मारुति डीलर ने ढोंग से बेची 18.29 लाख में E10 कार, कारनामा कैसे आया सामने?

Maruti E10 Car: छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में ज़िला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एक कार डीलर को आदेश दिया है कि वह एक डॉक्टर को बेची गई कार (जो बार-बार खराब हो रही थी) को बदलकर E20 पेट्रोल वाली नई कार दे.

मारुति डीलर ने ढोंग से बेची 18.29 लाख में E10 कार; कारनामा कैसे आया सामने?
मारुति डीलर ने ढोंग से बेची 18.29 लाख में E10 कार; कारनामा कैसे आया सामने?

Maruti E10 Car: सोचिए आपने एक नई गाड़ी ली हो और उसको ख़रीदने के कुछ महीनों के भीतर ही उसमें ख़राबी आ जाए. गाड़ी के नए होने के बाद भी उसका मुख्य हिस्सा, यानी इंजन ही ख़राब हो गया और आपकी नई गाड़ी सर्विस सेंटर के चक्कर लगाती रहे.

वह भी कब जब आपने उस कार को 18 लाख से अधिक में खरीदी हो. शायद आपको इस बात पर यकीन ना हो, लेकिन रायपुर में एक ऐसा ही मामला सामने आया है. मारुति डीलर में किस तरह ढोंग करके E10 कार को 18.29 रुपये में बेचा? और इस मामले पर कोर्ट का क्या फैसला आया? जानिए.

क्या है मामला?

दरअसल रायपुर के निवासी डॉक्टर प्रेमराज देबता के साथ भी कुछ यूँ ही हुआ था. उन्होंने जून 2024 में 18.29 लाख रुपये में मारुति ग्रैंड विटारा हाइब्रिड ज़ेटा प्लस खरीदी. यह कार मई 2029 तक या 1 लाख किलोमीटर चलने तक वारंटी के दायरे में थी.

देबता ने पांच महीने तक कार का इस्तेमाल किया, और इस दौरान वह 21,913 किलोमीटर चली. 11 नवंबर, 2024 को डैशबोर्ड पर इंजन की खराबी का संकेत दिखा और वह तुरंत उसे उस शोरूम ले गए जहाँ से उन्होंने इसे खरीदा था. गाड़ी की जाँच करने के बाद पता चलता है कि इसमें मिलावटी पेट्रोल का इस्तेमाल किया गया था, जिससे इंजन पर असर पड़ा.

अगले कुछ महीनों में कार की कई बार मरम्मत की गई, जिसके बाद देबता को बताया गया कि सेल्स मैनेजर ने उन्हें कार का पुराना मॉडल बेचा था और उन्हें सेल्स मैनेजर से संपर्क करना चाहिए. जब वह जनरल मैनेजर के पास गए, तो उन्हें बताया गया कि न तो कार बदली जाएगी और न ही उन्हें पैसे वापस मिलेंगे. इसके बजाय, उनसे कहा गया कि या तो वे कार 12 लाख रुपये में बेच दें या फिर पुराने पार्ट्स को नए पार्ट्स से बदलने के लिए 5.30 लाख रुपये दें.

डीलर और मैन्युफैक्चरर के खिलाफ की शिकायत

कार को सुरक्षित रखने के लिए डीलर के पास 200 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से छोड़ दिया गया था, जिसके बाद देबता ने डीलर और मैन्युफैक्चरर के खिलाफ़ कमीशन में शिकायत की. कमीशन ने डीलर और मैन्युफैक्चरर, दोनों की बात सुनी. उनका कहना था कि खराब ईंधन की वजह से इंजन में सफ़ेद जेली जैसा पदार्थ बन गया था, जिससे इंजन खराब हो गया. उन्होंने तर्क दिया कि यह एक बाहरी कारण (External Factor) था और इसलिए वारंटी के दायरे में नहीं आता, जो मई 2029 तक मान्य थी.

तीनों पक्षों की बात सुनने के बाद, रायपुर (छत्तीसगढ़) के ज़िला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (अतिरिक्त बेंच) के अध्यक्ष प्रशांत कुंडू और सदस्य डॉ. आनंद वर्गीज़ ने पाया कि कार जनवरी 2023 में बनी थी और शिकायतकर्ता ने इसे 31 मई 2024 को खरीदा था.

डीलर का ढोंग सामने आया

आयोग ने कहा, “तो, जो कार एक साल और पांच महीने पुरानी थी, उसे नई बताकर बेचा गया. इस शिकायत से यह साफ़ है कि शिकायतकर्ता को दूसरी पार्टी ने जो 17 महीने पुरानी गाड़ी बेची थी, वह असल में E20 पेट्रोल वाली गाड़ी नहीं थी. नतीजतन, दूसरी पार्टी के दावे के मुताबिक, E20 फ़्यूल की वजह से शिकायतकर्ता की गाड़ी का इंजन खराब हो गया क्योंकि पेट्रोल में मिलावट थी. इस मामले में शिकायतकर्ता का कोई बस नहीं था.”

शिकायतकर्ता के पक्ष में फ़ैसला सुनाते हुए आयोग ने कहा: “इस मामले की पूरी जांच-पड़ताल के बाद, इस ज़िला आयोग की यह राय है कि दूसरी पार्टी ने 03.06.2024 को शिकायतकर्ता को मारुति ग्रैंड विटारा IE स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड ज़ेटा प्लस गाड़ी बेची, जो 1 साल 4 महीने पुरानी थी और जनवरी 2023 में बनी थी. चूंकि गाड़ी में E20 पेट्रोल-सपोर्टेड इंजन नहीं था, यानी यह 20 प्रतिशत इथेनॉल वाले पेट्रोल के साथ चलने के लायक नहीं थी, इसलिए कई बार फ़्यूल बदलने, पेट्रोल टैंक साफ़ करने, नया पेट्रोल भरने और उसके बाद गाड़ी चलाने के बावजूद गाड़ी बार-बार बंद हो जाती थी.

