Pellet Gun Attack: कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के दौरान की गई पुलिस की कार्रवाई पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं. छात्रों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान पुलिस की ओर से लाठीचार्ज किया गया, आंसू गैस के गोले दागे गए और पैलट गन का इस्तेमाल किया गया. दिल्ली पुलिस की इस कार्रवाई से कई छात्र गंभीर रूप से घायल हुए, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर अब भी मौजूद है. वहीं, शुक्रवार को राहुल गांधी ने मीडिया के सामने यह आरोप लगाया था कि छात्रों पर पुलिस ने जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग किया. उन्होंने एक छात्र पर हुए पैलट गन के हमले को दिखाते हुए कहा कि देखिए इस छात्र को आंख से दिखाई नहीं दे रहा. उन्होंने छात्र की शरीर पर लगे पैलट गन के निशान भी दिखाए. इतना ही नहीं, संसद चलो मार्च के दौरान एक पत्रकार को भी पुलिस के पैलेट गन का शिकार होना पड़ा. पैलेट गन से घायल पत्रकार ने आपबीती बताई, जो रोंगटे खड़े कर देने वाला है.
पैलट गन से घायल पत्रकार की आपबीती
India Today की रिपोर्ट के मुताबिक, ‘चलो संसद’ मार्च के तीन दिन बाद, ‘आउटलुक’ के 28 साल के स्पोर्ट्स जर्नलिस्ट दिल्ली में अपने घर लौट आए हैं. वे शरीर में धंसी 30 से ज़्यादा छर्रों (पेलेट्स) के दर्द के बावजूद काम कर रहे हैं. सफदरजंग अस्पताल की 22 जुलाई की मेडिकल रिपोर्ट, में कहा गया है कि उन्हें जंतर-मंतर पर “पेलेट गन से हमले” के कारण चोटें आईं. उनके दाहिने हाथ, छाती और पीठ पर घाव थे. अस्पताल की जांच में उनके दाहिने हाथ, छाती और पीठ पर छोटे-छोटे छेद जैसे घाव पाए गए और डॉक्टरों ने माना कि ये चोटें “पेलेट्स (छर्रों) के कारण” लगी हैं. चोटों के बावजूद, पत्रकार ने घर से काम करना शुरू कर दिया है.
आंसू गैस का गोला मुझे भी लगा
20 जुलाई को, काली टी-शर्ट, हल्के भूरे रंग की पैंट और ग्रे स्पोर्ट्स शूज़ पहने 28 साल के इस युवक ने कनॉट प्लेस के B-ब्लॉक में अपनी पल्सर मोटरसाइकिल पार्क की. इसके बाद वह ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के ‘चलो संसद’ मार्च में शामिल हुआ. इस मार्च का मकसद परीक्षा के पेपर लीक होने के मामले में केंद्र सरकार से जवाबदेही मांगना और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा सुनिश्चित करना था. वह कहते हैं, “सोनम वांगचुक को ले जाए जाने के बाद, मेरे लिए वही एक अहम मोड़ था.”
जब मार्च जंतर-मंतर से कनॉट प्लेस के आस-पास की सड़कों की ओर बढ़ा, तो यह 28 वर्षीय युवक भीड़ के साथ ही रहा. शाम करीब 4 बजे जब झड़पें शुरू हुईं, तब भी वह वहीं था. वह याद करते हुए बताते हैं, “शुरुआत में पुलिस हवा में आंसू गैस के गोले छोड़ रही थी, लेकिन फिर मैंने देखा कि उन्हें भीड़ की तरफ़ निशाना बनाकर छोड़ा जा रहा था. मेरे ठीक आगे खड़े एक व्यक्ति की आंख के ऊपर, बस एक या दो इंच की दूरी पर, आंसू गैस का गोला लगा-मुझे ऐसा ही लगा.”
