Delhi Cancer Hospital: बिहार के कटिहार ज़िले का रहने वाले दिहाड़ी मज़दूर मोहम्मद मनोवर, अपनी 53 साल की मां मदीना के साथ हर तीन महीने में लगभग 1,300 किलोमीटर का सफ़र करके दिल्ली स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट (DSCI) आते हैं. यह राष्ट्रीय राजधानी का एकमात्र सरकारी कैंसर अस्पताल है. बीमार मां के साथ आंगन में बैठे 37 साल के मनोवर सब्र के साथ उनकी बारी का इंतज़ार करते हैं, जिनका ब्रेस्ट कैंसर का इलाज चल रहा है. मनोवर के लिए यह ऐसा करना जरूरी है.
उन्होंने ‘द प्रिंट’ को बताया,”बिहार में इसका इलाज नहीं है.” हज़ारों दूसरे मरीज़ों की तरह, यह परिवार भी इसी अस्पताल पर निर्भर है क्योंकि प्राइवेट अस्पताल में कैंसर का इलाज बहुत महंगा है. मदीना के DSCI में पहली बार आने के नौ महीने बाद भी उसे लंबा इंतजार करना पड़ रहा है.
अल्ट्रासाउंड 4 जुलाई में जबकि CT स्कैन 12 सितंबर को
मदीना के बीमारी का पता लगाने के लिए डॉक्टर ने उसे 4 जुलाई को अल्ट्रासाउंड और कॉन्ट्रास्ट-एन्हांस्ड CT (CECT) स्कैन कराने की सलाह दी थी. अल्ट्रासाउंड का अपॉइंटमेंट 27 अगस्त के लिए तय किया गया. जबकि CT स्कैन 12 सितंबर के लिए तय हुआ. यानी टेस्ट की सलाह मिलने के कई हफ़्ते बाद.
इतना लंबा इंतज़ार न कर पाने के कारण, परिवार को एक प्राइवेट डायग्नोस्टिक सेंटर में अल्ट्रासाउंड के लिए 1,100 रुपये देने पड़े, लेकिन वे CT स्कैन का खर्चा नहीं उठा सकते थे. प्राइवेट सेंटर में लगभग 8,000 से 12,000 रुपये का खर्च आता है. ऐसा सिर्फ मदीना के साथ ही नहीं हो रहा, बल्कि ना जाने कितने लोगों साथ ऐसा हो रहा होगा.

क्यों करना पड़ रहा मरीज को लंबा इंतजार?
संस्थान की एक नर्सिंग अटेंडेंट ने मीडिया को बताया कि डीएससीआई (DSCI) में डायग्नोस्टिक टेस्ट के लिए लंबे इंतजार का कारण खराब उपकरण, कर्मचारियों की कमी और मरीजों की अत्यधिक भीड़ है. सीटी स्कैन की तारीखें फिलहाल सितंबर के लिए दी जा रही हैं, अल्ट्रासाउंड की तारीख लगभग एक महीने बाद की है, लेकिन कुछ रेडियोथेरेपी सेशन तो अगले साल जनवरी और फरवरी के लिए निर्धारित किए जा रहे हैं. अटेंडेंट ने कहा, “अस्पताल में सिर्फ़ तीन रेडियोथेरेपी मशीनें हैं, जिनमें से सिर्फ़ एक ही काम कर रही है.” देरी की वजह से कई मरीज़ों को प्राइवेट अस्पतालों में महंगे टेस्ट करवाने पड़ रहे हैं.
15 करोड़ की PET-CT मशीन खराब क्यों?
दिल्ली हाई कोर्ट ने DSCI में सालों से बेकार पड़ी PET साइक्लोट्रॉन मशीन का गंभीरता से संज्ञान लिया है. PET स्कैन के लिए रेडियोएक्टिव ट्रेसर बनाने में इस्तेमाल होने वाली इस मशीन की कीमत 15.42 करोड़ रुपये है. पिछले हफ़्ते जारी एक आदेश में कोर्ट ने इसे “जनता के संसाधनों की भारी बर्बादी” बताया और दिल्ली सरकार के सभी अस्पतालों को निर्देश दिया कि वे बिना इस्तेमाल के पड़ी महंगी मेडिकल मशीनों का ऑडिट करें. ये बातें दिल्ली सरकार के अस्पतालों में हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े एक लंबे समय से चल रहे मामले की सुनवाई के दौरान सामने आईं.
3 जुलाई को कोर्ट के सामने पेश हुईं DSCI में क्लिनिकल ऑन्कोलॉजी विभाग की प्रमुख डॉ. प्रज्ञा शुक्ला ने बेंच को बताया कि PET साइक्लोट्रॉन मशीन इसलिए चालू नहीं हो पाई क्योंकि 2017 में इसे खरीदने के बाद दिल्ली सरकार के पास इसे चलाने के लिए कोई स्पेशलिस्ट ही नहीं था.
