनके निधन के 11 साल बाद भी देश न सिर्फ एक पूर्व राष्ट्रपति को याद कर रहा है, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति को भी याद कर रहा है जिनका जीवन यह बताता था कि एक बंद दरवाजा भी रनवे बन सकता है. पढ़िए ए.पी.जे अब्दुल कलाम के जीवन का प्रेरणादायी सफर.
कैसा था APJ Abdul Kalam का शुरुआती जीवन?
रामेश्वरम के एक छोटे से घर में रहने वाला एक लड़का रोज सुबह अखबार बांटता था. परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, लेकिन उसके सपने बहुत बड़े थे. जब भी वह आसमान में उड़ते विमान देखता, उसकी आंखों में एक नई चमक आ जाती. उसे लगता था कि एक दिन वह भी उड़ान से जुड़ा कुछ बड़ा करेगा. उस लड़के का नाम था ए.पी.जे. अब्दुल कलाम.
पैसों की कमी के बावजूद उन्होंने पढ़ाई नहीं छोड़ी. पहले फिजिक्स की पढ़ाई की और फिर अपने सबसे बड़े सपने को पूरा करने के लिए मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) में एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में दाखिला लिया. कलाम के लिए हवाई जहाज़ सिर्फ़ लोहे की मशीन नहीं थे. वे उनके सपनों, उम्मीदों और नई संभावनाओं का प्रतीक थे. यही सपना उन्हें आगे चलकर भारत का ‘मिसाइल मैन’ और ‘जनता का राष्ट्रपति’ बनने की राह पर ले गया.
वह सपना जो नौवें स्थान पर आकर खत्म हो गया
अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद, कलाम को दो इंटरव्यू के लिए बुलावा आया. एक दिल्ली में ‘डायरेक्टरेट ऑफ़ टेक्निकल डेवलपमेंट एंड प्रोडक्शन’ से था. दूसरा भारतीय वायु सेना (IAF) से था, जो उनके दिल के सबसे करीब था. देहरादून में वायु सेना चयन बोर्ड में, आठ रिक्तियों के लिए 25 उम्मीदवार प्रतिस्पर्धा कर रहे थे. कलाम नौवें स्थान पर रहे.
एक सपना जो पहुंच से दूर रह गया
‘विंग्स ऑफ़ फ़ायर’ में, कलाम ने याद किया कि वे चलते-चलते एक चट्टान के किनारे तक पहुंच गए थे, जहाँ उन्हें अपनी सबसे प्यारी महत्वाकांक्षा का अंत होता हुआ महसूस हो रहा था. फिर वे असफलता का बोझ लिए ऋषिकेश गए. वहीं उन्हें एक सच्चाई समझ में आई जिसे वे बाद में छात्रों की पीढ़ियों तक पहुँचाते रहे. असफलता हमेशा अंतिम फ़ैसला नहीं होती. कभी-कभी, यह जीवन का किसी व्यक्ति को उस काम की ओर ले जाने का तरीका होता है जिसके लिए वे बने हैं.
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एक वैज्ञानिक जिसने भारत को उड़ान दी
कलाम IAF पायलट नहीं बन पाए. इसके बजाय, वे डिफेंस और स्पेस रिसर्च की दुनिया में आ गए, जहाँ उन्होंने भारत को बड़े सपने देखने में मदद की. सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल प्रोग्राम से लेकर अग्नि और पृथ्वी मिसाइलों के विकास तक, वे भारत की वैज्ञानिक और रणनीतिक आत्मनिर्भरता के केंद्र बन गए.
जिस युवा को कॉकपिट में जगह नहीं मिली थी, उसने ऐसी टेक्नोलॉजी बनाने में मदद की जिसने देश को आसमान में आत्मविश्वास दिया. उनके काम ने उन्हें एक राष्ट्रीय हस्ती बना दिया; उनकी सादगी और युवाओं के साथ जुड़ाव ने उन्हें सबका चहेता बना दिया. 2002 में, वे भारत के 11वें राष्ट्रपति बने-और उस पद के कारण, सशस्त्र बलों के सुप्रीम कमांडर भी बने.
जब सपना आसमान में वापस लौटा
8 जून, 2006 को, 74 वर्षीय राष्ट्रपति पुणे के पास लोहेगाँव एयर फ़ोर्स स्टेशन पहुँचे. G-सूट पहनकर, वे भारतीय वायु सेना के सुखोई-30MKI के पिछले कॉकपिट में बैठे, जिसे विंग कमांडर अजय राठौर उड़ा रहे थे. लगभग 40 मिनट तक, डॉ. कलाम ने IAF बेड़े के सबसे एडवांस्ड फाइटर जेट्स में से एक में सुपरसोनिक उड़ान भरी.
जो व्यक्ति एक रैंक से एयर फ़ोर्स में चुने जाने से चूक गया था, वह आखिरकार आसमान में लौट आया था-उस युवा पायलट के रूप में नहीं जिसकी उसने कभी कल्पना की थी, बल्कि भारत के राष्ट्रपति के रूप में. भारत की रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने वाले वैज्ञानिक कॉकपिट के अंदर से उस सेना की ताकत का अनुभव कर रहे थे जिसमें शामिल होने की उन्होंने कभी उम्मीद की थी.
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महज एक उड़ान से कहीं बढ़कर
वह सुखोई उड़ान राष्ट्रपति के लिए महज एक रोमांचक सफर नहीं थी. यह उस निराशा का एक शांत जवाब था. कलाम ने अपनी पुरानी असफलता को मिटाया नहीं था; बल्कि उससे आगे बढ़ चुके थे. उन्होंने दिखाया कि सपने अपना रूप बदल सकते हैं, लंबा सफर तय कर सकते हैं और ऐसे तरीकों से पूरे हो सकते हैं जिनकी किसी ने कल्पना भी नहीं की हो.
उनकी पुण्यतिथि पर, डॉ. कलाम की यही छवि शायद सबसे ज़्यादा याद रहती है. एक ऐसा व्यक्ति जिसने बाल-बाल बचने के बावजूद उसे खुद पर हावी नहीं होने दिया और आसमान को छू लिया-पहले भारत के लिए, और फिर अंत में खुद के लिए.
Last Updated on July 27, 2026 8:10 pm