जब अफसर ने तान दी बंदूक
उन्हें लोगों का भागना याद है. “सब कुछ धुंधला हो गया. मुझे खाकी और नीली वर्दी पहने लोग दिखाई दिए. अगली चीज़ जो मैंने देखी, वह थी एक अफ़सर का मुझ पर बंदूक तानना. मैं मुड़ा और भागने लगा, लेकिन मुझे अपनी पीठ पर गोली लगने का एहसास हुआ,” वे कहते हैं. “शुरू में मुझे झुनझुनी महसूस हुई. फिर ऐसा लगा जैसे मेरी पीठ में आग लग गई हो.” वे थोड़ी दूर चले और फिर बैठ गए. “बाद में मैंने देखा कि कई जगहों पर घाव थे और खून जम गया था,” वे कहते हैं.
खून से लथपथ थी बनियान
पुलिस द्वारा कनॉट प्लेस के आस-पास आवाजाही पर रोक लगाने के कारण, 28 वर्षीय युवक को अपने दोस्त के घर जाने से पहले लगभग एक घंटे तक इंतज़ार करना पड़ा. “जब मैं वहाँ पहुँचा, तो मैंने अपनी बनियान देखी. वह खून से लथपथ थी,” वे कहते हैं. उनके दोस्त ने घावों की तस्वीरें लीं और उन्हें Chat GPT पर अपलोड किया. “तभी हमें पहली बार शक हुआ कि ये छर्रे (Pellet) लगने से हुए घाव हैं,” वे कहते हैं. उस शाम बाद में, उन्हें टिटनेस का इंजेक्शन लगाया गया. वे कहते हैं, “सोते समय बहुत तेज़ दर्द हो रहा था.”
अगली शाम, 21 जुलाई को, 28 वर्षीय युवक सफदरजंग अस्पताल गए; वे शाम करीब 7 बजे वहाँ पहुँचे और अगली सुबह लगभग 4 बजे तक वहीं रहे. उन्होंने बताया, “डॉक्टरों ने पहले घावों को साफ़ किया और मुझे IV ड्रिप लगाई, जिससे दर्द में कुछ राहत मिली. कई डॉक्टरों ने मेरी जाँच की. CT स्कैन, MRI और X-ray के बाद, उन्होंने मुझे बताया कि मुझे 30 से ज़्यादा छर्रे (Pellets) लगे थे.”
यह भी पढें: “…नौकरी करने लायक नहीं छोड़ूंगा”, प्रोटेस्ट के दौरान बोले IPS अधिकारी
छर्रों को शरीर से निकला ही नहीं
पत्रकार के अनुसार, इलाज करने वाले डॉक्टरों ने सर्जरी करके पैलेट गने के छर्रे को निकालने की सलाह दी. वे कहते हैं, “उन्होंने मुझे बताया कि छर्रे बड़ी संख्या में थे. मैंने खुद लगभग 25 से 30 छर्रे गिने थे. डॉक्टरों ने कहा कि उन्हें निकालने के लिए चीरा लगाना पड़ेगा और उन्हें निकालने से फ़ायदे के बजाय नुकसान ज़्यादा हो सकता है. उन्होंने कहा, ‘उन्हें अंदर ही रहने दो’.”
उनका कहना है कि डॉक्टरों ने उनसे यह भी कहा कि वे किस्मत वाले हैं कि छर्रे उनकी हड्डियों के पास नहीं फंसे. “उन्होंने कहा कि अगर वे हड्डियों के पास होते, तो शायद मैं अपना हाथ हिला भी नहीं पाता.”
फिलहाल, 28 साल के इस युवक को सलाह दी गई है कि जब भी दर्द बढ़े, वे दवाएं लें. वे कहते हैं, “डॉक्टरों ने कहा कि घाव तो भर जाएंगे, लेकिन छर्रे अंदर ही रह सकते हैं. मुझे नहीं पता कि उसके बाद क्या होगा.”
उन्हें सफदरजंग अस्पताल में हड्डी रोग विशेषज्ञ (ऑर्थोपेडिक स्पेशलिस्ट) को दिखाना है, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि वे किसी और जगह से भी दूसरी राय लेना चाहते हैं. उन्होंने कहा कि अपनी चोटों के लिए वे “सरकार से मुआवज़ा” चाहते हैं.
Last Updated on July 25, 2026 12:18 pm