कोर्ट के आदेश के मुताबिक, सफदरजंग अस्पताल के एक स्पेशलिस्ट डॉक्टर ने इस साल फरवरी में ही DSCI जॉइन किया. हालांकि, मशीन अभी भी चालू नहीं हो पा रही है क्योंकि रेगुलेटरी मंज़ूरी लेना अभी बाकी है.
गरीब मरीज़ों के पास नहीं है दूसरा विकल्प
जनवरी में, कोर्ट की मदद कर रहे वकील अशोक अग्रवाल ने दिल्ली के मुख्य सचिव को एक ज्ञापन सौंपा, जिसमें DSCI में सिस्टम की कमियों का ज़िक्र किया गया. उन्होंने कहा कि संस्थान में 814 मंज़ूर पदों के मुकाबले 491 पद खाली थे और वहां डॉक्टरों, स्पेशलिस्ट, टेक्नीशियन, नर्सिंग और एडमिनिस्ट्रेटिव स्टाफ़ की कमी थी.
ज्ञापन में PET-CT स्कैन, बायोप्सी, खास तरह की ब्लड जांच और 2D इकोकार्डियोग्राफी जैसी ज़रूरी सेवाओं के न होने या उनके ठीक से काम न करने, जीवन बचाने वाली दवाओं की कमी, और रेडियोथेरेपी व कीमोथेरेपी के लिए लंबे इंतज़ार के लंबे समय का मुद्दा भी उठाया गया. इसमें एडमिनिस्ट्रेटिव कमियों, जैसे स्टोर इंचार्ज और परचेज़ ऑफ़िसर के पद खाली होने और दूसरे विभागों के कर्मचारियों द्वारा ये ज़िम्मेदारियां संभालने की बात भी कही गई.
अग्रवाल ने लिखा, “इन कमियों का कुल असर यह हुआ है कि कैंसर के गंभीर इलाज की सेवाएं बेअसर हो गई हैं और इसका सबसे ज़्यादा असर आर्थिक रूप से कमज़ोर मरीज़ों पर पड़ा है, जो पूरी तरह से सरकारी हेल्थकेयर सुविधाओं पर निर्भर हैं.” उन्होंने आगे कहा कि देश की आबादी के एक बड़े हिस्से के लिए सरकारी अस्पताल ही सस्ते इलाज का एकमात्र जरिया है.
‘सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस’ पर क्यों उठे सवाल
दिल्ली स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट को दिल्ली सरकार के मुख्य कैंसर-केयर सेंटर के तौर पर विकसित करने के मकसद से शुरू किया गया था. 5 अप्रैल, 2006 को दिल्ली कैबिनेट के फ़ैसले के बाद एक स्वायत्त संस्थान के तौर पर बने DSCI को एक ‘सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस’ के रूप में देखा गया था. इसका मकसद कैंसर का पूरा इलाज, एडवांस्ड डायग्नोस्टिक्स, रिसर्च, ट्रेनिंग और कम्युनिटी आउटरीच जैसी सुविधाएं देना था, खासकर उन मरीज़ों के लिए जो प्राइवेट इलाज का खर्च नहीं उठा सकते थे. शुरुआती सालों में DSCI काफ़ी तेज़ी से बढ़ा.
सीनियर अधिकारी ने क्या कहा?
संस्थान में पहले काम कर चुके एक सीनियर अधिकारी ने मीडिया को बताया कि DSCI ने कई एडवांस्ड टेक्नोलॉजी शुरू कीं, जिनमें रोबोटिक सर्जरी, मॉडर्न रेडियोथेरेपी सिस्टम, न्यूक्लियर मेडिसिन सेवाएं और बेहतरीन इमेजिंग सुविधाएं शामिल थीं – इनमें से कई सुविधाएं देश में पहली बार शुरू की गई थीं. अधिकारी के मुताबिक, साल 2006 में संस्थान में OPD में रोजाना तकरीबन 100 मरीज आते थे. जबकि, साल 2018 तक रोजना इसकी संख्या 1500 से अधिक हो गई. मरीजों की बढ़ती संख्या को देखते हुए 24 घंटे इलाज होते थे.
इस दौरान, DSCI ने फैकल्टी ट्रेनिंग के लिए यूनिवर्सिटी ऑफ़ टेक्सास MD एंडरसन, कैंसर सेंटर के साथ भी साझेदारी की और 2016 में सर्वाइकल कैंसर की रोकथाम के लिए HPV वैक्सीनेशन शुरू करने वाले पहले सरकारी संस्थानों में से एक बना.
अधिकारी ने कहा, “हमने कभी भी कैंसर के मरीज़ों को वापस नहीं भेजा. हमारा विज़न दिल्ली स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट का एक नेटवर्क बनाना था ताकि मरीज़ों को इलाज और जीवन भर चलने वाले फ़ॉलो-अप के लिए बार-बार लंबी दूरी तय न करनी पड़े.” अधिकारी के मुताबिक, बाद के सालों में संस्थान का इंफ्रास्ट्रक्चर और सेवाएं लगातार खराब होती गईं और कई एडवांस्ड सुविधाएं बंद हो गईं.
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Last Updated on July 9, 2026 9:31 pm
