Bhang vs Ganja: पिछले हफ़्ते, झारखंड हाईकोर्ट ने एक व्यक्ति को बरी कर दिया.शख्स को निचली अदालत ने नारकोटिक्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट के तहत 7 साल की जेल और जुर्माने की सज़ा सुनाई थी. शख्स के ब्रीफकेस में 11 किलोग्राम भांग था. पुलिस को देखकर शख्स भागने की कोशिश की, लेकिन पुसिल ने खदेड़कर उसे दबोच लिया.
आरोपी ने इसे लेकर हाइकोर्ट में अपील की क्योंकि उसे पता था कि उसके ब्रीफकेस में गांजा नहीं, बल्कि भांग था. मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने बताया कि NDPS की धारा धारा 2 (iii) में गांजे के पत्ते और बीज को प्रतिबंधित नहीं माना गया है. इसके साथ ही, इस एक्ट में भांग को भी प्रतिबंध क्षेत्र से बाहर रखा गया है.
एक बेतुकी छूट
जैसा कि आप जानते होंगे, होली और सावन के समय में भांग का क्रेज रहता है. राजस्थान उन राज्यों में से एक है जहां भांग की के दुकानदारों को सरकारी लाइसेंस मिला हुआ है. इसके अलावा बिहार के मिथिला क्षेत्र में भी कई स्थानों पर चोरी-छुपे भांग बेचा जाता है. ऐसे में आपके मन में भी सवाल आएगा कि आखिर भांग को इतनी छूट क्यों मिलती है?
दरअसल, भांग में नशा का लेबल कांजा के मुकाबले कम होता है. फिर, यह इसका नशा सोचने-समझने की क्षमता को कम कर सकता है. साथ ही, निर्णय लेने की क्षमता को भी प्रभावित कर सकता है.
समाज में बड़े-बुजुर्ग अक्सर भांग को लेकर यह तर्क देते हैं कि सामाजिक और सांस्कृतिक कारणों से इसके सेवन की छूट दी जा सकती है. लेकिन, यह पूरी तरह से तर्कहीन है. तर्क के जरिए इसे बढ़ावा देने से युवा दिशाहीन हो सकता है. जब युवा दिशाही हो जाए, तो देश की तरक्की का अंदाजा लगाया जा सकता है.
भांग को धार्मिक आधार पर छूट देने का क्या आधार?
वहीं दूसरी ओर, अगर गांजा और चरस जैसे नशीले पदार्थों के लिए कड़ी सज़ा सही है, तो भांग को धार्मिक आधार पर छूट देने का क्या आधार है? भारत में गांजे या तरस से जुड़े अपराधों में ज़मानत मिलना बहुत मुश्किल होता है. इसके लिए NDPS एक्ट के तहत सज़ा की अवधि अलग-अलग होती है.
कम मात्रा के लिए एक साल की कड़ी सज़ा, मध्यम मात्रा के लिए 10 साल तक की सज़ा और कमर्शियल मात्रा के लिए 20 साल तक की सज़ा हो सकती है. तार्किक नज़रिए से देखें तो, इस मामले से निपटने के सिर्फ़ दो ही सही तरीके हैं- या तो एकरूपता बनाए रखने के लिए भांग से जुड़ी कानूनी खामियों को दूर किया जाए, या फिर कानून बनाने के स्तर पर ज़्यादा उदारता दिखाते हुए कैनबिस (भांग) से जुड़ी नीतियों को आसान बनाया जाए.
क्या यह कम नुकसानदायक है?
गांजा पूरी तरह से नुकसान-रहित नहीं है. हम जानते हैं कि इसके बार-बार इस्तेमाल से सोचने-समझने की क्षमता पर असर पड़ सकता है और साइकोसिस जैसी मानसिक बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है. साथ ही, वैज्ञानिक तौर पर यह माना जाता है कि गांजा, तंबाकू, शराब और हार्ड ड्रग्स की तुलना में शारीरिक रूप से कम ज़हरीला और खतरनाक है. बाकी ड्रग्स की लत भी ज़्यादा तेज़ी से लगती है, हालांकि गांजा भी इस मामले में पूरी तरह बेदाग नहीं है. हाल की स्टडीज़ से पता चला है कि इसके लगातार इस्तेमाल से इसकी लत लग सकती है.
इसे देखते हुए, यह सवाल उठता है कि क्या गांजे को अपराध की श्रेणी से बाहर करने (डिक्रिमिनलाइज़ करने) या कम से कम दूसरे ड्रग्स से अलग तरह से देखने का कोई आधार है. इसके पीछे सिर्फ़ यह तर्क नहीं है कि यह कम नुकसानदायक है. कुछ महीने पहले हैदराबाद में अपनी छत पर गांजा उगाने के आरोप में गिरफ्तार किए गए पूर्व सॉफ्टवेयर इंजीनियर उन कई यूज़र्स में से एक हैं जिन्हें NDPS एक्ट के तहत अक्सर निशाना बनाया गया है.
सांसद धर्मवीर गांधी ने गांजे को लेकर क्या कहा था?
लोकसभा सांसद डॉ. धर्मवीर गांधी, जिन्होंने 2016 में गांजे को अपराध की श्रेणी से बाहर करने और उसे रेगुलेट करने के लिए एक प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया था. उस वक्त उनका कहना था कि इस एक्ट के तहत जेल भेजे गए लोगों में से लगभग 90 प्रतिशत यूज़र्स थे और तस्कर और डिस्ट्रीब्यूटर तो बहुत कम संख्या में थे.
बीजू जनता दल के पूर्व सांसद तथागत सत्पथी, जो गांजे को अपराध की श्रेणी से बाहर करने के पक्ष में थे, कहते हैं कि प्रतिबंध के कारण उनके राज्य के लोग शराब की ओर मुड़ गए हैं.
क्या मारिजुआना पर रोक लगाने से लोग ज़्यादा महंगे और खतरनाक नशे की चीज़ों का इस्तेमाल करने लगते हैं? इस बात को पक्के सबूतों के साथ साबित करने की ज़रूरत है. लेकिन इस बात को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है कि हम ऐसी दुनिया में रह रहे हैं जहां कई देशों (दो दर्जन से ज़्यादा) ने निजी इस्तेमाल के लिए कैनबिस को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया है.
इसे रखने (कितने ग्राम) से जुड़े कानून अलग-अलग हो सकते हैं, ये कानून राज्यों के हिसाब से भी अलग हो सकते हैं (जैसे अमेरिका में), और इसकी खेती के नियम भी अलग हो सकते हैं (जैसे जर्मनी में कोई व्यक्ति निजी इस्तेमाल के लिए कैनबिस के तीन पौधे उगा सकता है). इस साल की शुरुआत में, दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा था कि वह इस बात की जांच करे कि क्या कैनबिस के मामले में NDPS एक्ट के नियमों को थोड़ा नरम करने की ज़रूरत है. यह साफ़ नहीं है कि इस बारे में केंद्र सरकार क्या सोच रही है.
Last Updated on July 9, 2026 10:48 pm