नतीजतन, शिकायतकर्ता को कई बार गाड़ी सर्विस सेंटर ले जानी पड़ी. दूसरी पार्टी ने इस समस्या के लिए अच्छी क्वालिटी का पेट्रोल न होने को ज़िम्मेदार ठहराया और गाड़ी के इंजन में खराबी आने के बाद, 03.06.2024 को शिकायतकर्ता को बेची गई गाड़ी को वापस लेने और शिकायतकर्ता को उसी मॉडल की E20 पेट्रोल-सपोर्टेड इंजन वाली नई गाड़ी देने में नाकाम रही. यह सर्विस में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार के दायरे में आता है. इस प्रकार, यह पाया गया है कि शिकायतकर्ता दूसरी पार्टी के ख़िलाफ़ मामला साबित करने में आंशिक रूप से सफल रहा है.”

आयोग ने दिलाया न्याय

आयोग ने निर्देश दिया कि शिकायतकर्ता को 45 दिनों के भीतर उसी मॉडल की एक नई गाड़ी दी जाए, जिसमें E20-कम्पैटिबल इंजन लगा हो. अगर तय समय के भीतर ऐसा नहीं किया जाता है, तो शिकायतकर्ता द्वारा भुगतान की गई पूरी रकम वापस करनी होगी. आयोग ने शिकायतकर्ता को हुई मानसिक परेशानी के लिए 1 लाख रुपये का मुआवज़ा देने का भी आदेश दिया, जिसका भुगतान 45 दिनों के भीतर किया जाना है. अगर उस अवधि के भीतर रकम का भुगतान नहीं किया जाता है, तो उस पर सालाना 7 प्रतिशत की दर से ब्याज लगेगा.

गाड़ी की डिलीवरी से पहले किन चीज़ो का ध्यान रखना चाहिए?

आमतौर पर, नई कार की डिलीवरी के समय उसके इंस्पेक्शन में लगभग 30-45 मिनट लगते हैं. हालाँकि, इससे भविष्य में सर्विस के लिए बार-बार जाने की ज़रूरत नहीं पड़ती.

स्टेप 1: गाड़ी का आइडेंटिटी नंबर (VIN) वेरिफ़ाई करे

VIN से शुरुआत करें और पक्का करें कि कार का VIN आपकी इनवॉइस में दिए गए मॉडल, वैरिएंट और VIN से मेल खाता है. कागज़ात में अंतर होने पर रजिस्ट्रेशन और वारंटी रजिस्ट्रेशन के समय विवाद हो सकता है.

स्टेप 2: बाहरी हिस्से की जांच करें

आमतौर पर, देखकर जांच करना आसान होता है, लेकिन कभी-कभी ट्रांसपोर्टेशन या यार्ड की समस्याओं के कारण नुकसान साफ दिखाई दे सकता है. अलग-अलग एंगल से और लगभग 3 से 4 मीटर की दूरी से देखकर जांच करें.

स्टेप 3: इंटीरियर और केबिन के फ़ीचर्स की जाँच करें इंटीरियर की जाँच ज़्यादातर केबिन के आराम को देखने के लिए की जाती है; इसके लिए इंजन चालू किए बिना इग्निशन ऑन किया जाता है.

स्टेप 4: फ़्लूइड लेवल और इंजन बे की जाँच करें

नई कारों में मैकेनिकल स्ट्रक्चर की जाँच ज़रूरी होती है ताकि यह पक्का किया जा सके कि सभी सिस्टम सही तरह से भरे और सील किए गए हैं. कार मालिक किसी टेक्नीशियन से फ़्यूज़ बॉक्स, कूलेंट रिज़र्वॉयर और डिपस्टिक टेस्ट की जगह दिखाने के लिए कह सकते हैं.

स्टेप 5: टायर, ब्रेक और सस्पेंशन की जांच करें

ड्राइविंग के अनुभव पर टायर और ब्रेकिंग सिस्टम का बहुत असर पड़ता है. हालांकि, टेस्ट ड्राइव से कार के मालिक को सिर्फ़ कार का अंदाज़ा मिलता है; कुछ और भी चीज़ें हैं जिनकी बारीकी से जांच करने की ज़रूरत होती है.

स्टेप 6: सॉफ़्टवेयर और सिस्टम की जाँच

आधुनिक कारों में सभी सिस्टम को कंट्रोल करने वाला सॉफ़्टवेयर अप-टू-डेट होना चाहिए. पुराना सॉफ़्टवेयर बड़ी गड़बड़ी पैदा कर सकता है, जैसे कि फ़्यूल की बचत (माइलेज) कम होना या सुरक्षा सिस्टम के काम करने में पूरी तरह से रुकावट आना.

स्टेप 7: मंज़ूरी देने से पहले छोटी टेस्ट ड्राइव

लगभग 2 से 3 किलोमीटर की छोटी और निगरानी में की गई ड्राइव से अलाइनमेंट और कैलिब्रेशन की समस्याओं का पता चल सकता है.

इससे यह पक्का हो जाता है कि नई कार के सभी हिस्से-चाहे वे मैकेनिकल हों, इलेक्ट्रिकल हों या डिजिटल-ठीक से काम कर रहे हैं. डिलीवरी के समय कार की असलियत और बनावट की मज़बूती की जाँच करने से वारंटी से जुड़े उन झगड़ों से बचा जा सकता है जो बाद में पता चलने वाली कमियों की वजह से हो सकते हैं.

Last Updated on July 17, 2026 10:25 am

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