Inflation Reasons in India: भारत में परिवारों के बजट पर बढ़ती महंगाई का असर साफ दिखने लगा है. चाहे घर खरीदना हो, किराया देना हो या बाहर खाना-पीना हो, बच्चों का स्कूल फीस देना हो, डॉक्टर से सलाह लेनी हो या एक जगह से दूसरी जगह जाना हो. लोग का खर्च दशक पहले की तुलना में अब काफी ज्यादा हो रहा है. ऐसा इसलिए क्योंकि महंगाई, पेट्रोल की ऊंची कीमतें और खाने-पीने की चीजों की लागत रोजमर्रा के खर्चों पर बोझ डाल रही हैं.
जून 2026 में खुदरा महंगाई दर
जून में भारत की खुदरा महंगाई दर 4.38 फीसदी थी, जबकि खाने-पीने की चीज़ों की महंगाई दर बढ़कर 5.32% हो गई, जिससे घरों के बजट पर और दबाव पड़ा. जिन परिवारों की आमदनी उसी रफ़्तार से नहीं बढ़ी है, उन पर इसका असर रोज़मर्रा के खर्चों में साफ़ दिखता है.
एक दशक पहले, बड़े मेट्रो शहरों में एक औसत घर की कीमत लगभग ₹65 लाख थी. आज यह आंकड़ा बढ़कर ₹1.17 करोड़ हो गया है. एक स्टैंडर्ड 2BHK अपार्टमेंट का मासिक किराया 2016 में ₹15,000-19,000 से बढ़कर 2026 में लगभग दोगुना यानी ₹30,000-40,000 हो गया है.
यह बढ़ोतरी खाने-पीने की चीज़ों में भी साफ़ दिखती है. 2016 में एक मिड-रेंज रेस्टोरेंट में दो लोगों के खाने का खर्च 400-500 रुपये आता था, जो अब 1,200-2,000 रुपये हो गया है.
एक परिवार का महीने का किराने का बिल लगभग 5,400 से बढ़कर 8,400 से ज़्यादा हो गया है. जबकि, दूध की कीमतें 35-40 प्रति लीटर से बढ़कर 60-70 प्रति लीटर हो गई हैं. ये तुलनाएं दिखाती हैं कि कैसे पिछले दस सालों में महंगाई कितनी तेजी से बढ़ी है. बढ़ती महंगाई की वजह से अमूमन हर इंसान परेशान है.
कीमतें क्यों बढ़ रही हैं?
महंगाई में हालिया बढ़ोतरी के पीछे ग्लोबल और घरेलू दोनों तरह के कारण हैं. ईरान युद्ध से जुड़ी सप्लाई में रुकावटों के कारण ईंधन और खाने-पीने की चीज़ों की कीमतें बढ़ी हैं, जबकि मॉनसून को लेकर अनिश्चितता और एल नीनो (El Nino) की संभावना ने खेती से होने वाले उत्पादन को लेकर चिंता बढ़ा दी है.
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल (क्रूड ऑयल) आयात करने और इस्तेमाल करने वाला देश है, इसलिए ग्लोबल स्तर पर तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का उस पर बहुत असर पड़ता है.
हालांकि, हाल ही में हुए ईरान-अमरीका वॉर के दौरान शुरुआती उछाल के बाद कच्चे तेल की कीमतें कम हो गई थीं, लेकिन क्षेत्र में फिर से तनाव बढ़ने से कीमतें एक बार फिर बढ़ गई हैं.
रुपये के तुलना में डॉलर हुआ मजबूत
रुपये के मुकाबले अमेरिकी डॉलर के मजबूत होने से यह दबाव और बढ़ गया है, क्योंकि कच्चे तेल और कई अन्य आयातित सामानों की कीमत डॉलर में तय होती है, इसलिए रुपया कमजोर होने का मतलब है कि भारत को उतनी ही मात्रा में आयातित सामान खरीदने के लिए ज़्यादा खर्च करना पड़ता है. इससे देश का आयात बिल बढ़ता है और कारोबारियों की लागत भी बढ़ती है, जिसका बोझ आखिरकार ज़्यादा कीमतों के ज़रिए ग्राहकों पर पड़ता है.
