बिहार चुनाव: प्रशांत किशोर हारे, लेकिन राजनीति में उनका खेल खत्म नहीं

कांग्रेस फिर से अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश में है और वह अपने कठिन सफर की शुरुआत करना चाहती है। राजद की अंदरूनी राजनीति में राजेश राम और शकील अहमद खान को कैसे टारगेट कर हराया गया, यह भी अब किसी से छिपा नहीं है।

तेजस्वी पर भरोसा खत्म… PK क्या Bihar का नया चेहरा?
तेजस्वी पर भरोसा खत्म… PK क्या Bihar का नया चेहरा?

बिहार की राजनीति एक बार फिर करवट ले रही है। चुनावी नतीजों ने यह साफ कर दिया कि प्रशांत किशोर (PK) का इस बार सूपड़ा साफ हुआ है, लेकिन उनकी प्रासंगिकता खत्म नहीं हुई। यह बड़ा सवाल अब उभर रहा है कि क्या वे इस करारी हार के बाद बिहार की जमीन पर टिके रहेंगे या फिर पीछे हट जाएंगे? राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अगर प्रशांत किशोर मैदान नहीं छोड़ते, तो सत्ता के सामने जनता के भरोसे पर खड़ा एक मजबूत विपक्ष बनने का अवसर उनके पास है—और विपक्ष केवल विधानसभा के भीतर नहीं, बल्कि मैदान में भी बनता है।

तेजस्वी यादव पर भरोसा कम, राजद का पतन पुराना

बिहार ने तेजस्वी यादव पर भरोसा जताने से एक बार फिर इंकार कर दिया। राजद 2010 में ही अपनी पकड़ खो चुका था। राजनीतिक गलियारों में यह राय मजबूत है कि 2015 में राजद की वापसी का श्रेय नीतीश कुमार की रणनीति को जाता है। अब एक बार फिर जनता ने स्पष्ट संदेश दिया है कि यह रास्ता आगे संभव नहीं दिखता।

PK के सामने रास्ता कठिन, लेकिन जनता का गुस्सा नहीं

प्रशांत किशोर की हार औचक रही, लेकिन उनका जनसंपर्क अभियान और बिहार के मुद्दों को उठाने का तरीका—उस पर न जनता ने हँसी उड़ाई, न गालियां दीं, न विरोध किया।
राजनीति के जानकार मानते हैं कि PK को अपना स्वभाव थोड़ा बदलना होगा

  • गुस्सा कम करना होगा

  • भविष्यवाणियों में संयम लाना होगा

  • और राजनीतिक समझौतावाद की कला सीखनी होगी

1995 की नीतीश कुमार की हार इसका उदाहरण है—अकेले लड़े, हारे, लेकिन आगे चलकर सियासी गठबंधन बनाकर लालू-राबड़ी राज को चुनौती दी और सत्ता बदली।

कांग्रेस अलग राह पर, राजद में अंदरूनी कलह उजागर

कांग्रेस फिर से अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश में है और वह अपने कठिन सफर की शुरुआत करना चाहती है। राजद की अंदरूनी राजनीति में राजेश राम और शकील अहमद खान को कैसे टारगेट कर हराया गया, यह भी अब किसी से छिपा नहीं है।
तेजस्वी यादव की नेतृत्व क्षमता पर सवाल अब “आरोप” नहीं, बल्कि प्रमाणित तथ्य बन चुके हैं।

दलित–अतिपिछड़ों की राजनीति की ओर रास्ता

आने वाले वर्षों में बिहार की राजनीति का केंद्र दलित और अतिपिछड़ा वर्ग होने जा रहा है। प्रशांत किशोर इसे समझते भी हैं।
अच्छी बात यह है कि वे खुद को मुख्यमंत्री बनाने की जिद पर राजनीति नहीं करते, बल्कि बिहार सुधारने की बात को प्राथमिकता देते हैं।

निष्कर्ष

प्रशांत किशोर हारे जरूर हैं, लेकिन बिहार की राजनीति में उनके लिए दरवाजे बंद नहीं हुए।
शर्त सिर्फ इतनी है कि वे मैदान में बने रहें, स्वभाव में लचीलापन लाएं और जनता के मुद्दों पर अपनी पकड़ और मजबूत करें।

राजनीति की यह कहानी यहीं खत्म नहीं होती—यह तो शुरुआत है।

Last Updated on November 16, 2025 8:29 am

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