नई दिल्ली: लद्दाख के प्रसिद्ध इंजीनियर, शिक्षा सुधारक और रेमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेता सोनम वांगचुक (Sonam Wangchuk) का आमरण अनशन अब एक गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है. परीक्षा प्रणाली में सुधार, NEET-UG पेपर लीक मामले में जवाबदेही तय करने और छात्रों के भविष्य की सुरक्षा की मांग को लेकर शुरू किया गया उनका अनिश्चितकालीन उपवास 16वें दिन में प्रवेश कर चुका है. डॉक्टरों के अनुसार उनकी सेहत लगातार गिर रही है, लेकिन सरकार की ओर से अब तक कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है.
कौन हैं सोनम वांगचुक?
सोनम वांगचुक देश के जाने-माने शिक्षा सुधारक, नवाचार विशेषज्ञ और पर्यावरण कार्यकर्ता हैं. उनकी जीवन यात्रा से प्रेरित होकर बॉलीवुड फिल्म ‘3 Idiots’ के लोकप्रिय किरदार फुंसुख वांगड़ू को गढ़ा गया था. वर्ष 2018 में उन्हें एशिया का प्रतिष्ठित रेमन मैग्सेसे पुरस्कार भी मिला था.
क्यों कर रहे हैं आमरण अनशन?
सोनम वांगचुक ने 28 जून से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की. उनका समर्थन कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) द्वारा आयोजित उस आंदोलन को है, जिसमें देशभर के छात्र और युवा NEET-UG पेपर लीक तथा परीक्षा प्रणाली में कथित अनियमितताओं के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं.
प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगें हैं-
- केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा.
- NEET-UG पेपर लीक की जवाबदेही तय हो.
- प्रभावित छात्रों और परिवारों को उचित मुआवजा मिले.
- परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और व्यापक सुधार किए जाएं.
- छात्र आत्महत्याओं की घटनाओं को रोकने के लिए ठोस नीति बने.
16वें दिन कैसी है सोनम वांगचुक की तबीयत?
आंदोलन से जुड़े लोगों के मुताबिक अब उनकी शारीरिक स्थिति लगातार चिंताजनक होती जा रही है.
बताया जा रहा है कि-
- रक्तचाप (Blood Pressure) बेहद कम स्तर पर पहुंच गया है.
- ब्लड ग्लूकोज़ लगातार गिर रहा है.
- कमजोरी बढ़ती जा रही है.
- डॉक्टर लगातार स्वास्थ्य की निगरानी कर रहे हैं.
- चिकित्सकीय टीम ने उनकी स्थिति को गंभीर बताया है.
इसके बावजूद सोनम वांगचुक ने आंदोलन समाप्त करने से इनकार किया है.
उन्होंने समर्थकों से अपील की है कि 20 जुलाई को संसद मार्च पूरी तरह शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से किया जाए.
सोनम वांगचुक, जिसने कभी अपने लिए नहीं माँगा, कुछ कि पद चाहिए, सत्ता चाहिए।
अपनी ज़िंदगी देश, समाज और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के लिए लड़ते रहे है और 15-16 दिनों से अनशन पर बैठे हैं!
अपने लिए नहीं, देश के लिए। देश के बच्चों के भविष्य के लिए! उसके बाद भी देश के नेताओं की सोई… pic.twitter.com/tox5EBsTwT— Abhinay Maths (@abhinaymaths) July 13, 2026
सरकार की चुप्पी पर उठ रहे सवाल
भारत के इतिहास में भूख हड़ताल ने कब बदला देश?
| नाम | वर्ष | कितने दिन अनशन | प्रमुख मांग |
|---|---|---|---|
| जतिन दास | 1929 | 63 दिन | राजनीतिक कैदियों के अधिकार |
| पोट्टी श्रीरामुलु | 1952 | 56 दिन | अलग आंध्र राज्य |
| संकरलिंगनार | 1956 | 76 दिन | मद्रास राज्य का नाम तमिलनाडु करना |
| दर्शन सिंह फेरूमन | 1969 | 74 दिन | चंडीगढ़ और पंजाबी भाषी क्षेत्रों का पंजाब में विलय |
| जी.डी. अग्रवाल (स्वामी सानंद) | 2018 | 111 दिन | गंगा संरक्षण |
| देवकी नंद शर्मा | 2024 | लगभग 4 महीने | ग्रामीण विकास कार्यों में कथित भ्रष्टाचार की जांच |
| सोनम वांगचुक | 2026 (जारी) | 16 दिन (अब तक) | परीक्षा सुधार, NEET-UG पेपर लीक पर कार्रवाई और शिक्षा व्यवस्था में सुधार |
भारतीय राजनीति और सामाजिक आंदोलनों में भूख हड़ताल केवल विरोध का माध्यम नहीं रही, बल्कि कई बार इसने सरकारों को बड़े फैसले लेने पर मजबूर किया है. हालांकि कई आंदोलनों का अंत बेहद दुखद भी रहा.
1. पोट्टी श्रीरामुलु (1952)
भारत के इतिहास में सबसे प्रभावशाली भूख हड़तालों में से एक.
- मांग थी कि तेलुगु भाषी लोगों के लिए अलग राज्य बनाया जाए.