इसका असर इसलिए भी बहुत ज़्यादा है क्योंकि भारत अपनी ईंधन की ज़रूरतों का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है और अपने कच्चे तेल के आयात का लगभग 50 फीसदी, लिक्विफाइड नेचुरल गैस का 60 प्रतिश और लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस की लगभग पूरी सप्लाई के लिए स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज (Strait of Hormuz) पर निर्भर है.
जैसे-जैसे वैश्विक राजनीतिक तनाव ग्लोबल एनर्जी मार्केट में रुकावट पैदा करते हैं, कच्चे तेल की ज़्यादा कीमतें और मजबूत डॉलर मिलकर ईंधन को महंगा बना देते हैं, जिससे ट्रांसपोर्ट और मैन्युफैक्चरिंग की लागत बढ़ती है और आखिरकार किराने का सामान, रेस्टोरेंट का खाना और रोज़मर्रा की अन्य चीज़ें महंगी हो जाती हैं.
मौसम भी एक बड़ा कारण है
भारत में सालाना बारिश का लगभग 70 फीसदी हिस्सा मॉनसून से आता है और यह खेती और ग्रामीण आय के लिए बहुत ज़रूरी है, क्योंकि भारत की लगभग आधी खेती योग्य ज़मीन पर सिंचाई की सुविधा नहीं है. हाल ही के हफ़्तों में देश के कई हिस्सों में भारी बारिश और बाढ़ के बावजूद, एल-नीनो के कारण मॉनसून के कमजोर रहने का खतरा बना हुआ है. खेती से कम उत्पादन होने पर खाने-पीने की चीज़ों की सप्लाई कम हो सकती है और कीमतों पर और दबाव पड़ सकता है.
इन जोखिमों को देखते हुए, भारतीय रिज़र्व बैंक ने महंगाई दर बढ़कर 5.1 फीसदी होने का अनुमान लगाया है, जबकि कोर महंगाई दर 4.7 फीसदी रहने का अनुमान है, क्योंकि ईंधन की ज़्यादा लागत और मौसम से जुड़ी फसलों की बर्बादी कीमतों पर असर डाल रही है.
आगे ग्राहकों को क्या उम्मीद करनी चाहिए?
खाने-पीने की चीज़ों की महंगाई दर बढ़कर 5.32 फीसदी हो गई है, दूसरी तरफ हाउसिंग और हेल्थ से जुड़ी महंगाई कम रहने की वजह से कोर महंगाई दर लगभग 4 प्रतिशत पर स्थिर बनी हुई है.
अगली दो तिमाहियों में महंगाई दर के 4-4.5 प्रतिशत के दायरे में रहने की उम्मीद है. मॉनसून के आगे बढ़ने और एल-नीनो की स्थितियों के बदलने के साथ खाने-पीने की चीज़ों की कीमतें अनिश्चितता का सबसे बड़ा कारण बनी रह सकती हैं. हालांकि, कच्चे तेल की कीमतों में उछाल, लगातार वैश्विक राजनीतिक तनाव और खराब मॉनसून की वजह से इस साल के आखिर में हेडलाइन महंगाई दर 6 फीसदी के करीब पहुंच सकती है.
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आने वाले समय में क्या होगी महंगाई की स्थिति?
निकट भविष्य की चुनौतियों के बावजूद, भारत का लंबे समय का महंगाई का आउटलुक काफी हद तक स्थिर बना हुआ है. हालांकि खाने-पीने की चीज़ों की सप्लाई में उतार-चढ़ाव, वैश्विक राजनीतिक तनाव और करेंसी पर दबाव की वजह से 2026 के आखिर और वित्त वर्ष 2027 तक कीमतें ऊंची बनी रह सकती हैं, लेकिन उम्मीद है कि 2031 तक RBI के 4 प्रतिशत महंगाई दर का लक्ष्य कीमतों में लंबे समय तक आने वाले बड़े उतार-चढ़ाव को रोकने में मदद करेगा.
जैसे-जैसे सप्लाई में अस्थायी रुकावटें कम होंगी और मॉनेटरी पॉलिसी में बदलाव होगा, महंगाई दर धीरे-धीरे अपने 4 प्रतिशत के बेसलाइन स्तर पर वापस आ जाएगी, जिससे ग्राहकों की खरीदने की क्षमता और आर्थिक विकास, दोनों को बढ़ावा मिलेगा.
Last Updated on July 16, 2026 12:27 pm
