कैबिनेट की हां, विधानसभा में ना… GOA Anti Conversion Bill पर सरकार ने अचानक कदम क्यों खींचे?

गोवा सरकार ने धर्मांतरण विरोधी बिल को विधानसभा के मौजूदा सत्र में पेश नहीं करने का फैसला किया है. दिलचस्प बात यह है कि बिल को कुछ दिन पहले ही कैबिनेट ने मंजूरी दी थी. लेकिन BJP के कुछ विधायकों और सरकार समर्थक निर्दलीय विधायक के विरोध के बाद सरकार को अपना फैसला रोकना पड़ा.

BJP सरकार का धर्मांतरण बिल अचानक ठंडे बस्ते में क्यों?
BJP सरकार का धर्मांतरण बिल अचानक ठंडे बस्ते में क्यों?

GOA Anti Conversion Bill: गोवा में धर्मांतरण विरोधी कानून लाने की तैयारी कर रही बीजेपी सरकार को अपने ही विधायकों के विरोध का सामना करना पड़ा. इसके बाद सरकार ने फिलहाल इस बिल को विधानसभा में पेश नहीं करने का फैसला किया है.

सोमवार को शुरू हुए तीन दिवसीय मानसून सत्र से पहले मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने कई विधायकों के साथ बैठक की. बताया जा रहा है कि बैठक में बीजेपी के कुछ विधायकों के साथ-साथ बीजेपी सरकार का समर्थन करने वाले एक निर्दलीय विधायक ने भी प्रस्तावित बिल पर आपत्ति जताई.

राज्य कैबिनेट ने पिछले सप्ताह ‘गोवा प्रोहिबिशन ऑफ अनलॉफुल कन्वर्जन ऑफ रिलिजन बिल, 2026’ को मंजूरी दी थी. सरकार की योजना थी कि इसे मौजूदा विधानसभा सत्र में पेश किया जाए. लेकिन विधायकों की आपत्तियों के बाद अब सरकार ने कदम पीछे खींच लिया है.

BJP विधायक बोले- जल्दबाजी में मंजूर हुआ बिल

कैलंगुट से बीजेपी विधायक माइकल लोबो ने कहा कि सरकार ने बिल को कैबिनेट से मंजूर कराने में जल्दबाजी की.

लोबो के मुताबिक, मुख्यमंत्री के साथ बैठक में तय हुआ कि बिल को इस सत्र में पेश नहीं किया जाएगा. पहले इस पर विस्तार से चर्चा होगी और सभी पक्षों की राय ली जाएगी.

उन्होंने कहा कि सभी धर्मों की आस्था महत्वपूर्ण है और हर धर्म का सम्मान होना चाहिए. उनके मुताबिक, गोवा के हित में यह समझना जरूरी है कि प्रस्तावित कानून वास्तव में राज्य के लिए कितना जरूरी है.

बीजेपी सरकार का समर्थन करने वाले निर्दलीय विधायक एलेक्सियो रेजिनाल्डो लॉरेंको ने भी बिल का विरोध किया. उन्होंने कहा कि गोवा में बड़े पैमाने पर धर्मांतरण हो रहा है, ऐसा दिखाने के लिए कोई ठोस आंकड़ा मौजूद नहीं है.

उन्होंने The Indian Express से कहा कि गोवा एक शांतिपूर्ण राज्य है और अलग-अलग धर्मों के लोग लंबे समय से मिल-जुलकर रहते आए हैं. ऐसे में इस तरह के कानून की जरूरत क्यों है, यह सवाल उठता है.

क्या था प्रस्तावित कानून में?

कैबिनेट से मंजूर ड्राफ्ट बिल में जबरन धर्मांतरण के खिलाफ कड़े प्रावधान प्रस्तावित किए गए थे.

अगर धर्मांतरण बल, दबाव, अनुचित प्रभाव, लालच, धोखाधड़ी या शादी के जरिए कराया जाता है, तो दोषी को सजा देने का प्रावधान था.

प्रस्तावित कानून में अधिकतम उम्रकैद तक की सजा, कम से कम 50 हजार रुपये का जुर्माना और पीड़ित को अधिकतम 5 लाख रुपये तक मुआवजा देने का प्रावधान था.

इसके अलावा धर्म बदलने वाले व्यक्ति को कम से कम 60 दिन पहले जिला मजिस्ट्रेट या अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट के सामने घोषणा देने की बात कही गई थी. इसमें यह बताना होता कि धर्म परिवर्तन उसकी अपनी इच्छा से हो रहा है और उस पर किसी तरह का दबाव नहीं है.

ड्राफ्ट में यह भी प्रस्ताव था कि अगर कोई शादी सिर्फ गैरकानूनी धर्मांतरण के उद्देश्य से की गई हो, तो ऐसी शादी को अमान्य घोषित किया जा सकता है.

धर्मांतरण में शामिल धार्मिक व्यक्तियों, जैसे पादरी, कर्मकांडी, मौलवी या मुल्ला के लिए भी तीन से दस साल तक की जेल का प्रावधान प्रस्तावित था.

विरोध में चर्च और विपक्ष भी

प्रस्तावित कानून का विरोध सिर्फ कुछ विधायकों ने ही नहीं किया. विपक्षी दलों, नागरिक संगठनों और गोवा की कैथोलिक चर्च से जुड़े संगठनों ने भी इसे वापस लेने की मांग की.

काउंसिल फॉर सोशल जस्टिस एंड पीस और कैथोलिक एसोसिएशन ऑफ गोवा ने कहा कि इस तरह का कानून धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक सौहार्द के लिए खतरा बन सकता है.

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इन संगठनों का तर्क है कि जबरन धर्मांतरण रोकना अलग बात है, लेकिन उसके नाम पर लोगों की निजी आस्था, अंतरधार्मिक रिश्तों, प्रार्थना, धार्मिक शिक्षा या सामाजिक सेवा पर निगरानी बढ़ाना उचित नहीं होगा.

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि गोवा सरकार इस बिल को दोबारा कब और किस रूप में सामने लाती है. फिलहाल सरकार ने इसे विधानसभा के इस सत्र से बाहर कर दिया है.

Last Updated on August 31, 2026 8:12 pm

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