- उन्होंने 56 दिनों तक अनशन किया.
- 15 दिसंबर 1952 को उनकी मृत्यु हो गई.
उनकी मौत के बाद पूरे दक्षिण भारत में व्यापक हिंसा और जनआंदोलन हुआ.
आखिरकार केंद्र सरकार को झुकना पड़ा और आंध्र राज्य का गठन किया गया. बाद में इसी घटना ने भारत में भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की प्रक्रिया को जन्म दिया.
2. जतिन दास (1929)
स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी जतिन दास ने लाहौर जेल में राजनीतिक कैदियों के साथ अमानवीय व्यवहार के विरोध में भूख हड़ताल की.
- 63 दिनों तक उपवास किया.
- 13 सितंबर 1929 को उनका निधन हो गया.
उनकी अंतिम यात्रा में लाखों लोग शामिल हुए और ब्रिटिश सरकार की देशभर में तीखी आलोचना हुई.
3. संकरलिंगनार (1956)
तमिल नेता संकरलिंगनार ने मांग की थी कि मद्रास राज्य का नाम बदलकर तमिलनाडु किया जाए.
- 76 दिन तक अनशन किया.
- 13 अक्टूबर 1956 को उनका निधन हुआ.
हालांकि तत्काल उनकी मांग पूरी नहीं हुई, लेकिन बाद में राज्य का नाम वास्तव में तमिलनाडु रखा गया.
4. दर्शन सिंह फेरूमन (1969)
सिख नेता और स्वतंत्रता सेनानी दर्शन सिंह फेरूमन ने चंडीगढ़ तथा पंजाबी भाषी क्षेत्रों को पंजाब में शामिल करने की मांग को लेकर अनशन किया.
- 74 दिनों तक भूख हड़ताल.
- 27 अक्टूबर 1969 को उनका निधन.
उनकी मृत्यु ने पंजाब की राजनीति पर गहरा प्रभाव डाला.
5. जी. डी. अग्रवाल (स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद) – 2018
पूर्व IIT प्रोफेसर और पर्यावरणविद् जी.डी. अग्रवाल ने गंगा नदी की अविरलता और संरक्षण के लिए आमरण अनशन किया.
- 111 दिनों तक उपवास.
- 11 अक्टूबर 2018 को ऋषिकेश में उनका निधन हो गया.
उनकी मृत्यु के बाद गंगा संरक्षण पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस तेज हुई.
6. चार महीने तक भूख हड़ताल पर रहे थे देवकी नंद शर्मा, अस्पताल में हुई थी मौत
भारत में लंबे समय तक भूख हड़ताल करने वालों की सूची में मथुरा के 66 वर्षीय सामाजिक कार्यकर्ता देवकी नंद शर्मा का नाम भी शामिल है.
देवकी नंद शर्मा कथित तौर पर ग्रामीण विकास कार्यों में भ्रष्टाचार के विरोध में लगातार चार महीने तक भूख हड़ताल पर बैठे रहे. उनका आरोप था कि ग्रामीण विकास योजनाओं में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हुआ है और शिकायतों के बावजूद प्रशासन ने प्रभावी कार्रवाई नहीं की.
लगातार चार महीने तक भोजन त्यागने के कारण उनकी सेहत तेजी से बिगड़ती चली गई. अंततः उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां 13 जून 2024 को उनका निधन हो गया.
भूख हड़ताल: लोकतंत्र का सबसे शांत लेकिन सबसे कठिन हथियार
महात्मा गांधी ने भूख हड़ताल को नैतिक दबाव का माध्यम बनाया था. स्वतंत्र भारत में भी यह लोकतांत्रिक विरोध का एक महत्वपूर्ण तरीका बना रहा है.
लेकिन जब अनशन लंबा खिंचता है, तो शरीर पर गंभीर प्रभाव पड़ते हैं-
- रक्तचाप तेजी से गिरना
- ब्लड शुगर कम होना
- मांसपेशियों का क्षय
- किडनी और लिवर पर असर
- हृदय गति में गड़बड़ी
- कई अंगों के काम करना बंद करने का खतरा
यही वजह है कि लंबे समय तक चलने वाली भूख हड़तालें चिकित्सकीय दृष्टि से अत्यंत जोखिमपूर्ण मानी जाती हैं.
क्या इतिहास फिर खुद को दोहराएगा?
भारतीय इतिहास बताता है कि कई बार सरकारें लंबे समय तक अनदेखी करती रहीं, लेकिन कुछ मामलों में जनदबाव इतना बढ़ा कि बड़े राजनीतिक फैसले लेने पड़े. वहीं कई आंदोलनों का अंत अनशनकारी की मृत्यु के साथ हुआ.
सोनम वांगचुक का आंदोलन किस दिशा में जाएगा, यह आने वाले दिनों में सरकार, आंदोलनकारियों और समाज की प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगा. फिलहाल सबसे बड़ी चिंता उनकी लगातार बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति है, जबकि उनके समर्थक उम्मीद लगाए बैठे हैं कि बातचीत के जरिए समाधान निकले और उनकी जान सुरक्षित रहे.
Last Updated on July 13, 2026 7:56 pm
