Wandhama Massacre: दो हफ्ते पहले गर्मियों के एक दिन अब्दुल गनी की मुलाकात एक ऐसे शख्स से हुई, जिसका चेहरा उन्हें जाना-पहचाना लगा. यह मुलाकात श्रीनगर-लद्दाख राष्ट्रीय राजमार्ग से कुछ दूर, जम्मू-कश्मीर के गांदरबल जिले के वंधामा गांव की ओर जाने वाली करीब 400 मीटर लंबी सड़क पर हुई.
कश्मीर में जब कश्मीरी पंडित और मुस्लिम लंबे समय बाद मिलते हैं, तो अक्सर पहला सवाल होता है—आप कहां के रहने वाले हैं?
गनी ने भी यही पूछा. जवाब सुनते ही वह हैरान रह गए. सामने उनका बचपन का पुराना पड़ोसी ब्रिज ‘बट्टा’ खड़ा था. ‘बट्टा’ कश्मीरी भाषा में पंडितों के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द है.
दोनों ने एक-दूसरे को गले लगा लिया.
गनी कहते हैं, “समय ने हमें बदल दिया था. दोनों बूढ़े हो गए थे, बाल सफेद हो गए थे. लेकिन उसके चेहरे में मुझे अपना पुराना पड़ोसी दिखाई दे रहा था.”
यह मुलाकात गनी को उस दौर में ले गई, जब वंधामा में कश्मीरी पंडित और मुस्लिम साथ रहते थे. लेकिन 25 जनवरी 1998 की रात ने इस गांव की कहानी हमेशा के लिए बदल दी.
इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि 25 अगस्त को जम्मू-कश्मीर पुलिस की स्टेट इन्वेस्टिगेशन एजेंसी यानी SIA ने 1998 के वंधामा नरसंहार की जांच दोबारा शुरू की है.
28 साल पहले, 25 और 26 जनवरी की रात सेना की वर्दी पहने आतंकियों का एक समूह गांव में पहुंचा था. कश्मीरी पंडितों को एक जगह इकट्ठा किया गया और फिर उन पर अंधाधुंध गोलियां चलाई गईं.
उस रात 23 कश्मीरी पंडितों की हत्या कर दी गई थी. इनमें चार बच्चे और नौ महिलाएं शामिल थीं.
वंधामा आज भी मध्य कश्मीर के गांदरबल में चिनार और अखरोट के पेड़ों के बीच बसा एक गांव है. आसपास काफी कुछ बदल चुका है. श्रीनगर को लद्दाख से जोड़ने वाला नया हाईवे गांव से कुछ सौ मीटर की दूरी पर गुजरता है. पुराने ईंट और पत्थर के मकानों की जगह अब बड़े कंक्रीट के घर दिखाई देते हैं.
लेकिन गांव के बीचों-बीच चार पुराने पंडितों के मकान आज भी खड़े हैं.
टूटती दीवारें. उखड़ी छतें. खिड़कियों और दरवाजों से बाहर निकलती घनी झाड़ियां.
ऐसा लगता है जैसे इन घरों में समय ठहर गया हो.
गांव के 65 वर्षीय मोहम्मद हनीफ बाबा बताते हैं कि यहां पहले सात पंडित परिवारों के घर थे. तीन मकान स्थानीय लोगों ने खरीद लिए और उनकी जगह नए घर बन गए. लेकिन चार पुराने मकान अब भी वैसे ही पड़े हैं.
बाबा कहते हैं, “गांव के किसी व्यक्ति ने इन चार घरों को नहीं छुआ. लेकिन आखिर कब तक ये मौसम और समय को झेल पाएंगे?”
1990 के दशक में जब कश्मीर में आतंकवाद बढ़ा, बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडित घाटी छोड़कर जम्मू चले गए. लेकिन वंधामा के चार पंडित परिवारों ने गांव में ही रहने का फैसला किया.
फिर आई 25 जनवरी 1998 की रात.
उस समय रमजान का महीना था. गांव के ज्यादातर पुरुष मस्जिद में नमाज के लिए गए हुए थे.
बाबा बताते हैं कि उन्होंने गोलियों की आवाज सुनी, लेकिन सोचा कि कहीं दूर गोली चल रही होगी. अगला दिन गणतंत्र दिवस था, इसलिए कुछ लोगों ने इसे पटाखों या जश्न की आवाज समझा.
फिर महिलाओं के चीखने की आवाज सुनाई दी.
जब लोग मस्जिद से बाहर निकले तो महिलाओं ने उन्हें सुरक्षित जगह जाने के लिए कहा. गांव में गोलीबारी हो चुकी थी.
कुछ युवकों ने हिम्मत जुटाई और पंडितों के घरों की तरफ दौड़े.
वहां उन्हें शव बिखरे मिले.
उस रात गांव में रहने वाले चारों पंडित परिवार खत्म हो गए.
मारे गए लोगों में पांच ऐसे लोग भी थे, जो इन पंडित परिवारों के घर मेहमान बनकर आए थे.
इस नरसंहार में सिर्फ एक किशोर जिंदा बच पाया.
बताया जाता है कि उसने काला फेरन पहन रखा था और खुद को कोयले के बीच छिपा लिया था. गोलीबारी रुकने के बाद वह गांव के दूसरे हिस्से में एक घर की तरफ भाग गया. करीब एक घंटे बाद वह वापस आया, जरूरी दस्तावेज उठाए और गांव छोड़ दिया.
अगली सुबह गांव के लोग कुरहामा स्थित सेना के कैंप पहुंचे और वहां हुई हत्याओं की जानकारी दी. इसके बाद उन्होंने गांदरबल थाने जाकर भी पुलिस को पूरी घटना बताई.
इस नरसंहार के बाद कुछ मुस्लिम परिवारों ने भी गांव छोड़ दिया. कई लोग श्रीनगर चले गए तो कुछ दूर उत्तर कश्मीर के सोपोर तक चले गए.
28 साल बाद भी उस रात की याद वंधामा में जिंदा है.
लोग आज भी उस घटना के बारे में खुलकर बात करने से डरते हैं.
एक ग्रामीण ने तो सवाल पूछे जाने पर कहा—“पुराने जख्म क्यों खोल रहे हैं?”
लेकिन इस कहानी का एक दूसरा पहलू भी है.
इतनी बड़ी त्रासदी के बावजूद वंधामा के मुस्लिम और कश्मीरी पंडितों के बीच पुराने रिश्ते पूरी तरह खत्म नहीं हुए.
जो पंडित परिवार वर्षों पहले गांव छोड़कर चले गए, उनमें से कई आज भी वंधामा लौटते हैं.
वे अपने पुराने मुस्लिम दोस्तों से मिलते हैं. अपने खेत और जमीन देखते हैं. अखरोट की फसल बेचते हैं.
लेकिन ज्यादातर लोग रात गांव में नहीं रुकते.
यानी 1998 की वह रात गांव से बहुत कुछ छीन ले गई, लेकिन बचपन की दोस्ती, जमीन और पुरानी यादों के कुछ धागे अब भी बाकी हैं.
वंधामा की कहानी सिर्फ एक नरसंहार की कहानी नहीं है.
यह उस कश्मीर की भी कहानी है, जहां एक ही गांव में पंडित और मुस्लिम पड़ोसी हुआ करते थे. फिर आतंकवाद ने रिश्तों और घरों के बीच ऐसी दरार पैदा की, जिसका दर्द 28 साल बाद भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है.
Last Updated on August 30, 2026 10:15 am
