Fuel Price Hike: बेंगलुरु में पेट्रोल की कीमत ₹110 प्रति लीटर के पार पहुंचने के बाद सबसे बड़ा असर अब गिग वर्कर्स और डिलीवरी एजेंट्स पर दिखाई देने लगा है। कभी “फ्लेक्सिबल जॉब” और “फास्ट इनकम” का वादा करने वाली ऐप-आधारित डिलीवरी अर्थव्यवस्था अब हजारों युवाओं के लिए आर्थिक संकट बनती जा रही है। लगातार बढ़ती ईंधन कीमतों, घटते ऑर्डर्स और कम इंसेंटिव के बीच कई डिलीवरी पार्टनर्स का कहना है कि 10 से 12 घंटे काम करने के बाद भी उनके हाथ में मुश्किल से ₹500-700 ही बच रहे हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, बेंगलुरु में पेट्रोल की कीमत कुछ ही दिनों में कई बार बढ़ी और ₹110.93 प्रति लीटर तक पहुंच गई। इसका सीधा असर उन डिलीवरी एजेंट्स पर पड़ा जो रोज़ बाइक से 100-150 किलोमीटर तक शहर में घूमते हैं। पहले जहां एक दिन में 20-25 डिलीवरी मिल जाती थीं, अब कई एजेंट्स को एक ऑर्डर के बाद दूसरे ऑर्डर के लिए घंटों इंतजार करना पड़ रहा है।
डिलीवरी वर्कर्स का कहना है कि कंपनियां ग्राहकों से डिलीवरी चार्ज बढ़ा सकती हैं, लेकिन उसका फायदा तुरंत एजेंट्स तक नहीं पहुंचता। दूसरी तरफ पेट्रोल, बाइक सर्विस, EMI और मोबाइल डेटा का खर्च लगातार बढ़ रहा है। कई वर्कर्स का आरोप है कि ऐप कंपनियों के पास कोई पारदर्शी सिस्टम नहीं है जो फ्यूल प्राइस बढ़ने पर इंसेंटिव या बेस पे बढ़ाए।
घटते ऑर्डर्स ने बढ़ाई मुश्किल
सिर्फ पेट्रोल ही नहीं, रेस्टोरेंट सेक्टर में बढ़ते LPG खर्च का असर भी डिलीवरी इंडस्ट्री पर पड़ रहा है। छोटे होटल और रेस्टोरेंट अब ऑनलाइन ऑर्डर्स को प्राथमिकता कम दे रहे हैं क्योंकि उनकी लागत बढ़ गई है। इसका असर सीधे डिलीवरी एजेंट्स की कमाई पर पड़ा है। कई वर्कर्स का दावा है कि पिछले दो महीनों में उनकी मासिक आय लगभग 20 प्रतिशत तक गिर गई है।
यूनियनों ने मांगी राहत
गिग वर्कर्स यूनियनों ने सरकार से फ्यूल सब्सिडी और न्यूनतम भुगतान सुनिश्चित करने की मांग की है। यूनियन नेताओं का कहना है कि अगर यही स्थिति बनी रही तो हजारों डिलीवरी वर्कर्स इस काम को छोड़ने पर मजबूर हो सकते हैं। कुछ संगठनों ने देशभर में विरोध प्रदर्शन और अस्थायी हड़ताल की भी घोषणा की थी।
“ऐप इकॉनमी” का दूसरा चेहरा
कोविड के बाद भारत में क्विक कॉमर्स और फूड डिलीवरी सेक्टर तेजी से बढ़ा। लेकिन अब इस मॉडल की कमजोरियां भी सामने आने लगी हैं। कंपनियां “पार्टनर मॉडल” के जरिए कर्मचारियों को फुल-टाइम स्टाफ का दर्जा नहीं देतीं, जबकि काम के घंटे लगातार बढ़ते जा रहे हैं। कई डिलीवरी एजेंट्स का कहना है कि वे 12-14 घंटे सड़क पर बिताते हैं, लेकिन खर्च निकालने के बाद आय बेहद कम बचती है।
बढ़ती बहस: सुविधा किस कीमत पर?
सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर बहस तेज हो गई है। कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या “10 मिनट डिलीवरी” जैसी सुविधाएं सस्ते और असुरक्षित श्रम पर टिकी हुई हैं? वहीं दूसरी तरफ कई उपभोक्ता भी मान रहे हैं कि बढ़ती महंगाई का सबसे बड़ा बोझ अब उन्हीं लोगों पर पड़ रहा है जो शहरों की डिजिटल अर्थव्यवस्था को चलाते हैं।
बेंगलुरु की सड़कों पर दौड़ते हजारों डिलीवरी एजेंट्स अब सिर्फ खाना या किराना नहीं पहुंचा रहे, बल्कि भारत की नई “गिग इकॉनमी” की असल कीमत भी दिखा रहे हैं।
Last Updated on May 26, 2026 6:21 pm
